Explain Cotton Import Duty: भारत में फिर से कपास के आयात पर कस्टम ड्यूटी क्यों हटा रही सरकार?
Explain Cotton Import Duty: केंद्र सरकार ने देश के टेक्सटाइल सेक्टर को बड़ी राहत देते हुए कच्चे कपास के आयात पर सीमा शुल्क यानी कस्टम ड्यूटी को पांच महीने के लिए पूरी तरह से हटा दिया है. यह नई छूट 1 जून 2026 से लागू हो चुकी है और 31 अक्टूबर 2026 तक प्रभावी रहेगी. सरकार का मानना है कि इस कदम से घरेलू कपड़ा मिलों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुकाबला करने के लिए सस्ती और अच्छी क्वालिटी का कपास आसानी से मिल सकेगा. पिछले कुछ समय से भारतीय कपड़ा निर्यात में जो गिरावट देखी जा रही थी, उसे रोकने के लिए इस नीति को बेहद जरूरी माना जा रहा है.
पहले भी हटाई गई थी कस्टम ड्यूटी
यह लगातार दूसरा मौका है जब सरकार ने इस तरह का कदम उठाया है. इससे पहले साल 2025 में भी 19 अगस्त से 30 सितंबर तक के लिए ड्यूटी हटाई गई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर उस साल के आखिरी तक लागू रखा गया था. इस बार सरकार ने पांच महीने का एक साफ विंडो दिया है ताकि मिलें अपनी प्लानिंग सही तरीके से कर सकें.
कपड़ा निर्यात को मिलेगा नया बूस्ट
कपास पर से टैक्स हटाने के फैसले के पीछे मुख्य वजह कपड़ा और गारमेंट निर्यात में आई कमी है. वित्त वर्ष 2025 में देश का कपड़ा निर्यात 36.6 अरब डॉलर था, जो वित्त वर्ष 2026 में 2.2 प्रतिशत घटकर 35.7 अरब डॉलर पर आ गया. हालांकि भारतीय रुपये के कमजोर होने की वजह से घरेलू करेंसी में यह कमाई 2.1 प्रतिशत बढ़कर 3.10 लाख करोड़ रुपये से 3.16 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई, लेकिन डॉलर के मामले में भारत पिछड़ रहा था. अब शून्य ड्यूटी होने से भारतीय निर्यातक ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का पूरा फायदा उठा सकेंगे और वैश्विक बाजार में वियतनाम, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को कड़ी टक्कर दे पाएंगे.
लागत में आएगी कमी
अभी तक भारत में कच्चा कपास मंगाने पर कुल 10.5 प्रतिशत का प्रभावी टैक्स लगता था. इसमें 5 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी, 5 प्रतिशत कृषि बुनियादी ढांचा एवं विकास सेस और 0.5 प्रतिशत का सोशल वेलफेयर सरचार्ज शामिल था. इस टैक्स के हटने से सीधे तौर पर कपास की लागत कम हो जाएगी.
क्यों पड़ी विदेशी कपास की जरूरत?
भारत दुनिया के बड़े कपास उत्पादकों में से एक है, लेकिन देश के कपड़ा उद्योग को बेहतरीन और प्रीमियम धागे बनाने के लिए एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल यानी ईएलएस कपास की जरूरत होती है. इस खास और उच्च गुणवत्ता वाले कपास का उत्पादन भारत में काफी कम होता है. इसके अलावा भारत में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की सुरक्षा मिली हुई है, जिससे कई बार घरेलू बाजार में कपास की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार से ज्यादा हो जाती है.
एक कारण ये भी
ऐसे में भारतीय मिलों के लिए कपड़ा बनाना महंगा पड़ता है. पिछले कुछ सालों में देश के भीतर मौसम की खराबी, कीड़ों के हमले और कम उत्पादकता के कारण कपास की कमी देखी गई है, जिसकी भरपाई के लिए अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से कपास आयात करना पड़ता है. वित्त वर्ष 2026 में भारत में कपास का उत्पादन घटकर 2.91 करोड़ गांठ रहने का अनुमान है, जबकि देश की जरूरत 3.28 करोड़ गांठ से ज्यादा है. इस तरह बाजार में लगभग 37 लाख गांठ की कमी है, जिसे पूरा करने के लिए आयात ही एकमात्र रास्ता बचा है.
कपास उत्पादकता मिशन
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकार ने देश में कपास का उत्पादन बढ़ाने के लिए 5 मई 2026 को ही 5,659 करोड़ रुपये के कपास उत्पादकता मिशन यानी कपास क्रांति को मंजूरी दी है. यह पांच साल की योजना है जिसका लक्ष्य साल 2031 तक देश में कपास का उत्पादन बढ़ाकर करीब पांच करोड़ गांठ तक ले जाना है. सरकार एक तरफ घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए लंबी अवधि की योजना पर काम कर रही है, तो दूसरी तरफ कपड़ा उद्योग की फौरी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात शुल्क में छूट दे रही है. टेक्सटाइल सेक्टर देश में 4.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और जीडीपी में इसका योगदान 2.3 प्रतिशत है, इसलिए सरकार इसके हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकती.
इन राज्यों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा
कस्टम ड्यूटी हटने का सबसे बड़ा फायदा उन राज्यों को मिलेगा जहां कपड़ा मिलें और कताई उद्योग बड़े पैमाने पर मौजूद हैं. तमिलनाडु को इसका सबसे बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है क्योंकि देश की स्पिनिंग क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी राज्य में है. इसके अलावा गुजरात और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख कपास प्रसंस्करण राज्यों में व्यापारिक और निर्यात गतिविधियों में तेजी आएगी. पंजाब और राजस्थान के कपड़ा हब भी कच्चे माल की आसान उपलब्धता का लाभ उठा सकेंगे. गारमेंट बनाने वाले प्रमुख केंद्र जैसे तिरुपुर, लुधियाना, सूरत और बेंगलुरु की कंपनियों को भी कम कीमत पर धागा और कपड़ा मिलने लगेगा, जिससे उनकी उत्पादन लागत कम होगी.
जानकारों की राय
सरकार के इस फैसले से कपड़ा मिलें तो बेहद खुश हैं लेकिन किसान संगठनों और जानकारों ने कुछ चिंताएं भी जताई हैं. जून का महीना कपास की बुवाई का समय होता है. ऐसे में टैक्स फ्री आयात की खबर से घरेलू बाजार में कपास के दाम गिर सकते हैं, जिससे किसान कपास की खेती से दूरी बना सकते हैं. ऑल इंडिया कॉटन एफपीओ एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष डागा का कहना है कि इस फैसले से मिलों को तुरंत राहत मिलेगी, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के मनोबल पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.
निर्यात दोगुना करना होगा आसान
दूसरी ओर कपड़ा उद्योग के संगठन सिटी के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने बताया कि यह आयात सिर्फ विशेष क्वालिटी और पक्के एक्सपोर्ट ऑर्डर के लिए होता है, जिससे घरेलू कपास के बाजार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. कपड़ा उद्यमियों का यह भी कहना है कि अगर सरकार हर साल अप्रैल से अक्टूबर तक ऐसी स्थिर नीति रखे, तो निर्यात को दोगुना करना आसान हो जाएगा.
FAQs
भारत में कपास का सबसे बड़ा आयातक कौन है?
अप्रैल 2021 से फरवरी 2022 के दौरान भारत के कपास निर्यात में बांग्लादेश, चीन और वियतनाम सबसे बड़े खरीदार रहे. इन तीनों देशों ने कुल निर्यात का लगभग 60% हिस्सा लिया, जबकि महामारी के दौरान भी निर्यात जारी रहा.
विश्व में कपास का सबसे बड़ा आयातक देश कौन सा है?
वैश्विक स्तर पर बांग्लादेश भारत से कपास खरीदने वाला सबसे बड़ा देश है. भारत के कुल कपास निर्यात में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक है, जिससे वह प्रमुख आयातक के रूप में स्थापित है.
वर्तमान में विश्व के कपास निर्यातक देशों में भारत का स्थान क्या है?
2026 में, भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कपास-निर्यात करने वाला देश है, जिसकी निर्यात मात्रा आमतौर पर 0.5 से 0.8 मिलियन टन के बीच रहती है.
कपास के शीर्ष 3 निर्यातक कौन हैं?
कपास विश्व की प्रमुख प्राकृतिक फसलों में से एक है. 2024 में भारत लगभग 5.90 मिलियन मीट्रिक टन उत्पादन के साथ सबसे बड़ा कपास उत्पादक रहा. इसके आरामदायक गुणों के कारण वस्त्र उद्योग में इसका व्यापक उपयोग होता है.
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अदाणी फाउंडेशन और अनुष्का फाउंडेशन ने क्लबफुट से पीड़ित 10,000 बच्चों के इलाज में सहायता के लिए शुरू की पहल
कानपुर, 3 जून (आईएएनएस)। अदाणी फाउंडेशन और अनुष्का फाउंडेशन ने बुधवार को पांच राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के माध्यम से क्लबफुट से प्रभावित 10,000 से अधिक बच्चों के उपचार और उसके बाद देखभाल के लिए तीन साल की साझेदारी का ऐलान किया।
वर्ल्ड क्लबफुट डे के अवसर पर शुरू की गई यह पहल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के सहयोग से मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश में लागू की जाएगी।
इस कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ कानपुर, उत्तर प्रदेश के मान्यवर कांशीराम संयुक्त चिकित्सालय और ट्रॉमा सेंटर में किया गया। कानपुर भारत के उन राज्यों में से एक है जहां क्लबफुट के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं।
अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा कि क्लबफुट जैसी उपचार योग्य स्थिति का शीघ्र पता चलने पर किसी भी बच्चे को इसके इलाज से वंचित नहीं रहना चाहिए।
डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा, “प्रत्येक बच्चे को चलने-फिरने, सीखने, खेलने और जीवन में पूर्ण रूप से भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अवसर सृजित करना अदाणी फाउंडेशन के दर्शन का एक अभिन्न अंग रहा है, और यह साझेदारी इसी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।”
क्लबफुट एक जन्मजात स्थिति है जिसमें जन्म के समय एक या दोनों पैर अंदर की ओर मुड़ जाते हैं और यह लगभग हर 800 नवजात शिशुओं में से एक को प्रभावित करता है।
हालांकि विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त पोनसेटी उपचार पद्धति से इस स्थिति को ठीक किया जा सकता है, फिर भी वंचित क्षेत्रों में कई बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है।
इस नई पहल का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य नेटवर्क के माध्यम से शीघ्र पहचान, रेफरल प्रणाली और उपचार तक पहुंच को मजबूत करना है, साथ ही प्रभावित बच्चों के लिए दीर्घकालिक देखभाल और पुनर्वास सहायता में सुधार करना है।
कार्यक्रम के तहत, पांच राज्यों के 61 जिलों में स्थित 67 क्लबफुट क्लीनिकों को उपचार तक पहुंच बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवा क्षमता को मजबूत करने के लिए सहायता प्रदान की जाएगी।
यह पहल क्लबफुट देखभाल में शामिल 51 स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रशिक्षण और सशक्तिकरण में भी सहायता करेगी।
इसके अलावा, 30,000 से अधिक फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों को इस स्थिति के साथ पैदा हुए बच्चों की शीघ्र पहचान और समय पर रेफरल में सुधार के लिए जागरूक किया जाएगा।
अनुष्का फाउंडेशन के संस्थापक दीपक प्रेमनारायण ने कहा कि यह सहयोग शीघ्र निदान और हस्तक्षेप के लिए प्रणालियों को मजबूत करने के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण उपचार तक पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा।
प्रेमनारायण ने आगे कहा, “अदाणी फाउंडेशन के साथ यह साझेदारी पांच राज्यों के 61 जिलों में गुणवत्तापूर्ण उपचार की पहुंच बढ़ाने में मदद करेगी, साथ ही शीघ्र निदान और हस्तक्षेप के लिए प्रणालियों को मजबूत करेगी। साथ मिलकर, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इलाज योग्य बीमारी जीवन भर गतिशीलता और अवसरों में बाधा न बने।”
--आईएएनएस
एबीएस
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