अब बंगाल की धरती पर अवैध घुसपैठियों के लिए खुली छूट का दौर खत्म हो चुका है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को साफ संदेश दे दिया गया है कि भारत अब उनकी अवैध मौजूदगी को हरगिज बर्दाश्त नहीं करेगा। पश्चिम बंगाल की सीमा, जो वर्षों तक घुसपैठ का आसान रास्ता बनी रही, अब सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन की सख्त निगरानी में है। पश्चिम बंगाल की शुभेन्दु अधिकारी सरकार ने सभी 23 जिलाधिकारियों को आदेश दिया है कि अवैध विदेशियों को रखने के लिए विशेष होल्डिंग सेंटर बनाए जाएं, जहां पहचान पूरी होने तक उन्हें रखा जाएगा और उसके बाद सीधे सीमा पार वापस भेज दिया जाएगा। इस आदेश के महज 48 घंटे के भीतर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे बांग्लादेश सीमा से सटे जिलों में दो होल्डिंग सेंटर शुरू भी कर दिए गए। यह कार्रवाई दिखा रही है कि बंगाल में वर्षों से चल रही घुसपैठ की जड़ों पर अब सीधा प्रहार शुरू हो चुका है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक जिन अवैध घुसपैठियों को पकड़ा जाता था, उन्हें विदेशी अधिनियम 1946 की धारा 14 के तहत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाता था। लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत पहले उनकी नागरिकता की पुष्टि की जाएगी और उसके बाद तीस दिनों के भीतर उन्हें सीमा पार वापस भेज दिया जाएगा। यानी अब केवल गिरफ्तारी का दिखावा नहीं, बल्कि सीधे निष्कासन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
23 मई को जारी राज्य सरकार के आदेश में स्पष्ट कहा गया कि पकड़े गए विदेशियों और जेल से रिहा हुए विदेशी कैदियों को निर्वासन तक इन होल्डिंग सेंटरों में रखा जाएगा। यह आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय की दो मई 2025 की उस गाइडलाइन के बाद आया है, जिसमें अवैध रूप से भारत में रह रहे बांग्लादेशियों और रोहिंग्या लोगों को चिन्हित कर वापस भेजने की प्रक्रिया तय की गई थी। नए आव्रजन और विदेशी अधिनियम 2025 के तहत पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार भी मिल चुका है। साथ ही घुसपैठियों का जैविक आंकड़ा केंद्रीय डाटाबेस में अपलोड कर उन्हें सीमा सुरक्षा बल के हवाले किया जाएगा, ताकि बांग्लादेश सीमा पर सीधे वापसी की कार्रवाई हो सके। यहां सबसे गंभीर सवाल यह है कि यह निर्देश एक साल से लंबित क्यों पड़ा रहा? आखिर किस दबाव, किस राजनीतिक मजबूरी और किस वोट बैंक की खातिर इसे लागू नहीं किया गया था?
हम आपको बता दें कि मालदा में यह होल्डिंग सेंटर इंग्लिश बाजार स्थित स्वयं सहायता समूहों के प्रशिक्षण केंद्र की एक मंजिल पर बनाया गया है। यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। 12 पुलिसकर्मी, तीन सिविल डिफेंस कर्मी और तीन नागरिक स्वयंसेवक तैनात किए गए हैं। चारों तरफ निगरानी कैमरे लगाए गए हैं और बंदियों के लिए रसोइयों की भी व्यवस्था की गई है। सोमवार को यहां नौ संदिग्ध बांग्लादेशी महिलाओं और नाबालिगों को लाया गया। पुलिस ने इन्हें गाजोल थाना क्षेत्र के पांडुआ इलाके से पकड़ा था। जांच में सामने आया कि ये लोग हिली सीमा के रास्ते बिना वैध दस्तावेजों के भारत में घुसे थे। पूछताछ में इन्होंने खुद को बांग्लादेश के रंगपुर मंडल के इमामपुर गांव का निवासी बताया।
इनमें रीमी बीबी, गोलापी बीबी, लवली बीबी, मोहम्मद रोहन, मोहम्मद गोलाप, जुलेखा खातून, जाहेदा खातून, मोहम्मद जाहिदुल और गुलशाना खातून शामिल हैं। यह सूची केवल नौ लोगों की नहीं, बल्कि उस सुनियोजित घुसपैठ तंत्र की गवाही है, जिसने वर्षों से बंगाल की सीमा को छलनी कर रखा है।
दूसरी तरफ मुर्शिदाबाद के लालगोला में मत्स्य विभाग की पद्मा भवन इमारत की दूसरी मंजिल को होल्डिंग सेंटर में बदला गया है। यहां तीन लोगों को रखा गया है, जिन्हें शनिवार को सीमा के पास पकड़ा गया था। इनके पास फर्जी भारतीय पासपोर्ट, नकली मतदाता पहचान पत्र और जाली दस्तावेज मिले। यानी घुसपैठ अब केवल सीमा पार कर आने तक सीमित नहीं रही, बल्कि फर्जी भारतीय पहचान बनाकर व्यवस्था में घुस जाने का संगठित षड्यंत्र चल रहा था।
मुर्शिदाबाद के जिलाधिकारी आर अर्जुन ने साफ कहा कि पकड़े गए बांग्लादेशी नागरिकों की पुष्टि के बाद उन्हें सीमा सुरक्षा बल को सौंप दिया जाएगा, ताकि उन्हें वापस भेजा जा सके। यह बयान अपने आप में साबित करता है कि प्रशासन अब केवल आंकड़े नहीं गिन रहा, बल्कि कार्रवाई के मोड़ में आ चुका है। साथ ही बंगाल के दूसरे जिलों में भी होल्डिंग सेंटर बनाने की कवायद तेज हो गई है। बीरभूम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अगले कुछ दिनों में वहां भी ऐसा केंद्र शुरू हो जाएगा और कई स्थानों की पहचान कर ली गई है।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर सीमा इलाके से सामने आई तस्वीरों ने यह साफ कर दिया है कि अवैध घुसपैठियों के बीच डर साफ दिखाई देने लगा है। सीमा के पास अचानक जुटी भीड़ को लेकर माना जा रहा है कि कई बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस अपने देश लौटने की तैयारी में हैं। राज्य सरकार की सख्त कार्रवाई और “पहचान करो, नाम हटाओ और बाहर निकालो” नीति ने घुसपैठियों की बेचैनी बढ़ा दी है। इससे पहले भी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू होने के दौरान ऐसे ही दृश्य देखने को मिले थे। दमदम में रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक ने खुद स्वीकार किया कि वह पिछले एक-दो वर्षों से यहां रह रहा था और अब अगर प्रशासन रहने नहीं देगा तो उसके पास लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। यह बयान अपने आप में साबित करता है कि बंगाल में अवैध तरीके से रह रहे लोगों का जाल कितना गहरा फैल चुका था।
बहरहाल, अब साफ दिखाई दे रहा है कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के खिलाफ जमीन पर निर्णायक कार्रवाई शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने जिस दृढ़ता के साथ अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के खिलाफ सख्त अभियान का संकल्प लिया है, उसने प्रशासनिक तंत्र को भी पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। “पहचान करो, नाम हटाओ और बाहर निकालो” की नीति केवल एक नारा नहीं, बल्कि बंगाल की सुरक्षा और जनसांख्यिक संतुलन बचाने का अभियान बनती जा रही है। वर्षों से सीमा पार घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज और अवैध बसावट के जिस जाल ने राज्य को खोखला करने की कोशिश की, अब उस पर सीधा प्रहार हो रहा है। अगर यही सख्ती और राजनीतिक इच्छाशक्ति आगे भी कायम रही, तो बंगाल की धरती पर अवैध घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।
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लुटियंस दिल्ली (Lutyens' Delhi) के ऐतिहासिक और नामचीन 'दिल्ली जिमखाना क्लब' के जमीन विवाद में एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट को आधिकारिक तौर पर भरोसा दिलाया कि यदि क्लब आगामी 5 जून की तय समय सीमा तक जगह खाली नहीं भी करता है, तो भी प्रशासन बलपूर्वक या जबरदस्ती उस पर कब्जा नहीं करेगा। यह आश्वासन हाई कोर्ट में उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जो केंद्र सरकार के उस बेदखली नोटिस के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें क्लब को सफदरजंग रोड स्थित अपनी 27.3 एकड़ जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया है। सरकार इस बेशकीमती जमीन का इस्तेमाल रक्षा और सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों के लिए करना चाहती है। जगह खाली नहीं भी होती है, तो भी वह ज़बरदस्ती उस पर कब्ज़ा नहीं करेगी। केंद्र सरकार की तरफ से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने साफ किया कि 5 जून की तारीख सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से जगह खाली करने के लिए दी गई एक समय सीमा थी, न कि ज़बरदस्ती बेदखल करने की कोई तारीख।
केंद्र ने अपना रुख साफ किया
सुनवाई के दौरान, मेहता ने कोर्ट को बताया कि अगर क्लब तय समय सीमा तक ज़मीन का कब्ज़ा नहीं सौंपता है, तो सरकार कानून के मुताबिक ही सख्ती से कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि अधिकारी सार्वजनिक जगहों से बेदखली से जुड़े कानूनों में तय की गई कानूनी प्रक्रिया का ही पालन करेंगे और कोई भी अचानक या ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इसके बाद हाई कोर्ट ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार के इस बयान को आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड किया जा सकता है, जिस पर सॉलिसिटर जनरल सहमत हो गए।
सुनवाई के दौरान बेंच ने एक अहम बात भी कही। बेंच ने याचिकाकर्ताओं (जो क्लब के सदस्य हैं) से कहा कि अगर सरकार ज़मीन वापस भी ले लेती है, तो भी उनकी सदस्यता के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि ज़मीन के पट्टेदार (lessees) खुद सदस्य नहीं थे।
केंद्र सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि दिल्ली जिमखाना क्लब के कामकाज के लिए कोई दूसरी जगह दी जाएगी।
सरकार ने 'सार्वजनिक उद्देश्य' के लिए पट्टे की शर्त का इस्तेमाल किया
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय ने 22 मई को एक नोटिस जारी करके क्लब को 5 जून तक ज़मीन सौंपने का निर्देश दिया। सरकार ने मूल पट्टा समझौते की धारा 4 का इस्तेमाल किया, जिसके तहत उसे "सार्वजनिक उद्देश्य" के लिए ज़मीन वापस लेने का अधिकार है। अधिकारियों का कहना है कि यह ज़मीन रक्षा और सुरक्षा से जुड़ी ज़रूरतों के लिए ज़रूरी है।
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