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Kuwait और Bahrain में ईरानी हमले के बाद अमेरिका ने किया पलटवार, युद्ध की आग में झुलस रहा West Asia, शांति वार्ता पर भी संकट

पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। बुधवार तड़के ईरान ने कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइलें और ड्रोन दागे, जिसके बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बन गए। अमेरिकी केंद्रीय कमान के अनुसार अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया गया, जबकि कुछ अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही टूटकर गिर गईं। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप स्थित एक सैन्य ठिकाने पर हमला किया।

हमले के दौरान खाड़ी क्षेत्र का आसमान चमक उठा। कुवैत सिटी के पास अमेरिकी वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय हो गई और उसने अली अल सलेम वायुसेना अड्डे की ओर बढ़ रहे खतरों को रोक लिया। बहरीन की दिशा में दागी गई मिसाइलों को भी अमेरिकी और बहरीनी सेनाओं ने संयुक्त रूप से नष्ट कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान का कोई भी हमला अपने लक्ष्य को भेद नहीं सका। इस तरह की भी खबरें हैं कि कुवैत में हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले के चलते कुछ लोग घायल हुए हैं और फ्लाइटों का संचालन रोका गया है।

देखा जाये तो इस ताजा सैन्य टकराव ने उस संघर्ष को और गंभीर बना दिया है जो इस वर्ष की शुरुआत में अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू करने के बाद से लगातार बढ़ता जा रहा है। दोनों देशों के बीच जवाबी हमलों का सिलसिला जारी है और इससे पूरे क्षेत्र में व्यापक युद्ध की आशंका गहरा गई है। कई दौर की मध्यस्थता और कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद अब तक तनाव कम करने में कोई ठोस सफलता नहीं मिली है।

इसी बीच ईरान की अर्ध सरकारी समाचार एजेंसियों ने दावा किया कि तेहरान ने संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने को लेकर मध्यस्थ देशों से बातचीत रोक दी है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा कि वार्ता अभी भी जारी है। ईरान समर्थित हिजबुल्लाह और इस्राइल के बीच लेबनान सीमा पर बढ़ते तनाव ने भी हालात को और संवेदनशील बना दिया है।

मध्यस्थता से जुड़े एक क्षेत्रीय अधिकारी ने बताया कि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि लेबनान में संघर्ष विराम लागू होने के बाद ही आगे की वार्ता संभव होगी। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने से पहले सख्त शर्तें लागू करना चाहता है।

तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान की ओर जा रहे एक तेल टैंकर को भी रोक दिया। बोत्सवाना के ध्वज वाले इस जहाज ने कथित रूप से चौबीस घंटे तक अमेरिकी चेतावनियों की अनदेखी की। इसके बाद अमेरिकी विमान ने जहाज के इंजन कक्ष पर हेलफायर मिसाइल दाग दी, जिससे वह निष्क्रिय हो गया। अमेरिकी केंद्रीय कमान के अनुसार यह सातवां जहाज था जिसे अमेरिकी नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश में रोका गया।

अमेरिका का आरोप है कि यह जहाज ईरान के खार्ग द्वीप की ओर जा रहा था, जहां से ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूल रहा है। अप्रैल में राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों और तटों तक पहुंचने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी थी। इसके जवाब में ईरान ने फारस खाड़ी जलडमरूमध्य प्राधिकरण बनाकर शुल्क वसूली को औपचारिक रूप दिया। ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य उसके और ओमान के क्षेत्रीय जल से होकर गुजरता है, इसलिए वहां उसकी संप्रभुता मान्य होनी चाहिए।

उधर, संघर्ष का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। कुवैत ने ईरानी हमले के बाद अपने हवाई अड्डे पर उड़ानों को अस्थायी रूप से रोक दिया। वहीं जापान ने ऊर्जा कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी से नागरिकों को राहत देने के लिए उन्नीस अरब डॉलर के अतिरिक्त बजट को मंजूरी दी है। जापानी सरकार ने माना कि पश्चिम एशिया की अनिश्चित स्थिति के कारण पेट्रोल, गैस और बिजली की कीमतों पर भारी दबाव बन रहा है।

वहीं ईरान के भीतर आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। मई में वहां महंगाई दर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के कारण ईरान की तेल आधारित अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। बढ़ती महंगाई और मुद्रा के अवमूल्यन से आम जनता परेशान है। पिछले वर्षों में खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में वृद्धि को लेकर हुए प्रदर्शनों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। इस वर्ष भी मुद्रा संकट के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें इस्लामी गणराज्य के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में माना जा रहा है।

बहरहाल, विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द कोई औपचारिक शांति समझौता नहीं हुआ तो आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता ईरान में एक बार फिर व्यापक जनआंदोलन को जन्म दे सकती है। ऐसे समय में पश्चिम एशिया का यह संकट केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

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नेपाली PM का बड़बोलापन, भारत की जमीन हड़पने का दावा, अब बुरे फंस गए?

सरहद पर खींची गई एक लकीर कभी-कभी सर्दियों तक देशों का पीछा नहीं छोड़ती। भारत और नेपाल की कहानी भी  कुछ ऐसी ही है और करीब 200 साल पहले खींची गई एक सीमा रेखा आज भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा कर देती है। इसी विवाद ने एक बार फिर से सुर्खियां बटोली है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में एक ऐसा दावा कर दिया जिसके बाद खुद उनकी सरकार को सफाई देनी पड़ गई। वह भी दुनिया के सामने। बालेन शाह ने यह कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया बल्कि नेपाल ने भी कुछ जगहों पर भारतीय जमीन पर कब्जा किया है। अब जैसे ही इनका यह बयान सामने आया, नेपाल में राजनीतिक हंगामा मच गया। विपक्ष ने सबूत मांग लिए। पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ने तो सवाल तक उठा दिए और पूर्व राजदूतों ने भी इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। मामला बता दें कि इतना ज्यादा बढ़ गया कि कुछ ही घंटों के अंदर नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई जारी करनी पड़ गई। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह कहा कि प्रधानमंत्री बालेन का मतलब भारत की जमीन पर नेपाल के आधिकारिक कोई भी कब्जे से नहीं था। असल में वह 10 गजा की बात कर रहे थे। 

इसे भी पढ़ें: Balendra Shah के विवादित बयान के बाद Rabi Lamichhane पहुँचे India, BJP Headquarter में भव्य स्वागत, बदल गये South Asia के समीकरण

इसका मतलब क्या होता है? 10 गजा यानी सीमा पर मौजूद वो नो मैनस लैंड जहां सालों के दौरान कुछ लोगों ने खेती शुरू कर दी। कुछ जगह मकान बन गए और कई इलाकों में दोनों तरफ के लोग एक दूसरे की जमीन इस्तेमाल करने लगे। नेपाल सरकार का यह कहना है कि प्रधानमंत्री बालन शाह इसी तरह के क्रॉस बॉर्डर अतिक्रमण की बात कर रहे थे जो उन्होंने संसद में की। लेकिन असली कहानी इससे कहीं पुरानी है। दरअसल बता दें कि इस विवाद की जड़े 1816 की सुगोली संधि तक जाती है। नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए इस समझौते ने आधुनिक भारत नेपाल सीमा उस वक्त तय की थी। समस्या यह थी कि सीमा का जो बड़ा हिस्सा नदियों के आधार पर उस वक्त तय किया गया था और सबसे बड़ा विवाद काली नदी को लेकर पैदा हुआ। समय के साथ नदी का रास्ता बदलता गया। लेकिन नक्शे और दावे अब भी नहीं बदले और यहीं से काला पानी, लिपुलेख और सुस्ता जैसे इलाकों पर विवाद शुरू हुआ। नेपाल का यह दावा है कि काली नदी का वास्तविक स्रोत जो उसका इलाका है वहां से निकलती है। इसलिए यह इलाका उसके पास है और यह नदी पर उसका राइट है। वहीं भारत अपने ऐतिहासिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर इन इलाकों को अपने आधिकारिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है। और फिर बता दें कि इसके बाद आता है साल 2020 का। नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। जिसमें काला पानी, लिपु लेख और जो कई इलाके हैं उसको नेपाल का हिस्सा दिखाया गया उस मैप में जिसने विवाद को और भी ज्यादा बढ़ा दिया। जब यह नक्शा सामने आया तो भारत ने इस कदम को तुरंत खारिज कर दिया और इसे एक तरफ़ा कारवाही बताया। वहीं बता दें कि हाल के वर्षों में लिपु लेख को लेकर विवाद और भी ज्यादा बढ़ा है। 

इसे भी पढ़ें: विदेश मंत्रालय का सीधा जवाब: India-Nepal सीमा विवाद में किसी Third-Party की भूमिका नहीं

खासतौर पर कैलाश मानसरोवर यात्रा की रूट को लेकर नेपाल कई बार अपनी आपत्ति दर्ज करा चुका है। वहीं बता दें कि भारत ने भी अपना रुख इस पूरे मामले पर साफ रखा है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि बालन शाह के हालिया बयान पर भारत ने कोई भी तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रियाएं नहीं दी है। एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि भारत का यह कदम यह दिखाता है कि नई दिल्ली इस पूरे मुद्दे को कोई बड़ा कूटनीतिक विवाद बनाने के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाने की अपनी पुरानी नीति पर अब भी कायम है और शायद इसकी एक वजह दोनों देशों के गहरे रिश्ते भी है। भारत ने कई बार नेपाल की मदद की है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। लाखों नेपाली नागरिक भारत काम करने के लिए आते हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। दुनिया की चुनिंदा सीमाओं में से एक ऐसी सीमा जहां दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा के आ जा सकते हैं। भूकंप जैसे मुश्किल समय में भी लगातार भारत नेपाल की मदद की है। चाहे वो कोई भी क्षेत्र क्यों ना हो। लेकिन अब सुनिए आप सबसे दिलचस्प तथ्य। 

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भारत और नेपाल की सीमा लगभग 1880 कि.मी. लंबी है। और सीमा एक्सपर्ट्स के मुताबिक 97% सीमा पहले से ही तय और स्वीकार की जा चुकी है। यानी पूरा विवाद पूरी सीमा को लेकर नहीं है। जो 97% हिस्सा पहले ही सुलझा हुआ है। झगड़ा सिर्फ कुछ छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इलाकों को लेकर अब भी है और शायद यही वजह है कि 200 साल बाद भी यह विवाद जो है वो पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया क्योंकि आखिर में सवाल सिर्फ जमीन का नहीं होता है। सवाल इतिहास का भी होता है। नक्शे का भी होता है और राष्ट्रीय दावों का भी होता है। और इसलिए बता दें कि आज भी एक सवाल अब भी बाकी है और बार-बार पूछा जाता है कि अगर भारत और नेपाल की जो 97% सीमा विवाद सुलझ चुका है तो फिर बाकी का जो 3% रह गया है उसमें ऐसा क्या है जो आज भी भारत और नेपाल के रिश्तों में यह 3% जो है वो तनाव पैदा कर देता है।

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