मिचेल स्टार्क ने रचा इतिहास, टेस्ट क्रिकेट में ऐसा करने वाले बने दुनिया के नंबर-1 गेंदबाज
Mitchell Starc: ऑस्ट्रेलिया के स्टार तेज गेंदबाज मिचेल स्टार्क ने टेस्ट क्रिकेट में इतिहास रच दिया है. ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश के बीच टेस्ट सीरीज का 13 अगस्त से आगाज हो चुका है. पहले टेस्ट मैच के पहले ही दिन ऑस्ट्रेलिया की टीम 198 रनों पर ऑलआउट हो गई. इसके बाद जब बांग्लादेश की बल्लेबाजी शुरू हुई तो मिचेल स्टार्क ने टीम को पहला विकेट दिलाया. इसी के साथ मिचेल स्टार्क ने एक बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज किया. स्टार्क अब टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बाएं हाथ के गेंदबाज बन गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह कारनामा इंटरनेशनल लेफ्ट हैंडर्स डे पर किया है.
मिचेल स्टार्क ने टेस्ट क्रिकेट में बनाया बड़ा रिकॉर्ड
मिचेल स्टार्क ने बांग्लादेश की पारी के 9वें ओवर की दूसरी ही गेंद पर ओपनर सादमान इस्लाम को आउट कर पवेलियन भेजा. नाथन लॉयन ने कैच लपका. इस विकेट के साथ ही मिचेल स्टार्क ने टेस्ट क्रिकेट में अपने 434 विकेट पूरे कर लिए और टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले दुनिया के पहले बाएं हाथ के गेंदबाज बन गए हैं.
टेस्ट क्रिकेट में बाएं हाथ के गेंदबाजों द्वारा सबसे अधिक विकेट लेने के मामले में रंगाना हेराथ दूसरे नंबर पर हैं. उन्होंने कुल 433 विकेट चटकाए हैं. इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर पाकिस्तान के पूर्व दिग्गज वसीम अकरम हैं, जिनके नाम कुल 414 विकेट हैं. न्यूजीलैंड के डैनियल विटोरी 362 विकेट के साथ चौथे नंबर पर हैं, जबकि श्रीलंका के दिग्गज चमिंडा वास पांचवें नंबर पर हैं, जिन्होंने कुल 355 विकेट अपने नाम किए हैं.
HISTORY BY MITCHELL STARC ????
— Johns. (@CricCrazyJohns) August 13, 2026
- He has now most wickets by a left arm bowler in Test history. pic.twitter.com/QIyj3GWqWL
बंगाल का विभाजन: चुनावी राजनीति से सांप्रदायिक हिंसा तक, 1947 से पहले कैसे बदले हालात?
राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता का एक और उत्सव मना रहा है, जिधर देखिए तिरंगा लहरा रहा है। शहर से लेकर गाँव तक और हमारी सीमाओं तक तिरंगा लिए देशप्रेमी अपने उद्गार व्यक्त कर रहे हैं जिनके दृश्य मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में भी पटे पड़े हैं।
इन उत्सवों के बीच नई पीढ़ी जिसे जेन जी और जेन अल्फ़ा सहित तमाम नामकरणों से नवाजा गया है, भारत के उज्ज्वल भविष्य को साकार करने का दम भर रही है तो भारत के समाज में हर वर्ग के लोग भारतीयता और राष्ट्रभक्ति में ओत प्रोत नज़र आ रहे हैं।
इस वर्ष आजादी के 80 साल पूरे होने जा रहे हैं लेकिन जब हम मुड़कर अपनी आजादी की दहलीज पर खड़े होते हैं तो इतिहास के पन्ने वतन पर मर मिटने वालों से भरे दिखते हैं, साथ हीं दिखते हैं वे हालात और रक्त रंजीत दृश्य जिसने भारत विभाजन की रेखाएं खींची।
15 अगस्त 1947, एक तरफ आजादी की रोशनी तो दूसरी तरफ विभाजन का दंश लेकर आया जिसे भूलना इतिहास से मुँह मोड़ लेने जैसा है। मौजूदा हालात में बंगाल और बांग्लादेश दोनों हीं चर्चा के केंद्र में है जिसके अपने कारण है तो ऐसे में वर्तमान को समझने के लिए इतिहास की पृष्ठभूमि में जाना भी जरूरी है। भारत विभाजन का बंगाल पर गहरा सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा। विभाजन से पहले के वर्षों में बंगाल की राजनीति में सत्ता-संतुलन, सांप्रदायिक तनाव और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर हिंदू समाज में अविश्वास बढ़ता गया। 1937 के प्रांतीय चुनावों से लेकर 1946 की कलकत्ता और नोआखाली हिंसा तथा इसके बाद पूर्वी बंगाल से बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन ने इस प्रक्रिया को और गहरा किया।
1937 के चुनाव से बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण
1937 के प्रांतीय चुनावों में बंगाल विधानसभा में कांग्रेस को 52 सीटें मिलीं, जो किसी एक दल की सबसे अधिक सीटें थीं। मुस्लिम लीग को 40 और फजलुल हक के नेतृत्व वाली कृषक प्रजा पार्टी को 36 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार नहीं उतारे थे और उसने फजलुल हक की पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को परोक्ष समर्थन भी दिया था।
1 अप्रैल 1937 को फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम लीग को मुस्लिम मतों का लगभग 27 प्रतिशत, जबकि कृषक प्रजा पार्टी को लगभग 31 प्रतिशत मुस्लिम मत मिले थे।
बाद में मुस्लिम लीग ने कृषक प्रजा पार्टी को अपने प्रभाव में ले लिया। इसके बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले और हिंदू समाज के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई कि प्रशासन, पुलिस और सरकारी संस्थाओं की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
सुहरावर्दी सरकार और प्रतिनिधित्व का सवाल
अप्रैल 1946 में हुसैन शहीद सुहरावर्दी बंगाल के प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में मंत्रिमंडल की संरचना को लेकर भी विवाद सामने आया। मंत्रिमंडल में हिंदू प्रतिनिधित्व घटने से हिंदू समाज के बीच राजनीतिक असुरक्षा की भावना बढ़ी।
इसी दौर में बंगाल को दिल्ली से अलग राजनीतिक दिशा देने की मांग और मुस्लिम लीग की राजनीति ने सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाया।
16 अगस्त 1946: डायरेक्ट एक्शन डे और कलकत्ता हिंसा
मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को 'डायरेक्ट एक्शन डे' मनाने का आह्वान किया गया। सुहरावर्दी सरकार ने इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया। इसके बाद कलकत्ता में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर जमा हुए और जल्द ही व्यापक सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई। पुलिस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार कलकत्ता के अधिकांश पुलिस थानों में मुस्लिम अधिकारी प्रभारी थे और हिंसा के दौरान पुलिस की भूमिका तथा प्रशासन की प्रतिक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए।
हिंसा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए। हालांकि मृतकों और घायलों की संख्या को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। इस हिंसा ने बंगाल के हिंदू समाज में सुरक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर गहरे सवाल खड़े किए।
नोआखाली और तिप्परा में हिंसा
अक्टूबर 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखाली और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 10 अक्टूबर 1946, कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दौरान कई इलाकों में हिंदू परिवारों को निशाना बनाया गया।
रामगंज, बेगमगंज, रायपुर, लक्ष्मीपुर, छागलनैया और संद्वीप सहित कई क्षेत्रों में हिंसा की घटनाएं सामने आईं। तिप्परा के हाजीगंज, फरीदगंज, चांदपुर, लक्षाम और चौद्दाग्राम जैसे क्षेत्रों में भी हिंसा की रिपोर्टें सामने आईं।
कई स्थानों पर घरों को आग लगाने, लूटपाट, हत्या, जबरन धर्मांतरण और महिलाओं के अपहरण जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। हिंसा की प्रकृति और पैमाने को लेकर उस समय कांग्रेस नेताओं, स्थानीय लोगों तथा प्रशासन के बीच गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
तत्कालीन बंगाल सरकार के विधानसभा रिकॉर्ड से जुड़े विवरणों में भी जबरन धर्मांतरण के मामलों का उल्लेख मिलता है। हालांकि अलग-अलग इतिहासकारों और स्रोतों द्वारा घटनाओं के आंकड़ों और स्वरूप को लेकर अलग-अलग आकलन प्रस्तुत किए गए हैं।
हिंसा का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कलकत्ता, नोआखाली और अन्य क्षेत्रों की हिंसा ने केवल जान-माल का नुकसान नहीं किया, बल्कि समुदायों के बीच विश्वास को भी गहरा नुकसान पहुंचाया। बड़ी संख्या में परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े। हिंसा, विस्थापन, संपत्ति के नुकसान और सामाजिक असुरक्षा ने पूर्वी बंगाल के हिंदुओं के बीच भविष्य को लेकर भय और अनिश्चितता पैदा की। यही परिस्थितियां आगे चलकर 1947 के विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर आबादी के स्थानांतरण का एक महत्वपूर्ण कारण बनीं।
विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में रह गए लाखों हिंदू
1947 में बंगाल के विभाजन के बाद उसका पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान का हिस्सा बनकर पूर्वी पाकिस्तान बना। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अविभाजित बंगाल के लगभग 1.14 करोड़ हिंदुओं में से करीब 42 प्रतिशत हिंदू पूर्वी पाकिस्तान में रह गए। लेकिन विभाजन के बाद सांप्रदायिक तनाव और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में लोग पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों की ओर आने लगे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल पहुंचने वाले शरणार्थियों की संख्या 1947 में लगभग 3.44 लाख, 1948 में करीब 7.86 लाख और 1949 में लगभग 2.13 लाख रही। 1950 की सांप्रदायिक हिंसा के बाद लगभग 10 लाख और लोगों के विस्थापित होकर भारत आने का उल्लेख मिलता है। 1951 की जनगणना के अनुसार पूर्वी बंगाल से भारत आए शरणार्थियों की संख्या लगभग 25.23 लाख दर्ज की गई।
विश्वास टूटने की प्रक्रिया को कैसे समझें?
बंगाल के हिंदुओं में शासन-व्यवस्था के प्रति विश्वास टूटने की प्रक्रिया को केवल किसी एक घटना से नहीं जोड़ा जा सकता। 1937 के बाद बदलते राजनीतिक समीकरण, मुस्लिम लीग का बढ़ता प्रभाव, प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद, 1946 की कलकत्ता हिंसा, नोआखाली की घटनाएं और उसके बाद हुआ बड़े पैमाने का विस्थापन, इन सभी ने मिलकर इस अविश्वास को गहरा किया।
इस पूरे दौर को समझने के लिए सरकारी रिकॉर्ड, विधानसभा की कार्यवाही, जनगणना के आंकड़े, समकालीन समाचार रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी विवरण और अलग-अलग इतिहासकारों के शोध को साथ रखकर देखना आवश्यक है। विशेष रूप से हिंसा में मृतकों, घायलों, जबरन धर्मांतरण और विस्थापन के आंकड़ों में स्रोतों के बीच अंतर मिलता है, इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम और निर्विवाद मानने के बजाय उसके स्रोत और संदर्भ को देखना जरूरी है। 1947 का विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था; बंगाल में इसने करोड़ों लोगों की सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक जिंदगी को प्रभावित किया और इसका असर आज भी देखा जा रहा है चाहे बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण बंगाल में बिगड़ते हालात हों या फिर बांग्लादेश की सत्ता में बढ़ता कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहा जिहाद हो।
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