Explainer: क्या सच में बॉलीवुड में लगता था अंडरवर्ल्ड का पैसा? जानें 90s की फिल्मों का काला सच और आज कितना बदल चुका है सिस्टम
Bollywood VS Underworld: एक दौर था जब बॉलीवुड सिर्फ फिल्मों, स्टार्स और ग्लैमर के लिए नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड कनेक्शन की वजह से भी चर्चा में रहता था. 90s में फिल्म इंडस्ट्री जितनी ज्यादा चकाचौंध से भरी थी, उतना ही डर और विवाद भी देखने को मिलता था. उस दौर में कई बड़े प्रोड्यूसर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स और स्टार्स के नाम कथित तौर पर अंडरवर्ल्ड से जोड़े गए.
फोन पर धमकियां मिलना, जबरन फिल्में साइन करवाना, फाइनेंसिंग, म्यूजिक राइट्स और विदेशों में होने वाले शोज को लेकर बॉलीवुड और माफिया के रिश्तों की खबरें अक्सर सामने आती रहती थी. लेकिन आज हालात पहले जैसे नहीं हैं. लेकिन ये सवाल अब भी पूछा जाता है कि क्या वाकई फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लगता था? और अब सिस्टम कितना बदल चुका है? तो चलिए विस्तार से जानते हैं, इस बारे में-
बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड की एंट्री?
90s से पहले बॉलीवुड पूरी तरह अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर माना जाता था. फिल्मों के लिए बैंक आसानी से लोन नहीं देते थे और ज्यादातर प्रोड्यूसर्स निजी फाइनेंसर्स से पैसा लेते थे. ऐसे में कथित तौर पर अंडरवर्ल्ड की एंट्री हुई. उस समय फिल्मों में कैश ट्रांजैक्शन बहुत ज्यादा होता था. कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि दुबई और मुंबई के कुछ गैंग्स फिल्म प्रोडक्शन में पैसा लगाने लगे थे और बदले में उन्हें भारी मुनाफा, विदेशों में डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स और फिल्म इंडस्ट्री में प्रभाव मिलता था.
दाऊद इब्राहिम का नाम सबसे आगे
जब भी बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड कनेक्शन की बात होती है ,तो सबसे पहले नाम दाऊद इब्राहिम (Dawood Ibrahim) का ही आता है. मीडिया रिपोर्ट्स और कई पूर्व पुलिस अधिकारियों के बयानों में दावा किया गया है कि 90s में दाऊद का नेटवर्क बॉलीवुड तक पहुंच चुका था. ये भी बताया जाता है कि दुबई में होने वाले बॉलीवुड इवेंट्स, स्टेज शो और फिल्म फाइनेंसिंग में उसके ही लोग थे. कई स्टार्स की तस्वीरें भी दुबई पार्टियों से वायरल हुई थीं, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया था.
ब्लास्ट के बाद गंभीर हो गया था मुद्दा
वहीं, जब 1993 में मुंबई ब्लास्ट के बाद यह मुद्दा और गंभीर हो गया था. जांच एजेंसियों ने बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के कथित रिश्तों पर नजर रखनी शुरू कर दी थी. कई प्रोड्यूसर्स और फिल्म कारोबार से जुड़े लोगों से भी उस समय पूछताछ होने लगी थी. कई फिल्ममेकर्स ने खुलकर कहा कि उन्हें धमकी भरे फोन आते थे. वहीं, कुछ मामलों में कथित तौर पर फिल्मों में खास एक्टर्स को कास्ट करने या म्यूजिक कंपनियों से डील करने का दबाव भी बनाया जाता था.
फिल्मों में भी दिखने लगा अंडरवर्ल्ड का असर
90s और 2000s की शुरुआत में तो कई ऐसी फिल्में आईं जिनमें मुंबई माफिया, गैंगवार और अंडरवर्ल्ड की कहानियां दिखाने जाने लगी. इनमें सत्या, कंपनी, और वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई शामिल है. इन फिल्मों की सफलता के बाद लोगों की दिलचस्पी ऐसे मुद्दों पर और ज्यादा बढ़ गई. हालांकि फिल्ममेकर्स हमेशा कहते रहे कि उनकी कहानियां फिक्शन और रिसर्च से भरी होती है.
कैसे बदला बॉलीवुड का सिस्टम?
2000 के बाद बॉलीवुड में सबसे बड़ा बदलाव कॉर्पोरेट कल्चर का आया, जब सरकार ने फिल्म इंडस्ट्री को आधिकारिक इंडस्ट्री का दर्जा दिया. इसके बाद बैंकों और बड़ी कंपनियों ने फिल्मों में निवेश करना शुरू किया. धीरे-धीरे बड़े स्टूडियोज आए और काम ज्यादा प्रोफेशनल होने लगा. वहीं, फिल्मों की फंडिंग के लिए कानूनी रास्ते उपलब्ध होने लगे और कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम भीमजबूत हुआ. ऐसे अंडरवर्ल्ड का असर कम होने लगा.
क्या आज भी अंडरवर्ल्ड का असर है?
अब बॉलीवुड इंडस्ट्री में Yash Raj Films, Dharma Productions, T-Series और कई बड़े स्टूडियो पूरी कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर में काम करते हैं. मल्टीप्लेक्स कल्चर और OTT प्लेटफॉर्म्स आने के बाद भी इंडस्ट्री का बिजनेस मॉडल काफी बदल गया. आज स्थिति पहले जैसी नहीं रही है और सुरक्षा एजेंसियां, डिजिटल ट्रांजैक्शन और फाइनेंशियल मॉनिटरिंग काफी मजबूत हो चुकी हैं. इसलिए 90s जैसा माहौल अब दिखाई नहीं देता है.
इंडस्ट्री के सामने हैं ये चुनौतियां
पहले इंडस्ट्री पर पैसों का दवाब होता था और अब इंडस्ट्री के सामने दूसरी चुनौतियां आ गई है. जैसे बॉक्स ऑफिस प्रेशर, OTT का मुकाबला, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और स्टार सिस्टम का बदलना. पहले जहां अंडरवर्ल्ड का डर चर्चा में था, वहीं आज फिल्में बिजनेस मॉडल और कंटेंट की लड़ाई लड़ रही हैं. लोगों को फिल्मों में कुछ नया चाहिए, कॉपी कंटेंट नहीं होना चाहिए. वहीं, आज कल फिल्म रिलीज से पहले ट्रोलिंग का ट्रेंड चल रहा है.
आने वाले समय में क्या होगा?
अब OTT और ग्लोबल निवेश की वजह से फिल्मों में विदेशी कंपनियों और बड़े ब्रांड्स का पैसा लग रहा है. इससे इंडस्ट्री ज्यादा मजबूत हुई है. हालांकि अफवाहें और साजिशों की कहानियां शायद कभी खत्म नहीं होंगी, क्योंकि बॉलीवुड और इससे जुड़े रहस्य हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करते आए हैं.
FAQ
1. क्या बॉलीवुड में सच में अंडरवर्ल्ड का पैसा लगता था?
- 90s के दौर में कई रिपोर्ट्स और जांचों में दावा किया गया था कि कुछ फिल्मों में अंडरवर्ल्ड से जुड़ा पैसा लगाया जाता था. हालांकि हर फिल्म या स्टार को इससे जोड़ना गलत माना जाता है.
2. बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड कनेक्शन में किसका नाम सामने आया?
-इस मामले में सबसे ज्यादा नाम दाऊद इब्राहिम का सामने आया था. कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उसका नेटवर्क फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंच चुका था.
3. बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड का असर कब कम होना शुरू हुआ?
- 2000 के बाद जब फिल्म इंडस्ट्री को कॉर्पोरेट सपोर्ट मिलने लगा, बैंक और बड़ी कंपनियां निवेश करने लगीं, तब धीरे-धीरे अंडरवर्ल्ड का असर कम होता गया.
4. आज बॉलीवुड की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
-आज इंडस्ट्री के सामने OTT का मुकाबला, बॉक्स ऑफिस प्रेशर, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अच्छा कंटेंट देने की चुनौती सबसे बड़ी मानी जाती है.
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Explainer: क्या होता है Globle peace index, कौन सा देश 19 बार से लगातार नंबर वन, जानें भारत का स्थान
What is Global Peace Index: दुनिया के कई देशों में इन दिनों युद्ध चल रहा है. फिर चाहे वह सुपर पावर अमेरिका हो या फिर रूस, यूक्रेन, इजरायल और ईरान. इसके अलावा भी दुनिया के कई क्षेत्रों में देशों के बीच संघर्ष जारी है. इसमें भारत-पाकिस्तान भी शामिल हैं. लेकिन बढ़ते इन संघर्षों या फिर युद्धों के बीच क्या आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे शांत देश कौन सा है. या फिर दुनिया के शांत देशों की सूची में भारत का कौन सा स्थान है.
शायद नहीं. लेकिन आपको बता दें कि ग्लोबल पीस इंडेक्स में ऐसे ही देशों की सूची सामने आती है जो या तो शांत हैं या फिर शांति की ओर अग्रसर हैं. आइए जानते हैं कि आखिर ग्लोबल पीस इंडेक्स क्या है? इस सूची में कौन सा ऐसा देश है जो 19वीं बार लगातार नंबर वन पर बना हुआ है और भारत इस लिस्ट में कौन से नंबर काबिज है.
F&Q
Q. ग्लोबल पीस इंडेक्स किसे कहा जाता है
दुनिया के अलग-अलग देशों में शांति, सुरक्षा और स्थिरता का स्तर क्या है, यह जानने के लिए हर साल एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की जाती है, जिसे ग्लोबल पीस इंडेक्स (Global Peace Index-GPI) कहा जाता है. यह रिपोर्ट केवल युद्ध या आतंकवाद को नहीं मापती, बल्कि किसी देश के भीतर कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता, सैन्य गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे कई पहलुओं का विश्लेषण करती है.
साल 2026 की ताजा रिपोर्ट ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया पहले की तुलना में अधिक अस्थिर और खतरनाक हो गई है. कई क्षेत्रों में युद्ध, राजनीतिक तनाव और सामाजिक संघर्ष तेजी से बढ़े हैं, जिससे वैश्विक शांति का स्तर लगातार कमजोर हो रहा है.
Q. क्या है ग्लोबल पीस इंडेक्स
ग्लोबल पीस इंडेक्स को ऑस्ट्रेलिया स्थित इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) तैयार करता है. इसकी शुरुआत 2007 में हुई थी. इस इंडेक्स का उद्देश्य दुनिया के देशों में शांति और सुरक्षा की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करना है.
रिपोर्ट तैयार करते समय 23 से अधिक संकेतकों का विश्लेषण किया जाता है. इनमें अपराध दर, आतंकवाद, राजनीतिक स्थिरता, सैन्य खर्च, आंतरिक संघर्ष, बाहरी युद्ध, हथियारों की उपलब्धता और पड़ोसी देशों के साथ संबंध जैसे पहलू शामिल होते हैं. जितना कम स्कोर होता है, देश उतना ही अधिक शांतिपूर्ण माना जाता है.
Q. लगातार 19वीं बार नंबर-1 पर कौन सा देश
ग्लोबल पीस इंडेक्स 2026 में भी आइसलैंड दुनिया का सबसे शांतिपूर्ण देश बना हुआ है. यह लगातार 19वां साल है जब आइसलैंड ने पहला स्थान हासिल किया है.
Q. क्यों आईसलैंड सबसे शांत देश
आइसलैंड की आबादी कम है, अपराध दर बेहद कम है और वहां राजनीतिक स्थिरता मजबूत मानी जाती है. देश का रक्षा खर्च भी सीमित है और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था काफी प्रभावी है. आइसलैंड के बाद सबसे शांतिपूर्ण देशों में न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, स्लोवेनिया और आयरलैंड का नाम शामिल है. इन देशों में मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, बेहतर जीवन स्तर और कम हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती हैं.
Q. कौन से देश सबसे कम शांतिपूर्ण
रिपोर्ट के अनुसार इस बार रूस सबसे कम शांतिपूर्ण देश बन गया है. रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव उसकी रैंकिंग पर साफ दिखाई दिया है. सबसे कम शांतिपूर्ण देशों की सूची में रूस के बाद सूडान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, यूक्रेन और इजरायल शामिल हैं. इन देशों में लंबे समय से युद्ध, गृह संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में शांति बहाली की संभावनाएं फिलहाल कमजोर दिखाई देती हैं.
Q. भारत की रैंकिंग क्या है
भारत इस वर्ष भी 115वें स्थान पर बना हुआ है. यानी पिछले साल की तुलना में उसकी रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं हुआ है. पिछले साल भी भारत का स्थान 115वां ही था. जो बताता है कि शांति के लिहाज से देश में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है.
हालांकि भारत की स्थिति दक्षिण एशिया के कुछ देशों की तुलना में बेहतर मानी गई है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां, सीमा विवाद, आंतरिक सुरक्षा संबंधी मुद्दे और सामाजिक तनाव जैसे कारक रैंकिंग को प्रभावित करते हैं.
Q. दक्षिण एशिया में कौनसे देश की रैंकिंग में आई गिरावट
दक्षिण एशिया की बात करें तो इस बार सबसे बड़ी गिरावट नेपाल में दर्ज की गई है. नेपाल 26 स्थान नीचे खिसक गया, जो इस साल किसी भी देश की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है. वहीं पाकिस्तान 152वें स्थान पर पहुंच गया है.
Q. अमेरिका की रैंकिंग क्यों गिरी?
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है. रिपोर्ट में अमेरिका 134वें स्थान पर पहुंच गया है, जो उसकी अब तक की सबसे खराब रैंकिंग बताई जा रही है. विशेषज्ञ इसके पीछे राजनीतिक ध्रुवीकरण, हिंसक प्रदर्शन, सामाजिक तनाव और बढ़ते आंतरिक मतभेदों को प्रमुख कारण मानते हैं. यह दिखाता है कि आर्थिक ताकत होने के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियां किसी भी देश की शांति को प्रभावित कर सकती हैं.
Q. दुनिया में क्यों बढ़ रही है अशांति?
रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान समय में दुनिया कई बड़े संकटों से एक साथ जूझ रही है. मध्य पूर्व में तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, अफ्रीका के कई देशों में गृहयुद्ध और एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक विवादों ने वैश्विक शांति को प्रभावित किया है.
आज दुनिया में 61 सक्रिय राज्य-आधारित संघर्ष चल रहे हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे अधिक संख्या है. इसके अलावा 103 देश किसी न किसी बाहरी संघर्ष में शामिल हैं. विशेषज्ञ इस दौर को "ग्रेट फ्रैगमेंटेशन" यानी बढ़ते वैश्विक विखंडन का दौर बता रहे हैं.
युद्ध की तस्वीर बदल रहे AI और ड्रोन
आधुनिक युद्ध अब केवल सैनिकों और टैंकों तक सीमित नहीं रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ड्रोन तकनीक ने युद्ध की प्रकृति पूरी तरह बदल दी है. रिपोर्ट के अनुसार 2018 से 2025 के बीच ड्रोन हमलों में 11,500 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है. अब केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि सैकड़ों गैर-राज्य सशस्त्र संगठन भी ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.
AI आधारित सिस्टम कुछ सेकंड में लक्ष्य तय कर सकते हैं, जबकि पहले यही प्रक्रिया घंटों या दिनों में पूरी होती थी. इससे युद्ध की गति बढ़ी है, लेकिन आम नागरिकों के लिए खतरे भी बढ़ गए हैं.
हिंसा की भारी आर्थिक कीमत
दुनिया केवल जान-माल का नुकसान ही नहीं झेल रही, बल्कि आर्थिक रूप से भी इसकी बड़ी कीमत चुका रही है. रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में हिंसा और संघर्षों का वैश्विक आर्थिक प्रभाव बढ़कर 21.81 खरब डॉलर तक पहुंच गया. यह दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 10.5 प्रतिशत है.
यानी युद्ध और हिंसा केवल देशों की सुरक्षा को नहीं, बल्कि विकास, रोजगार, निवेश और आम लोगों के जीवन स्तर को भी प्रभावित कर रहे हैं.
GPI को समझें चेतावनी
बहरहाल ग्लोबल पीस इंडेक्स 2026 दुनिया के लिए एक चेतावनी की तरह है. जहां एक ओर आइसलैंड जैसे देश लगातार शांति और स्थिरता का उदाहरण पेश कर रहे हैं, वहीं कई क्षेत्र युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं. भारत की रैंकिंग स्थिर जरूर है, लेकिन वैश्विक हालात यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में शांति और सुरक्षा बनाए रखना दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा.
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