नई दिल्ली: 18वें हेबिटेट फिल्म फेस्टिवल का समापन 24 मई 2026 को हुआ। भारत पर्यावास केंद्र में दस दिनों तक चले सिनेमा के इस उत्सव में 10,000 से अधिक दर्शक शामिल हुए। फेस्टिवल का समापन प्रशंसित मराठी फीचर फिल्म तिघी के साथ हुआ। इस आयोजन ने एक बार फिर खुद को वैकल्पिक, क्षेत्रीय और स्वतंत्र भारतीय कहानियों के प्रमुख मंच के रूप में स्थापित किया।
फेस्टिवल की शानदार सफलता पर इंडिया हेबिटेट सेंटर के निदेशक और फेस्टिवल डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश ने कहा, “हेबिटेट फिल्म फेस्टिवल का हर संस्करण सिनेमा को एक जीवंत, सांस लेती हुई बातचीत के रूप में हमारे विश्वास की पुनः पुष्टि करता है — जो पीढ़ियों, भाषाओं और संस्कृतियों को जोड़ता है। इस वर्ष भी हमने एक बार फिर देखा कि अच्छी कहानी, चाहे वह किसी दिग्गज फिल्मकार की हो या पहली बार फिल्म बना रहे निर्देशक की, दर्शकों को कैसे प्रभावित, उकसा और एकजुट कर सकती है।
18वें संस्करण के समापन पर हम न केवल शानदार फिल्मों की यादें साथ ले जा रहे हैं, बल्कि इस प्रतिबद्धता को भी नवीनीकृत कर रहे हैं कि हर सिनेमाई आवाज — चाहे वह कितनी भी स्वतंत्र या क्षेत्रीय हो — को अपना घर मिले।”
समापन समारोह के मुख्य अतिथि दूरदर्शन के महानिदेशक सतीश नंबूरिपाड ने कहा, “हेबिटेट फिल्म फेस्टिवल एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य करता है, जो मुख्यधारा के सिनेमा द्वारा अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली भारतीय सिनेमा की भाषाओं, बनावट और आवाजों का उत्सव मनाता है। यह देखकर बेहद खुशी हो रही है कि ऐसा मंच हमारे सिनेमाई विरासत को संरक्षित करते हुए उन उभरती आवाजों को भी साहसपूर्वक जगह दे रहा है, जो भारतीय फिल्म निर्माण के भविष्य को आकार दे रही हैं।”
15 से 24 मई 2026 तक आयोजित एचएफएफ 2026 में 20 भाषाओं की 79 फिल्में प्रदर्शित की गईं — जिनमें 45 फीचर फिल्में, 19 शॉर्ट फिल्में और 15 डॉक्यूमेंट्री शामिल थीं। रिस्टोर्ड क्लासिक्स में अशा भोसले की कला को समर्पित उमराव जान और धर्मेंद्र व असरानी की विरासत को श्रद्धांजलि देते चुपके चुपके शामिल थे। रित्विक घाटक की चार फिल्मों की रेट्रोस्पेक्टिव में मेघे ढाका तारा, कोमल गंधार, सुवर्णरेखा और जुक्ति तक्को आर गप्पो दिखाई गईं।
समकालीन चयन में मोहम, पोरशी, शवपेट्टी, कड़कनाथ और तिघी जैसी फिल्मों के माध्यम से साहसी नई आवाजों को जगह दी गई। कार्यक्रम में 15 से अधिक महिला फिल्मकारों की रचनाएं शामिल थीं, जो फेस्टिवल की समावेशिता की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। फिल्मों के बाद निर्देशकों, कलाकारों और क्रू सदस्यों के साथ जीवंत चर्चाओं ने पूरे अनुभव को और समृद्ध किया।मास्टरक्लास और वार्ताओं ने भी गहराई बढ़ाई।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार कमाख्या नारायण सिंह ने “From Research to Reel: Crafting Feature Film Stories” पर मास्टरक्लास प्रस्तुत किया, जबकि एनिमेशन फिल्मकार ध्वनि देसाई ने समीक्षक मुर्तजा अली खान के साथ “Animation Storytelling: India vis-à-vis the World” पर चर्चा की।
इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स के साथ संयुक्त आर्काइवल प्रदर्शनी में 1950 के दशक से हिंदी फिल्म पोस्टर्स और विंटेज विज्ञापन सामग्री प्रदर्शित की गई।फेस्टिवल में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की शॉर्ट फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज का क्यूरेटेड चयन, इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन का विशेष पैकेज, फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड द्वारा नामित फिल्में और पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट की शॉर्ट डॉक्यूमेंट्रीज भी दिखाई गईं।
इन सबने देश भर की अंतरंग, स्वतंत्र और गहराई से व्यक्तिगत कहानियों को प्रस्तुत किया।एचएफएफ 2026 महज एक फिल्म फेस्टिवल से कहीं अधिक था — यह एक जीवंत सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरा। यह वह स्थान था जहां सिनेमा वर्तमान को प्रतिबिंबित करता है, भविष्य की कल्पना करता है और छात्रों, समीक्षकों, फिल्मकारों तथा सिनेफाइल्स को भारत के निरंतर विस्तारित सिनेमाई परिदृश्य के उत्सव में एक साथ लाता है।
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भारतीय सेना अब पुराने और कमजोर पड़ चुके बख्तरबंद वाहनों के भरोसे नहीं है। भारतीय सेना तेजी से ऐसी घातक और आधुनिक युद्ध शक्ति में बदल रही है, जो दुश्मन को हर मोर्चे पर जवाब देने के लिए तैयार है। इसी बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा है भविष्य पैदल युद्धक वाहन कार्यक्रम, जिसके जरिए भारतीय सेना अपने पुराने बीएमपी बेडे की जगह नई पीढ़ी के अत्याधुनिक युद्धक वाहन उतारने जा रही है। करीब साठ हजार करोड़ रुपये की यह विशाल योजना केवल नए वाहन खरीदने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय सेना को और ज्यादा ताकतवर, तेज, आत्मनिर्भर और भविष्य के युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार बनाने का बड़ा अभियान है।
हम आपको बता दें कि भारतीय सेना दशकों से बीएमपी दो और बीएमपी दो के सारथ संस्करणों पर निर्भर रही है। इन वाहनों ने अपने समय में सेना को तेज गति, आक्रामक हमला क्षमता और बख्तरबंद पैदल सेना की ताकत दी थी। लेकिन आज का युद्धक्षेत्र बदल चुका है। अब केवल टैंक और तोपें युद्ध नहीं जीततीं। अब आसमान में मंडराते ड्रोन, दूर से हमला करने वाली मिसाइलें, लक्ष्य खोजने वाली स्मार्ट गोला बारूद प्रणाली और सटीक मारक क्षमता वाले हथियार युद्ध का चेहरा तय कर रहे हैं। ऐसे में पुराने बीएमपी अब आधुनिक युद्ध में सैनिकों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते।
देखा जाये तो भविष्य पैदल युद्धक वाहन को केवल सैनिक ढोने वाली मशीन नहीं माना जा रहा। यह ऐसा बख्तरबंद दानव होगा जो टैंकों के साथ सीधे मोर्चे पर लड़ेगा, दुश्मन की चौकियां तोड़ेगा और सैनिकों को गोलाबारी के बीच सुरक्षित पहुंचाएगा। लगभग बीस टन वजन वाले इस वाहन में छह सौ हॉर्स पावर का इंजन लगाया जाएगा, जिससे यह रेगिस्तान से लेकर ऊंचे पहाड़ी इलाकों तक तेज गति से संचालन कर सकेगा। सबसे अहम बात यह है कि यह वाहन नदियां और जल अवरोध पार करने में भी सक्षम होगा, जो भारतीय सेना की सामरिक जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
इस वाहन में चालक, निशानेबाज और कमांडर सहित तीन सदस्यीय दल होगा, जबकि आठ पूरी तरह हथियारबंद सैनिक इसमें सवार रह सकेंगे। इसकी मारक क्षमता भी बेहद घातक रखी जा रही है। तीस मिलीमीटर की स्वचालित तोप, सहायक मशीनगन, टैंक भेदी निर्देशित मिसाइलें और भविष्य में ड्रोन तथा मंडराते विस्फोटक हथियारों का उपयोग इसकी युद्ध क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। इसका मतलब साफ है कि भारत अब केवल रक्षा नहीं, बल्कि आक्रामक यांत्रिक युद्ध की तैयारी कर रहा है।
इस पूरे कार्यक्रम की जड़ें उस ऐतिहासिक सोच में हैं जिसकी शुरुआत 1975 में गठित कृष्णा राव समिति से हुई थी। उसी समिति ने भारतीय सेना को अधिक यंत्रीकृत और तेज गति वाली शक्ति बनाने की सिफारिश की थी। इसके बाद 1989 में यंत्रीकृत पैदल सेना रेजिमेंट का गठन हुआ और फिर बीएमपी वाहनों का दौर शुरू हुआ। लेकिन दुनिया ने खाड़ी युद्ध में देख लिया कि सोवियत शैली के भारी संख्या वाले बख्तरबंद वाहन आधुनिक तकनीक के सामने किस तरह मिट्टी साबित हुए। इराक के बीएमपी वाहनों को पश्चिमी गठबंधन सेनाओं ने दूर से ही तबाह कर दिया। बेहतर दृष्टि प्रणाली, उन्नत अग्नि नियंत्रण और मजबूत सुरक्षा तकनीक ने पुराने बख्तरबंद सिद्धांतों की पोल खोल दी। भारत ने उसी समय समझ लिया था कि भविष्य का युद्ध केवल संख्या से नहीं, तकनीक से जीता जाएगा।
देखा जाये तो भारत की चुनौती और भी गंभीर है क्योंकि उसे एक साथ पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर तैयार रहना पड़ता है। लद्दाख की ऊंचाइयों पर युद्ध, राजस्थान के रेगिस्तान में तेज बख्तरबंद धावा और नदी वाले क्षेत्रों में गतिशील संचालन, हर क्षेत्र अलग प्रकार की सैन्य क्षमता मांगता है। इसी कारण भविष्य पैदल युद्धक वाहन को हर भूभाग में सक्षम बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
वैसे इस कार्यक्रम की असली नींव अभय परियोजना ने रखी थी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने 1990 के दशक में अभय नाम से स्वदेशी पैदल युद्धक वाहन विकसित करने की शुरुआत की थी। भले ही वह परियोजना बड़े पैमाने पर सेना में शामिल नहीं हो सकी, लेकिन उसने भारत को बख्तरबंद तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा दे दी। अग्नि नियंत्रण प्रणाली, मिश्रित कवच, तापीय दृष्टि प्रणाली, जलगतिकीय निलंबन और अग्नि शमन तकनीक जैसी अनेक क्षमताएं इसी परियोजना से विकसित हुईं।
अभय वाहन की मारक क्षमता अपने समय से आगे मानी जाती थी। इसमें चालीस मिलीमीटर की शक्तिशाली स्वचालित तोप लगाई गई थी जो कवच भेदी और विस्फोटक दोनों प्रकार के गोले दाग सकती थी। साथ ही टैंक भेदी मिसाइलें और स्वचालित ग्रेनेड प्रक्षेपक इसे बेहद घातक बनाते थे। सबसे खतरनाक बात यह थी कि इसका अग्नि नियंत्रण तंत्र चलते वाहन से भी सटीक निशाना लगाने में सक्षम था। यही तकनीक आज भविष्य पैदल युद्धक वाहन के लिए आधार बन चुकी है।
देखा जाये तो जीवित रहने की क्षमता यानी सर्वाइवल अब आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। अभय परियोजना में मिश्रित कवच, सिरेमिक सुरक्षा, टाइटेनियम परत और विस्फोट रोधी सुरक्षा प्रणाली विकसित की गई थी। इसके साथ अग्नि शमन प्रणाली, लेजर चेतावनी प्रणाली और परमाणु, जैविक तथा रासायनिक हमलों से बचाव की व्यवस्था भी जोड़ी गई। अब यही तकनीक अगले पीढ़ी के भारतीय बख्तरबंद वाहनों में और अधिक उन्नत रूप में दिखाई दे रही है।
हम आपको बता दें कि हाल ही में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने उन्नत बख्तरबंद मंच नाम से नई पीढ़ी के वाहन प्रस्तुत किए हैं। इनका विकास टाटा और भारत फोर्ज जैसी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर किया गया है। इन वाहनों में बिना चालक वाला बुर्ज लगाया गया है जिसमें तीस मिलीमीटर की तोप, मशीनगन और टैंक भेदी मिसाइलें मौजूद हैं। बिना चालक वाले बुर्ज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वाहन के भीतर अतिरिक्त जगह मिलती है, जहां सैनिक ड्रोन और मंडराते विस्फोटक हथियार लेकर चल सकते हैं। यह सीधे संकेत देता है कि भारतीय सेना भविष्य के ड्रोन युद्ध को केंद्र में रखकर तैयारी कर रही है।
देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह कार्यक्रम भारत के लिए बेहद निर्णायक है। यदि यह परियोजना सफल होती है तो भारत न केवल अपनी सेना को आधुनिक बनाएगा, बल्कि विदेशी हथियार निर्भरता की जंजीर भी तोड देगा। यही कारण है कि इस दौड़ में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां उतर चुकी हैं। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा, महिंद्रा और बख्तरबंद वाहन निगम जैसी कंपनियां इस परियोजना के लिए संघर्ष कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका भारत की आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति की कुंजी बनेगी।
अमेरिका के स्ट्राइकर जैसे विदेशी विकल्पों पर भी चर्चा हुई, लेकिन भारतीय सैन्य रणनीतिकारों ने साफ संकेत दे दिए कि भारत को ऐसा वाहन चाहिए जो उसकी भौगोलिक और युद्धक जरूरतों के अनुसार बना हो। जल अवरोध पार करने की क्षमता, ऊंचे इलाकों में संचालन और मिश्रित युद्ध परिस्थितियों में जीवित रहने की ताकत विदेशी वाहनों में सीमित मानी गई। इससे स्वदेशी मंचों के पक्ष में माहौल और मजबूत हुआ।
बहरहाल, भविष्य पैदल युद्धक वाहन केवल सेना का नया हथियार नहीं है। यह भारत की उस आक्रामक सैन्य सोच का प्रतीक है जो अब रक्षात्मक ढांचे से बाहर निकल चुकी है। आने वाले समय में भारतीय सेना के टैंक, ड्रोन, तोपखाना और बख्तरबंद पैदल सेना एकीकृत डिजिटल युद्ध प्रणाली के रूप में काम करेंगे। युद्धक्षेत्र में निर्णय लेने की गति बढ़ेगी, दुश्मन पर हमला अधिक सटीक होगा और सैनिकों की सुरक्षा कई गुना मजबूत होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत अब तकनीक आधारित, तेज, घातक और आत्मनिर्भर युद्ध शक्ति बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
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