बुक रिव्यू: साधारण महिलाओं के असाधारण हौसले की कहानी:मोटिवेशन चाहिए, खुद पर यकीन और आत्मविश्वास चाहिए तो ये किताब जरूर पढ़ें
किताब का नाम: छू लो आसमान लेखिका: रश्मि बंसल अनुवाद: उर्मिला गुप्ता प्रकाशक: अनबाउंड स्क्रिप्ट मूल्य: 199 रुपए किसी महिला के लिए अपने सपने पूरे करने की शुरुआत ही सबसे मुश्किल कदम होता है। उसे परिवार की जिम्मेदारियों, समाज की सोच और तय की गई सीमाओं से बाहर निकलना पड़ता है। इसके बाद ही असली सफर शुरू होता है। रश्मि बंसल की किताब 'छू लो आसमान' ऐसी ही महिलाओं की कहानियां सामने लाती है, जिन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में अपने लिए रास्ता बनाया। किताब में देश के अलग-अलग हिस्सों की उन महिलाओं की कहानी बताई गई है, जिन्होंने अपने आसपास मौजूद बाधाओं का सामना किया और अपनी अलग पहचान बनाई। इनकी उपलब्धियां इसलिए भी खास हैं, क्योंकि कई महिलाओं ने आगे बढ़ने के बाद अपने आसपास के लोगों के जीवन में भी बदलाव लाने की कोशिश की। किताब में क्या है? 'छू लो आसमान' वास्तविक जीवन की प्रेरक कहानियों का कलेक्शन है। कोरबा से कश्मीर तक, इसमें अलग-अलग इलाकों और सामाजिक परिस्थितियों से आने वाली भारतीय महिलाओं के सफर को दर्ज किया गया है। हर महिला की शुरुआत और चुनौती अलग है। किसी के सामने आर्थिक तंगी है, किसी के रास्ते में सामाजिक बंदिशें हैं और किसी को अपने फैसले लेने के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इन परिस्थितियों के बीच वे अपने हुनर और मौजूद मौकों के सहारे आगे बढ़ती हैं। किताब इन महिलाओं की मंजिल बताने से पहले उनकी यात्रा दिखाती है। इसलिए पाठक को उनकी सफलता के साथ यह भी समझ आता है कि वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। यही बात इन कहानियों को सामान्य सफलता की कहानियों से अलग करती है। ग्राफिक में किताब के 10 सबक समझिए- किताब की सबसे असरदार बात आमतौर पर सफलता की कहानियों में ऐसे लोगों के बारे में पढ़ने को मिलता है, जो बड़े पदों पर पहुंचे या जिन्होंने बड़ा कारोबार खड़ा किया। 'छू लो आसमान' का दायरा इससे अलग है। यहां सफलता का पैमाना हर कहानी में बदल जाता है। किसी के लिए अपनी कमाई शुरू करना बड़ी उपलब्धि है, तो किसी के लिए घर से बाहर निकलकर काम करना। यह किताब उपलब्धियों को एक ही पैमाने पर नहीं मापती। इन महिलाओं के संघर्ष भी बड़े नाटकीय घटनाक्रम की तरह सामने नहीं आते। कई बार चुनौती रोजमर्रा की जिंदगी में छिपी होती है। परिवार की उम्मीदें, पैसों की कमी, समाज की सोच या अवसरों का अभाव उनके लिए बाधा बनता है। इन्हीं बाधाओं को पार करना उनकी उपलब्धि को खास बनाता है। महिलाओं की अलग दुनिया दिखाती है किताब किताब की कहानियां अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक परिवेश से आती हैं। जगह बदलने के साथ महिलाओं की परिस्थितियां और उनके सामने मौजूद चुनौतियां भी बदलती हैं। इससे पाठक को महिला सशक्तिकरण के कई उदाहरण मिलते हैं। किताब यह समझने का मौका देती है कि एक महिला के लिए अवसर का अर्थ उसकी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है। किसी के पास संसाधन कम हैं, किसी के पास सामाजिक सपाेर्ट नहीं है और किसी के लिए अपने फैसले पर कायम रहना ही कठिन है। यही विविधता किताब को रोचक बनाए रखती है। एक कहानी खत्म होने के बाद दूसरी कहानी नए परिवेश और नए किरदार के साथ शुरू होती है। भाषा और लिखने का ढंग रश्मि बंसल की लेखन शैली सहज और किस्सागोई वाली है। वे महिलाओं के जीवन को सवाल-जवाब या उपलब्धियों की सूची की तरह पेश नहीं करतीं। कहानियों में भावनाएं हैं, लेकिन उन्हें जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने की कोशिश नहीं की गई है। लेखिका किरदारों के संघर्ष को उसी सहजता से दर्ज करती हैं, जिस सहजता से उनकी उपलब्धियों को। उर्मिला गुप्ता का हिंदी अनुवाद सहज है। पढ़ते हुए भाषा कहीं बोझिल नहीं लगती और कहानियों का भाव भी बना रहता है। किताब की खूबियां किताब की कमजोरियां यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? 'छू लो आसमान' पढ़ने की सबसे बड़ी वजह इसकी वास्तविक कहानियां हैं। प्रेरणा यहां किसी सिद्धांत या सफलता के फॉर्मूले से नहीं आती। पाठक ऐसे लोगों की यात्राएं पढ़ता है, जिन्होंने संघर्षों के बीच अपने लिए संभावनाएं तलाशीं। ये किताब किन्हें पढ़नी चाहिए, ग्राफिक में देखिए- किताब के बारे में मेरी राय 'छू लो आसमान' पढ़ते हुए अच्छी बात यह लगती है कि इसके किरदार हमसे बहुत दूर की दुनिया के नहीं हैं। उनके सामने ऐसी समस्याएं आती हैं, जिन्हें भारतीय समाज में अलग-अलग रूपों में आसानी से देखा जा सकता है। इसी वजह से उनकी उपलब्धियां भी ज्यादा वास्तविक लगती हैं। किताब में मोटिवेशन है, लेकिन उसका तरीका उपदेश देने वाला नहीं है। हर कहानी अपने किरदार और अनुभव के जरिए अपनी बात कहती है। इसलिए किताब पढ़ते हुए सीख थोपी हुई नहीं लगती, बल्कि कहानी से खुद निकलकर सामने आती है। किताब पढ़ने के बाद सफलता से ज्यादा इन महिलाओं की शुरुआत याद रह जाती है। वही बताती है कि आगे बढ़ने के लिए पहला कदम कितना अहम होता है। ……………………. ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- अंतरिक्ष से पृथ्वी कैसी दिखती है:देशों की सीमाएं, राजनीति और युद्ध नहीं, दुनिया को देखने का नया नजरिया देती एक किताब क्या आपने कभी सोचा है कि अंतरिक्ष से पृथ्वी कैसी दिखती होगी? वहां से देशों की सीमाएं नहीं दिखतीं, न राजनीति, न युद्ध और न ही इंसानों के बंटवारे। सिर्फ एक नीला ग्रह दिखाई देता है, जिस पर पूरी मानवता रहती है। मशहूर लेखिका समैंथा हार्वी की किताब 'ऑर्बिटल' इसी नजरिए से दुनिया को दिखाने की कोशिश करती है। पूरी खबर पढ़ें…
पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता:हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप, या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें?
सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा 12 साल का बेटा है। किताबें पढ़ने में उसका मन नहीं लगता है। हालांकि वह पढ़ाई में ठीक है। किसी तरह अपना होमवर्क और सिलेबस पूरा कर लेता है। लेकिन वह खाली समय में वह कहानी की किताब, कॉमिक्स या ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ने की बजाय मोबाइल या अन्य स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताता है। मैं चाहती हूं कि उसमें रीडिंग हैबिट बढ़े। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। वहीं किताब पढ़ने में धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती है। ऐसे में लंबे समय तक एक जगह बैठकर किताब पढ़ना आज के बच्चों के लिए चुनौतीपूर्ण है। यहां एक जरूरी बात समझनी होगी कि किसी भी बच्चे में जबरदस्ती पढ़ने की आदत नहीं डाली जा सकती। किताबों से लगाव धीरे-धीरे विकसित होता है। हालांकि आपका बेटा पहले से पढ़ाई में अच्छा है। इसका मतलब है कि उसमें लर्निंग स्किल और अनुशासन है। अब जरूरत सिर्फ बच्चे में रीडिंग हैबिट्स डेवलप करने की है। बच्चे किताबों से दूर क्यों भागते हैं? इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। जैसेकि- आइए, अब बच्चों में रीडिंग हैबिट डेवलप करने पर विस्तार से बात करते हैं। पढ़ाई को बनाएं मजेदार बच्चे को किताबें पढ़ने के लिए बार-बार मजबूर करने की बजाय उसे मजेदार अनुभव बनाएं। उसकी उम्र और रुचि के अनुसार कहानी की किताबें, कॉमिक्स या चित्रों वाली किताबें चुनें। पढ़ते समय बच्चे का साथ दें, किरदारों की आवाज निकालें, कहानी पर चर्चा करें या उससे पूछें कि कहानी में आगे क्या हो सकता है। जब पढ़ाई एक खेल या रोचक एक्टिविटी लगेगी, तो बच्चे की किताबों में दिलचस्पी अपने-आप बढ़ने लगेगी। बहुत से पेरेंट्स बच्चे से कहते हैं- "जब तक किताब नहीं पढ़ोगे, टीवी देखने को नहीं मिलेगा।" ऐसे में किताब सजा जैसी लगने लगती है। बच्चे की पसंद को दें महत्व यह जरूरी नहीं कि हर बच्चा कहानी की किताब ही पसंद करे। कुछ बच्चों को- अगर बच्चा अपनी रुचि की किताब पढ़ता है, तो यहीं से उसकी रीडिंग हैबिट की शुरुआत होती है। फिक्स करें ‘रीडिंग टाइम’ बच्चे वही करते हैं, जो वे घर में देखते हैं। अगर माता-पिता खाली समय में मोबाइल देखते हैं, तो बच्चे भी वही करेंगे। इसलिए रोज एक ऐसा समय तय करें, जब घर के सभी लोग 15-20 मिनट कोई किताब, मैगजीन या अखबार पढ़ें। इससे बच्चे में रीडिंग हैबिट डेवलप होगी। साथ ही ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ख्याल रखें- बच्चे से पूछें कहानी से जुड़े सवाल कई बार पेरेंट्स बच्चे से सिर्फ यह पूछते हैं- "कितने पेज पढ़े?" इसके बजाय उससे कुछ सवाल पूछें। जैसेकि- ऐसी बातचीत बच्चे की कल्पनाशक्ति, भाषा और सोचने की क्षमता बढ़ाती है। उसे महसूस होता है कि किताब पढ़ने के साथ सोचने और महसूस करने का माध्यम भी है। स्क्रीन टाइम कम करने के तरीके आज के समय में बच्चों को स्क्रीन से पूरी दूर रखना संभव नहीं है। इसलिए लक्ष्य स्क्रीन हटाना नहीं, बल्कि उसका ‘संतुलित इस्तेमाल सिखाना’ होना चाहिए। किताबों को इनाम का जरिया न बनाएं। कई बार माता-पिता कहते हैं- शुरुआत में इससे फायदा दिख सकता है। लेकिन धीरे-धीरे बच्चा सिर्फ इनाम के लिए पढ़ने लगता है। बेहतर होगा कि उसकी मेहनत और रुचि की तारीफ करें। जैसे- इससे पढ़ने की आंतरिक प्रेरणा मिलती है। पेरेंट्स की गलतियां रीडिंग हैबिट विकसित करने की कोशिश में कई बार माता-पिता कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिनसे बच्चा किताबों से दूरी बनाने लगता है। सभी गलतियां ग्राफिक में देखिए- अगर पढ़ाई में बिल्कुल भी बच्चे का मन न लगे तो किसी स्पेशल एजुकेटर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर है। कई बार इसके पीछे रुचि की कमी नहीं, बल्कि कई दूसरे कारण हो सकते हैं। अंत में यही कहूंगी कि रीडिंग हैबिट एक दिन में विकसित नहीं होती। यह छोटे-छोटे अनुभवों, सही माहौल और लगातार प्रोत्साहन से बनती है। बच्चे को किताबों से प्यार करने के लिए उन्हें सबसे पहले यह महसूस होना चाहिए कि पढ़ाई सिर्फ परीक्षा की तैयारी के लिए नहीं है, बल्कि दुनिया को जानने का एक बेहतरीन तरीका है। याद रखिए, बच्चे किताबें तब पढ़ते हैं, जब घर में किताबों को महत्व मिलता है। अगर आप धैर्य रखें, खुद उदाहरण बनें और बच्चे की रुचि का सम्मान करें, तो धीरे-धीरे किताबें भी उसके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन सकती हैं। …………………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा कोई काम खुद नहीं करता: चाहता है, सबकुछ कोई और करके दे, उसे घर के काम करना, जिम्मेदार होना कैसे सिखाएं? बच्चों को उम्र के अनुसार छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना बिल्कुल भी गलत नहीं है। लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘जिम्मेदारी सिखाने’ और ‘बच्चे से काम करवाने’ में एक बारीक अंतर है। पूरी खबर पढ़िए…
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