Iran War Powers Resolution: ट्रंप प्रशासन को बड़ा राजनीतिक झटका, अमेरिकी संसद में ईरान युद्ध खत्म करने का प्रस्ताव पास
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक द्विदलीय 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' पारित किया है, जिसका मकसद ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को खत्म करना है.यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि इस संघर्ष को लेकर आलोचना बढ़ती जा रही है.
करीबी मुकाबले में पास हुआ प्रस्ताव
यह प्रस्ताव बुधवार (स्थानीय समय) को पेश किया गया था.इसे हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने पेश किया था और इसे एडम स्मिथ और जिम हाइम्स जैसे वरिष्ठ डेमोक्रेट्स का समर्थन मिला.यह प्रस्ताव बहुत ही करीबी अंतर 215-208 से पास हुआ.
कूटनीतिक विफलता और युद्ध के दुष्परिणाम
मीक्स ने इसे एक बड़ा मोड़ बताते हुए कहा, “मेरे 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' का पास होना राष्ट्रपति ट्रंप के ईरान के खिलाफ अवैध और महंगे युद्ध पर एक अहम द्विदलीय विरोध है और इसे पूरी तरह खत्म करने की दिशा में पहला कदम है.”
इस वोट से साफ है कि कांग्रेस में इस युद्ध को लेकर विरोध बढ़ रहा है.आलोचकों का कहना है कि इस संघर्ष ने अपने बताए गए लक्ष्य हासिल नहीं किए हैं, लेकिन इसके कारण आर्थिक और मानवीय लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है.
लक्ष्यों को हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रही सरकार
हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट एडम स्मिथ ने कहा, “आज का वोट साफ संदेश देता है कि ट्रंप को ईरान के खिलाफ अपनी चुनी हुई विनाशकारी जंग को तुरंत खत्म कर देना चाहिए.”
उन्होंने कहा कि सरकार अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर पाई है.जैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, वहां का उच्च संवर्धित यूरेनियम हटाना या शासन परिवर्तन लाना.
उनके मुताबिक, “इसके बजाय ईरान की स्थिति और मजबूत हुई है, वह क्षेत्र में और अस्थिरता फैला रहा है, और वहां और भी कठोर विचारों वाला नेतृत्व है.साथ ही अब हमें शायद ईरान को पैसे देने पड़ें ताकि वह होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोल दे, जो पहले से खुला हुआ था, जब तक ट्रंप ने यह युद्ध शुरू नहीं किया.”
मीक्स ने यह भी कहा कि इस युद्ध ने कूटनीति की संभावना को और कमजोर कर दिया है.
आम जनता पर बढ़ा आर्थिक और मानवीय बोझ
उन्होंने कहा, “ट्रंप का यह युद्ध उनके बताए गए लक्ष्यों को हासिल करने में पूरी तरह असफल रहा है.बल्कि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत से समाधान और दूर हो गया है.”
उन्होंने कहा कि इस युद्ध ने ईरान को अपनी ताकत दिखाने का मौका दिया है और आम अमेरिकियों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया है.युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 50 प्रतिशत बढ़ गई हैं, और लोग हर हफ्ते अरबों डॉलर एक ऐसे युद्ध के लिए चुका रहे हैं जिसका वे बड़े पैमाने पर विरोध करते हैं.
अमेरिकी प्रतिनिधि प्रमिला जयपाल का बयान
प्रतिनिधि प्रमिला जयपाल ने बताया कि वह वोट देने के लिए वाशिंगटन डीसी में नहीं थीं, क्योंकि वह अपनी मां की अचानक स्वास्थ्य समस्या के कारण भारत में थीं.
उन्होंने कहा, “अगर मैं वाशिंगटन में होती, तो मैं ट्रंप के ईरान के खिलाफ इस अवैध युद्ध को खत्म करने वाले 'वॉर पावर्स रेजोल्यूशन' के पक्ष में वोट देती.”
उन्होंने कहा कि युद्ध घोषित करने का अधिकार सिर्फ कांग्रेस के पास होता है और इसे 'युद्ध चुनने वाला युद्ध' बताया.
जयपाल ने कहा कि इस युद्ध के कारण अमेरिका और दुनिया दोनों पर बुरा असर पड़ा है.जिसमें अमेरिकी सैनिकों की मौत, ईरान और लेबनान में नागरिकों की मौत, लोगों का विस्थापन और आर्थिक नुकसान शामिल है.उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि अमेरिकी जनता इस अवैधता की कीमत चुका रही है.
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उन्होंने कहा, “यह युद्ध हर दिन संविधान का उल्लंघन है.” एडम स्मिथ और ग्रेगरी मीक्स दोनों ने कहा कि यह वोट अंतर जनता की बढ़ती नाराजगी को भी दिखाता है.
मीक्स ने कहा, “अब सीनेट की बारी है कि वह इस प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई करे और राष्ट्रपति को साफ संदेश दे कि अब बहुत हो चुका है.”
स्रोत--आईएएनएस
डिस्कलेमर- हेडिंग, सबहेड और समरी को छोड़कर पूरी स्टोरी न्यूज एजेंसी IANS की है.
India vs Global EMs: Motilal Oswal की रिपोर्ट में खुलासा, AI की दौड़ में पिछड़ने के बावजूद भारतीय बाजार क्यों है ज्यादा सुरक्षित दांव?
India vs Global EMs: पिछले एक साल से ग्लोबल निवेशकों की नजर एक ही थीम पर टिकी है, वो है AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस. ताइवान, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बाजारों में AI से जुड़े शेयरों में भारी विदेशी निवेश देखा गया. नतीजा यह रहा कि इन बाजारों ने जबरदस्त तेजी दिखाई, जबकि भारतीय बाजार पिछड़ गया. विदेशी निवेशकों ने भारत से धन निकालकर AI से जुड़े बाजारों में निवेश किया. हालांकि, मोतीलाल ओसवाल की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि तस्वीर उतनी भी सिंपल नहीं है जितनी दिख रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ग्लोबल निवेश ट्रेंड में बदलाव आया तो भारत का डायवर्सिफाइड मार्केट स्ट्रक्चर इसे एक बेहतर और सुरक्षित ठिकाना बना सकता है.
भारत दूसरे एशियाई और EM बाजारों से अलग क्यों है?
मोतीलाल ओसवाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा अंतर सेक्टर कॉन्संट्रेशन में है. दुनिया के अधिकांश बड़े बाजार कुछ ही सेक्टर्स पर अत्यधिक निर्भर हैं. ताइवान, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में, टेक्नोलॉजी सेक्टर बाजार की ;en करता है, जबकि ब्राजील और चीन में, फाइनेंशियल्स और कमोडिटी क्षेत्र हावी हैं.
डायवर्सिफिकेशन भारत को सबसे संतुलित इक्विटी बाजारों में से एक बनाता है
रिपोर्ट में कहा गया है कि टॉप 3 सेक्टर्स का MSCI Taiwan Index में लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा है. दक्षिण कोरिया में यह आंकड़ा 86 प्रतिशत, ब्राजील में 68 प्रतिशत, चीन में 64 प्रतिशत, जापान में 60 प्रतिशत और संयुक्त राज्य अमेरिका में 58 प्रतिशत है. इसके मुकाबले, भारत में टॉप 3 सेक्टर्स का हिस्सा केवल 52 प्रतिशत है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह डायवर्सिफिकेशन भारत को दुनिया के सबसे संतुलित इक्विटी बाजारों में से एक बनाती है. ब्रोकरेज का यह भी मानना है कि अगर AI ट्रेड का उत्साह ठंडा पड़ा तो यह कम कॉन्संट्रेशन रिस्क भारत के लिए बड़ा फायदा साबित हो सकता है.
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क्या AI की गैर-मौजूदगी की वजह से भारत पिछड़ा?
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत पिछले एक साल में कई प्रमुख वैश्विक बाजारों से पिछड़ गया है. मोतीलाल ओसवाल के अनुसार, AI रैली शुरू होने से पहले, MSCI India ने अन्य बाजारों से काफी बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन पिछले एक साल में यह उन्हीं बाजारों से काफी पीछे रह गया है. ब्रोकरेज फर्म इस खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे AI से जुड़े बाजारों में भारी निवेश को मानती है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फ्लो में सुधार होने पर स्थिति बदल सकती है. Motilal Oswal का कहना है कि AI-लेड ट्रेड में किसी भी तरह की कमी या पलटाव से भारत जैसे डायवर्सिफाइड बाजारों को सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है. दूसरी तरफ टेक्नोलॉजी पर बहुत ज्यादा निर्भर बाजार ज्यादा कमजोर साबित हो सकते हैं.
वैल्यूएशन में आई बड़ी करेक्शन
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट में वैल्यूएशन करेक्शन को एक और महत्वपूर्ण कारक बताया गया है. सितंबर 2024 में बाजार के चरम पर पहुंचने के बाद भारत में महत्वपूर्ण गिरावट देखी गई. कुछ ग्लोबल बाजारों के उलट, जहां अर्निंग्स अपग्रेड ने वैल्युएशन को सहारा दिया, भारत में यह एडजस्टमेंट शेयर की कीमतों में गिरावट और समय के साथ होने वाले बदलावों दोनों के कारण हुआ. रिपोर्ट के अनुसार, भारत और इंडोनेशिया में फॉरवर्ड वैल्यूएशन में सबसे तेज गिरावट आई, भारत में 25% और इंडोनेशिया में 35% की गिरावट दर्ज की गई. इस गिरावट के बावजूद, अर्निंग्स ग्रोथ के अनुमान मजबूत बने हुए हैं. कंसेंसस एस्टीमेट के मुताबिक, अगले दो साल में भारतीय कॉर्पोरेट अर्निंग्स करीब 14 फीसदी की सालाना दर से बढ़ सकती है.
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इतिहास क्या कहता है वैल्यूएशन के बारे में?
रिपोर्ट का एक बेहद दिलचस्प पहलू ऐतिहासिक मूल्यांकन से जुड़ा है. मोतीलाल ओसवाल ने बताया कि पिछले एक दशक में निफ्टी 50 का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग (पी/ई) मल्टीपल शायद ही कभी 19 गुना से नीचे रहा हो. वर्तमान में, इंडेक्स लगभग 18.6 गुना फॉरवर्ड अर्निंग पर ट्रेड कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, इतिहास बताता है कि इस तरह के वैल्यूशन में उतार-चढ़ाव अक्सर निवेश के अच्छे अवसर प्रदान करते हैं. ब्रोकरेज फर्म ने आगे बताया कि पिछली बार जब वैल्यूएशन 19 गुना से नीचे गिरा था, तब निफ्टी 50 ने अगले 12 महीनों में औसतन 34% का रिटर्न दिया था. हालांकि Motilal Oswal ने यह भी साफ किया है कि वो इस बार ऐसे ही नतीजे का अनुमान नहीं लगा रहे, लेकिन मौजूदा रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल कई ग्लोबल बाजारों के मुकाबले ज्यादा संतुलित नजर आती है.
भारत का बॉन्ड बाजार भी रहा स्थिर
रिपोर्ट में ग्लोबल बॉन्ड बाजारों पर भी प्रकाश डाला गया है. बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव और ऊंची एनर्जी कीमतों ने कई विकसित देशों में बॉन्ड यील्ड को बढ़ा दिया है. अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड लगभग 4.4% तक पहुंच गई, जबकि जापान के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड ने कई दशकों के ऊंचे स्तर पर जा पहुंचा. इसके विपरीत, इन ग्लोबल दबावों के बावजूद भारत के 10-वर्षीय जी-सेक यील्ड में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही. मोतीलाल ओसवाल का मानना है कि यह स्थिरता अपेक्षाकृत नियंत्रित महंगाई और RBI के पॉलिसी फ्रेमवर्क में बाजार के विश्वास के कारण है.
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