बंगाल का विभाजन: चुनावी राजनीति से सांप्रदायिक हिंसा तक, 1947 से पहले कैसे बदले हालात?
राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता का एक और उत्सव मना रहा है, जिधर देखिए तिरंगा लहरा रहा है। शहर से लेकर गाँव तक और हमारी सीमाओं तक तिरंगा लिए देशप्रेमी अपने उद्गार व्यक्त कर रहे हैं जिनके दृश्य मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में भी पटे पड़े हैं।
इन उत्सवों के बीच नई पीढ़ी जिसे जेन जी और जेन अल्फ़ा सहित तमाम नामकरणों से नवाजा गया है, भारत के उज्ज्वल भविष्य को साकार करने का दम भर रही है तो भारत के समाज में हर वर्ग के लोग भारतीयता और राष्ट्रभक्ति में ओत प्रोत नज़र आ रहे हैं।
इस वर्ष आजादी के 80 साल पूरे होने जा रहे हैं लेकिन जब हम मुड़कर अपनी आजादी की दहलीज पर खड़े होते हैं तो इतिहास के पन्ने वतन पर मर मिटने वालों से भरे दिखते हैं, साथ हीं दिखते हैं वे हालात और रक्त रंजीत दृश्य जिसने भारत विभाजन की रेखाएं खींची।
15 अगस्त 1947, एक तरफ आजादी की रोशनी तो दूसरी तरफ विभाजन का दंश लेकर आया जिसे भूलना इतिहास से मुँह मोड़ लेने जैसा है। मौजूदा हालात में बंगाल और बांग्लादेश दोनों हीं चर्चा के केंद्र में है जिसके अपने कारण है तो ऐसे में वर्तमान को समझने के लिए इतिहास की पृष्ठभूमि में जाना भी जरूरी है। भारत विभाजन का बंगाल पर गहरा सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा। विभाजन से पहले के वर्षों में बंगाल की राजनीति में सत्ता-संतुलन, सांप्रदायिक तनाव और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर हिंदू समाज में अविश्वास बढ़ता गया। 1937 के प्रांतीय चुनावों से लेकर 1946 की कलकत्ता और नोआखाली हिंसा तथा इसके बाद पूर्वी बंगाल से बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन ने इस प्रक्रिया को और गहरा किया।
1937 के चुनाव से बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण
1937 के प्रांतीय चुनावों में बंगाल विधानसभा में कांग्रेस को 52 सीटें मिलीं, जो किसी एक दल की सबसे अधिक सीटें थीं। मुस्लिम लीग को 40 और फजलुल हक के नेतृत्व वाली कृषक प्रजा पार्टी को 36 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार नहीं उतारे थे और उसने फजलुल हक की पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को परोक्ष समर्थन भी दिया था।
1 अप्रैल 1937 को फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम लीग को मुस्लिम मतों का लगभग 27 प्रतिशत, जबकि कृषक प्रजा पार्टी को लगभग 31 प्रतिशत मुस्लिम मत मिले थे।
बाद में मुस्लिम लीग ने कृषक प्रजा पार्टी को अपने प्रभाव में ले लिया। इसके बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले और हिंदू समाज के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई कि प्रशासन, पुलिस और सरकारी संस्थाओं की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
सुहरावर्दी सरकार और प्रतिनिधित्व का सवाल
अप्रैल 1946 में हुसैन शहीद सुहरावर्दी बंगाल के प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में मंत्रिमंडल की संरचना को लेकर भी विवाद सामने आया। मंत्रिमंडल में हिंदू प्रतिनिधित्व घटने से हिंदू समाज के बीच राजनीतिक असुरक्षा की भावना बढ़ी।
इसी दौर में बंगाल को दिल्ली से अलग राजनीतिक दिशा देने की मांग और मुस्लिम लीग की राजनीति ने सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाया।
16 अगस्त 1946: डायरेक्ट एक्शन डे और कलकत्ता हिंसा
मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को 'डायरेक्ट एक्शन डे' मनाने का आह्वान किया गया। सुहरावर्दी सरकार ने इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया। इसके बाद कलकत्ता में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर जमा हुए और जल्द ही व्यापक सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई। पुलिस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार कलकत्ता के अधिकांश पुलिस थानों में मुस्लिम अधिकारी प्रभारी थे और हिंसा के दौरान पुलिस की भूमिका तथा प्रशासन की प्रतिक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए।
हिंसा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए। हालांकि मृतकों और घायलों की संख्या को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। इस हिंसा ने बंगाल के हिंदू समाज में सुरक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर गहरे सवाल खड़े किए।
नोआखाली और तिप्परा में हिंसा
अक्टूबर 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखाली और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 10 अक्टूबर 1946, कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दौरान कई इलाकों में हिंदू परिवारों को निशाना बनाया गया।
रामगंज, बेगमगंज, रायपुर, लक्ष्मीपुर, छागलनैया और संद्वीप सहित कई क्षेत्रों में हिंसा की घटनाएं सामने आईं। तिप्परा के हाजीगंज, फरीदगंज, चांदपुर, लक्षाम और चौद्दाग्राम जैसे क्षेत्रों में भी हिंसा की रिपोर्टें सामने आईं।
कई स्थानों पर घरों को आग लगाने, लूटपाट, हत्या, जबरन धर्मांतरण और महिलाओं के अपहरण जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। हिंसा की प्रकृति और पैमाने को लेकर उस समय कांग्रेस नेताओं, स्थानीय लोगों तथा प्रशासन के बीच गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
तत्कालीन बंगाल सरकार के विधानसभा रिकॉर्ड से जुड़े विवरणों में भी जबरन धर्मांतरण के मामलों का उल्लेख मिलता है। हालांकि अलग-अलग इतिहासकारों और स्रोतों द्वारा घटनाओं के आंकड़ों और स्वरूप को लेकर अलग-अलग आकलन प्रस्तुत किए गए हैं।
हिंसा का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कलकत्ता, नोआखाली और अन्य क्षेत्रों की हिंसा ने केवल जान-माल का नुकसान नहीं किया, बल्कि समुदायों के बीच विश्वास को भी गहरा नुकसान पहुंचाया। बड़ी संख्या में परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े। हिंसा, विस्थापन, संपत्ति के नुकसान और सामाजिक असुरक्षा ने पूर्वी बंगाल के हिंदुओं के बीच भविष्य को लेकर भय और अनिश्चितता पैदा की। यही परिस्थितियां आगे चलकर 1947 के विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर आबादी के स्थानांतरण का एक महत्वपूर्ण कारण बनीं।
विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में रह गए लाखों हिंदू
1947 में बंगाल के विभाजन के बाद उसका पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान का हिस्सा बनकर पूर्वी पाकिस्तान बना। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अविभाजित बंगाल के लगभग 1.14 करोड़ हिंदुओं में से करीब 42 प्रतिशत हिंदू पूर्वी पाकिस्तान में रह गए। लेकिन विभाजन के बाद सांप्रदायिक तनाव और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में लोग पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों की ओर आने लगे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल पहुंचने वाले शरणार्थियों की संख्या 1947 में लगभग 3.44 लाख, 1948 में करीब 7.86 लाख और 1949 में लगभग 2.13 लाख रही। 1950 की सांप्रदायिक हिंसा के बाद लगभग 10 लाख और लोगों के विस्थापित होकर भारत आने का उल्लेख मिलता है। 1951 की जनगणना के अनुसार पूर्वी बंगाल से भारत आए शरणार्थियों की संख्या लगभग 25.23 लाख दर्ज की गई।
विश्वास टूटने की प्रक्रिया को कैसे समझें?
बंगाल के हिंदुओं में शासन-व्यवस्था के प्रति विश्वास टूटने की प्रक्रिया को केवल किसी एक घटना से नहीं जोड़ा जा सकता। 1937 के बाद बदलते राजनीतिक समीकरण, मुस्लिम लीग का बढ़ता प्रभाव, प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद, 1946 की कलकत्ता हिंसा, नोआखाली की घटनाएं और उसके बाद हुआ बड़े पैमाने का विस्थापन, इन सभी ने मिलकर इस अविश्वास को गहरा किया।
इस पूरे दौर को समझने के लिए सरकारी रिकॉर्ड, विधानसभा की कार्यवाही, जनगणना के आंकड़े, समकालीन समाचार रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी विवरण और अलग-अलग इतिहासकारों के शोध को साथ रखकर देखना आवश्यक है। विशेष रूप से हिंसा में मृतकों, घायलों, जबरन धर्मांतरण और विस्थापन के आंकड़ों में स्रोतों के बीच अंतर मिलता है, इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम और निर्विवाद मानने के बजाय उसके स्रोत और संदर्भ को देखना जरूरी है। 1947 का विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था; बंगाल में इसने करोड़ों लोगों की सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक जिंदगी को प्रभावित किया और इसका असर आज भी देखा जा रहा है चाहे बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण बंगाल में बिगड़ते हालात हों या फिर बांग्लादेश की सत्ता में बढ़ता कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहा जिहाद हो।
भ्रामक दावों और स्वच्छता नियमों के गंभीर उल्लंघन पर एफएसएसएआई का बड़ा एक्शन; एबी एंटरप्राइज, जाइका ऑर्गेनिक्स और नारायणी फूड्स के लाइसेंस निलंबित
नई दिल्ली, 13 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीन खाद्य व्यवसाय संचालकों के लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं। नियामक ने कहा कि इन कंपनियों के खिलाफ भ्रामक दावे करने, अत्यंत खराब स्वच्छता व्यवस्था बनाए रखने और खाद्य सुरक्षा मानकों के गंभीर उल्लंघन के मामले सामने आए हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को जोखिम हो सकता था।
एफएसएसएआई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि मेघालय की ए.बी. एंटरप्राइज तथा ओडिशा की जाइका ऑर्गेनिक्स (ओपीसी) प्राइवेट लिमिटेड और नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के लाइसेंस निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई के बाद निलंबित कर दिए गए हैं।
ए.बी. एंटरप्राइज के मामले में एफएसएसएआई ने पाया कि कंपनी अपने उत्पादों के लेबल और प्रचार सामग्री में स्वास्थ्य लाभ से जुड़े दावे कर रही थी, जो फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (एडवरटाइजिंग एंड क्लेम्स) रेगुलेशंस, 2018 का उल्लंघन है। जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी अपने एफएसएसएआई लाइसेंस में आवश्यक विनिर्माण स्वीकृति के बिना खाद्य उत्पादों का कारोबार कर रही थी।
नियामक के अनुसार, कंपनी को सुधार नोटिस जारी किया गया था और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी दिया गया था, ताकि वह अपना पक्ष रख सके। हालांकि, कंपनी की ओर से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। एफएसएसएआई ने कहा कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकते हैं और उनके खरीद व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए, कंपनी को अगले आदेश तक सभी खाद्य कारोबार गतिविधियां रोकने का निर्देश दिया गया है।
दूसरी ओर, जाइका ऑर्गेनिक्स (ओपीसी) प्राइवेट लिमिटेड के संयंत्र में निरीक्षण के दौरान व्यापक स्तर पर स्वच्छता और सैनिटेशन संबंधी कमियां पाई गईं।
एफएसएसएआई ने बताया कि खाद्य उत्पादों का निर्माण, पैकेजिंग और भंडारण अस्वच्छ परिस्थितियों में किया जा रहा था। इसके अलावा, खराब हाउसकीपिंग, कीट नियंत्रण से जुड़ी समस्याएं, जंग लगे उपकरण, कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अनुचित भंडारण तथा उत्पादन प्रक्रियाओं में आवश्यक नियंत्रण का अभाव पाया गया।
निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ उत्पादों और सामग्री पर निर्माण तिथि, बैच नंबर और उपयोग की अंतिम तिथि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां अंकित नहीं थीं। अनुपालन मूल्यांकन में कंपनी को 90 में से केवल 10 अंक यानी 12 प्रतिशत प्राप्त हुए, जो नॉन-कम्प्लायंस श्रेणी में आता है।
एफएसएसएआई ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और जैविक जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं, जो सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से कंपनी का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
इसी तरह, नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की गई। निरीक्षण में कंपनी के उत्पादन परिसर में अत्यंत खराब स्वच्छता व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली में गंभीर कमियां पाई गईं। जांच के दौरान प्रसंस्करण और भंडारण क्षेत्रों में मक्खियां, मकड़ी के जाले, कीटों के प्रवेश मार्ग, जल स्रोतों के आसपास शैवाल की मौजूदगी, जंग लगे उपकरण और खाद्य सामग्री के पास कचरे का जमाव पाया गया।
इसके अलावा, तैयार उत्पादों के भंडारण की व्यवस्था भी मानकों के अनुरूप नहीं थी और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया में भी कई खामियां मिलीं। एफएसएसएआई ने पाया कि खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड और नियंत्रण नमूनों से जुड़े दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं थे।
नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज को अनुपालन मूल्यांकन में 80 में से केवल 20 अंक यानी 25 प्रतिशत स्कोर मिला, जो इसे भी नॉन-कम्प्लायंस श्रेणी में रखता है।
एफएसएसएआई ने कहा कि अनिवार्य स्वच्छता और सैनिटेशन मानकों के गंभीर उल्लंघन तथा उससे उत्पन्न खाद्य सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए कंपनी का लाइसेंस भी तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है।
नियामक ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा और नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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