पश्चिम बंगाल में हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार हिंसा, हत्याओं, आगजनी और राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने केवल राज्य की शांति को ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को भी आहत किया है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है, किंतु जब यह उत्सव हिंसा, भय और प्रतिशोध में बदल जाए तो यह केवल राजनीतिक असफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का संकेत बन जाता है। बंगाल की ताजा हिंसक घटनाएं इसी चिंता को सामने लाती हैं। चुनाव के दौरान छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ था। लेकिन परिणामों की घोषणा के बाद जिस प्रकार राजनीतिक दलों के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक हुए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब वैचारिक संघर्ष न रहकर प्रतिशोध और वर्चस्व की लड़ाई बनती जा रही है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें, कई लोगों की हत्याएं और विशेष रूप से सुवेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना दिया। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह क्यों बची रहनी चाहिए?
यह विडंबना है कि भारत, जिसने विश्व को अहिंसा, करुणा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, आज वही देश राजनीतिक हिंसा के कारण अपनी छवि धूमिल करता दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता और सेवा से जोड़ा था, लेकिन आज राजनीति सत्ता, प्रतिशोध और भय का माध्यम बनती जा रही है। बंगाल की हिंसा इस बीमारी का एक भयावह उदाहरण है। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास हिंसा से अछूता नहीं रहा है। वामपंथी शासन के लंबे दौर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल तक राजनीतिक संघर्ष कई बार रक्तरंजित रूप में सामने आया। बूथ कब्जाने, विरोधियों को डराने, स्थानीय दबंगों और अपराधी तत्वों का राजनीतिक संरक्षण-ये सब बंगाल की राजनीति की कटु वास्तविकताएं रही हैं। सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक संस्कृति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आ सका। यही कारण है कि चुनाव परिणामों के बाद भी हिंसा का वातावरण बनता है और आम नागरिक भय तथा असुरक्षा के बीच जीने को मजबूर होता है।
दरअसल जब राजनीति विचार और जनसेवा से हटकर केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाती है, तब हिंसा उसका स्वाभाविक परिणाम बनती है। हार को लोकतांत्रिक विनम्रता से स्वीकार करने के बजाय प्रतिशोध का माध्यम बना लेना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है। यही कारण है कि चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों और विजय जुलूसों पर प्रतिबंध के बावजूद हिंसक घटनाएं हुईं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की नैतिक विफलता भी है। ममता बनर्जी द्वारा चुनाव परिणामों पर सवाल उठाना और राजनीतिक टकराव को तीखा बनाना हो या भाजपा द्वारा आक्रामक राजनीतिक प्रतिक्रिया-दोनों पक्षों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र में विपक्ष और सत्ता दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे जनता को शांति और संयम का संदेश दें। दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक दल अक्सर कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें उकसाने का काम करते हैं। परिणामस्वरूप हिंसा सामान्य राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही है।
सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि राजनीतिक हिंसा की कीमत हमेशा आम जनता को चुकानी पड़ती है। जिन लोगों के घर जलते हैं, जिन परिवारों के सदस्य मारे जाते हैं, जिन छोटे व्यापारियों की दुकानें टूटती हैं, उनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे केवल उस हिंसक मानसिकता के शिकार बनते हैं जो सत्ता को मानवता से ऊपर मानती है। यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दल हिंसा का सहारा क्यों लेते हैं? जबकि इतिहास गवाह है कि हिंसा कभी स्थायी समाधान नहीं देती। हिंसा केवल भय, अविश्वास और प्रतिशोध को जन्म देती है। जो दल हिंसा को हथियार बनाते हैं, वे अंततः जनता की नजरों में अपना नैतिक अधिकार खो देते हैं। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।
आज भारत एक नए वैश्विक दौर में प्रवेश कर रहा है। दुनिया भारत को एक उभरती आर्थिक शक्ति, तकनीकी महाशक्ति और लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में देख रही है। वर्ष 2047 तक जब भारत अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब हमारा लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं होना चाहिए, बल्कि एक ऐसे सभ्य और नैतिक राष्ट्र का निर्माण भी होना चाहिए जहां राजनीति का आधार अहिंसा, संवाद और संवेदनशीलता हो। यदि राजनीतिक दल नफरत, सांप्रदायिकता और हिंसा को अपना हथियार बनाए रखेंगे, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना रही है। गौतम बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया, महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बताया, गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्य को चुनौती दी। यह वही भारत है जिसने दुनिया को यह सिखाया कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम और सह-अस्तित्व है। लेकिन आज राजनीतिक स्वार्थों और गैर-राजनीतिक आपराधिक तत्वों के कारण देश की छवि प्रभावित हो रही है। अपराधी मानसिकता के लोग राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। वे दल बदलते रहते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल शक्ति और स्वार्थ की पूर्ति होता है। बंगाल की ताजा घटनाओं में भी ऐसे तत्वों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
समाधान केवल प्रशासनिक कठोरता में नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन में निहित है। सबसे पहले सभी राजनीतिक दलों को सार्वजनिक रूप से हिंसा की निंदा करनी चाहिए और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बरतने का स्पष्ट संदेश देना चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र प्रतिद्वंद्विता का नहीं, सह-अस्तित्व का नाम है। दूसरा, कानून व्यवस्था को लेकर “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनानी होगी। किसी भी दल से जुड़े उपद्रवियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखकर संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्क निगरानी बढ़ानी होगी। तीसरा, राजनीति के अपराधीकरण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। ऐसे लोगों को राजनीतिक दलों में प्रवेश ही न मिले जिनकी पृष्ठभूमि हिंसक और आपराधिक रही हो। राजनीतिक दलों को अपने भीतर नैतिक अनुशासन विकसित करना होगा। चैथा, समाज में लोकतांत्रिक शिक्षा और संवेदनशीलता का वातावरण बनाना होगा। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में संवाद, सहिष्णुता और अहिंसा के मूल्यों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। जब तक समाज स्वयं हिंसा को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक हिंसा का अंत कठिन होगा।
बंगाल की ताजा हिंसा केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमने समय रहते राजनीति को स्वस्थ मूल्यों की ओर नहीं मोड़ा, तो नफरत और हिंसा लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती रहेंगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी आत्मा को पहचाने। यह देश युद्ध और प्रतिशोध की नहीं, बल्कि शांति, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की भूमि है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता का मूल दर्शन है। यदि राजनीति इस दर्शन से विमुख होगी, तो लोकतंत्र केवल सत्ता संघर्ष बनकर रह जाएगा। पश्चिम बंगाल को अब हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति से बाहर निकलकर विकास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समरसता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यही लोकतंत्र की गरिमा है, यही जनता की अपेक्षा है और यही विकसित भारत का मार्ग भी।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Continue reading on the app
A PHP Error was encountered
Severity: Warning
Message: Attempt to read property "title" on null
Filename: front/post_detail.php
Line Number: 50
Backtrace:
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/views/front/post_detail.php
Line: 50
Function: _error_handler
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 161
Function: view
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/application/controllers/Web.php
Line: 296
Function: show_page
File: /home/ezenews/htdocs/www.ezenews.in/public/index.php
Line: 319
Function: require_once