पुतिन पहली बार जापान के दावे वाले कुरील आइलैंड पहुंचे:जापान बोला- ये हमारा हिस्सा; 80 साल से 4 द्वीपों को लेकर दोनों में विवाद
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को पहली बार जापान के दावे वाले विवादित कुरील द्वीप समूह का दौरा किया। क्रेमलिन ने पुतिन के दौरे का वीडियो जारी किया। उन्होंने कुरील द्वीप पर एक फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया। पुतिन की इस यात्रा के बाद जापान ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि यह इलाका उसका हिस्सा है। रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में 4 द्वीपों को लेकर 80 साल से विवाद है। जापान इसे नॉर्दर्न टेरिटरीज कहता है जबकि रूस इन्हें कुरील आइलैंड ग्रुप का हिस्सा मानता है। पुतिन की दौरे से जुड़ी 2 फोटोज रूस और जापान में 4 द्वीपों को लेकर विवाद रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में स्थित चार द्वीपों को लेकर विवाद है। जापान इन्हें नॉर्दर्न टेरिटरीज (उत्तरी क्षेत्र) कहता है, जबकि रूस इन्हें कुरील द्वीप समूह का हिस्सा मानता है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद यहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी नागरिकों को वहां से हटा दिया गया। 1945 में इन द्वीपों पर कब्जा करने के बाद सोवियत संघ ने यहां हवाई और नौसैनिक अड्डे बनाए। प्रशांत महासागर में अहम जगह पर होने की वजह से इनका सैन्य महत्व बढ़ता गया। आज भी रूस यहां बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात रखता है। तब से इन द्वीपों पर रूस का नियंत्रण है और उसने यहां सैन्य ठिकाने भी बना रखे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ज्यादातर देशों ने आपस में शांति समझौते (पीस ट्रीटी) पर हस्ताक्षर कर दिए थे। कुरील द्वीपों के विवाद की वजह से रूस और जापान आज तक ऐसा नहीं कर पाए हैं। दोनों देशों में नाम लगभग एक जैसे खास बात यह है कि इन विवादित द्वीपों के नाम दोनों देशों में लगभग एक जैसे हैं। रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई कहता है, जबकि जापान इन्हें कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई के नाम से जानता है। इन चारों द्वीपों पर करीब 20 हजार लोग रहते हैं। यहां बहुत ठंड पड़ती है, लेकिन सोना-चांदी जैसे खनिज और मछलियों के बड़े भंडार होने की वजह से इन द्वीपों की आर्थिक अहमियत काफी ज्यादा है। रूस 2 द्वीप देने का तैयार हुआ, जापान नहीं माना 1956 में सोवियत संघ और जापान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद विवाद सुलझाने की कोशिश शुरू हुई। उस समय सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने शांति समझौते के बदले शिकोतान और हाबोमाई द्वीप जापान को लौटाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन जापान चार से कम मानने को तैयार नहीं था। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद भी रूस और जापान के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 2010 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव इन विवादित द्वीपों का दौरा करने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति बने। इसके बाद रूस ने यहां अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत की, जबकि जापान लगातार अपना दावा दोहराता रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गए। अब पुतिन का यह दौरा इन विवादित द्वीपों पर रूस के दावे को फिर से मजबूत करने के मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है। --------------------------- जापान में 200kmph की रफ्तार से आया डॉल्फिन तूफान:2.6 लाख लोगों को घर छोड़ने का आदेश; टोयोटा ने 9 फैक्ट्रियों में काम रोका जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
'टाइम100' फेम एरियाना ने हफिंगटन पोस्ट को ग्लोबल ब्रांड बनाया:आइडेंटिटी ट्रैप पर कहा- कई सीईओ जॉब से नाखुश, फिर भी नहीं छोड़ पाते पद
करोड़ों की सैलरी, सीईओ जैसा पद और दुनिया भर में रुतबा हासिल करने के बाद भी कई दिग्गज खुश नहीं हैं। ये कहना है ग्लोबल मीडिया ब्रांड हफिंगटन पोस्ट की संस्थापक एरियाना हफिंगटन (76) का। वो कहती हैं कि उनके कई सीईओ दोस्त अपनी नौकरी से लगाव खत्म होने के बावजूद छोड़ने से घबराते हैं। इसकी वजह ‘आइडेंटिटी ट्रैप’ यानी पहचान का जाल है। जब कोई बड़ा पद किसी व्यक्ति की पूरी पहचान बन जाता है, तो उसे छोड़ना सिर्फ सैलरी नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को खोने जैसा लगने लगता है। 11 वर्ष में कंपनी शिखर पर पहुंचाई, फिर खुद ही छोड़ा पद एरियाना निजी अनुभवों से बताती हैं कि 11 वर्षों की कड़ी मेहनत से उन्होंने अपनी कंपनी को शीर्ष पर पहुंचाया। दो बार ‘टाइम 100’ सूची में आईं। हजार करोड़ नेटवर्थ वाली एरियाना ने 2016 में शीर्ष पर पहुंचकर पद छोड़ा और नई हेल्थ-वेलनेस कंपनी शुरू की। वे कहती हैं कि अगर पुरानी सफलता, पद और सुरक्षा को बचाए रखने के लिए वहां टिकी रहतीं, तो यह खुद के साथ धोखा होता। एरियाना का मानना है कि किसी नौकरी या सफलता को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने देना चाहिए। पद कितना प्रतिष्ठित दिखता है, उससे ज्यादा अहम यह है कि वह काम व्यक्ति को भीतर से कैसा महसूस करा रहा है। 4 सीईओ बता रहे कामयाबी के बाद भी क्यों लगा अधूरापन शीर्ष पर पहुंचकर 4300 करोड़ कमाने के बावजूद भी खालीपन अमेरिकी फूड चेन कंपनी ‘विंगस्टॉप यूके’ के सह-संस्थापक टॉम ग्रोगन ने कंपनी को सफल बनाया। इस बीच शेयर्स बेचकर 4300 करोड़ रुपए कमाए। लक्ष्य तो हासिल हो गया, लेकिन खुशी के बजाय उन्हें सिर्फ खालीपन महसूस हुआ। उनका कहना था कि सफलता ही उनकी पहचान बन गई थी, लक्ष्य पूरा होते ही आगे बढ़ने की वजह और मकसद धुंधला पड़ गया। शोहरत और पैसा मिला, लेकिन जिंदगी का मकसद खो गया ट्रैवल कंपनी ‘एयरबीएनबी’ के सह-संस्थापक ब्रायन मानते थे कि सफलता सारी समस्याएं हल कर देगी। 2020 में वे अरबपति बनें, लेकिन बाद का समय उदासी भरा था। - टेक कंपनी लूम के को-फाउंडर विनय हायरमैथ ने कंपनी बेचने के बाद खुद को दिशाहीन पाया। कंपनी से जुड़ी पहचान हटते ही लगा कि खुद को खो चुके हैं। पद ही पहचान ‘बड़ा संकट’ अमेरिकी कंपनी (टीआईएए) की सीईओ थसुंडा कहती हैं कि नौकरी के बिना उनकी पहचान कुछ नहीं है। हालांकि, पद अस्थायी होते हैं लेकिन मौजूदा दिनों में इसके उलट भावना देखने को मिल रही है। लोग इन दिनों पद को ही पहचान मानने लगे हैं।
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