पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता:हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप, या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें?
सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा 12 साल का बेटा है। किताबें पढ़ने में उसका मन नहीं लगता है। हालांकि वह पढ़ाई में ठीक है। किसी तरह अपना होमवर्क और सिलेबस पूरा कर लेता है। लेकिन वह खाली समय में वह कहानी की किताब, कॉमिक्स या ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ने की बजाय मोबाइल या अन्य स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताता है। मैं चाहती हूं कि उसमें रीडिंग हैबिट बढ़े। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। वहीं किताब पढ़ने में धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती है। ऐसे में लंबे समय तक एक जगह बैठकर किताब पढ़ना आज के बच्चों के लिए चुनौतीपूर्ण है। यहां एक जरूरी बात समझनी होगी कि किसी भी बच्चे में जबरदस्ती पढ़ने की आदत नहीं डाली जा सकती। किताबों से लगाव धीरे-धीरे विकसित होता है। हालांकि आपका बेटा पहले से पढ़ाई में अच्छा है। इसका मतलब है कि उसमें लर्निंग स्किल और अनुशासन है। अब जरूरत सिर्फ बच्चे में रीडिंग हैबिट्स डेवलप करने की है। बच्चे किताबों से दूर क्यों भागते हैं? इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। जैसेकि- आइए, अब बच्चों में रीडिंग हैबिट डेवलप करने पर विस्तार से बात करते हैं। पढ़ाई को बनाएं मजेदार बच्चे को किताबें पढ़ने के लिए बार-बार मजबूर करने की बजाय उसे मजेदार अनुभव बनाएं। उसकी उम्र और रुचि के अनुसार कहानी की किताबें, कॉमिक्स या चित्रों वाली किताबें चुनें। पढ़ते समय बच्चे का साथ दें, किरदारों की आवाज निकालें, कहानी पर चर्चा करें या उससे पूछें कि कहानी में आगे क्या हो सकता है। जब पढ़ाई एक खेल या रोचक एक्टिविटी लगेगी, तो बच्चे की किताबों में दिलचस्पी अपने-आप बढ़ने लगेगी। बहुत से पेरेंट्स बच्चे से कहते हैं- "जब तक किताब नहीं पढ़ोगे, टीवी देखने को नहीं मिलेगा।" ऐसे में किताब सजा जैसी लगने लगती है। बच्चे की पसंद को दें महत्व यह जरूरी नहीं कि हर बच्चा कहानी की किताब ही पसंद करे। कुछ बच्चों को- अगर बच्चा अपनी रुचि की किताब पढ़ता है, तो यहीं से उसकी रीडिंग हैबिट की शुरुआत होती है। फिक्स करें ‘रीडिंग टाइम’ बच्चे वही करते हैं, जो वे घर में देखते हैं। अगर माता-पिता खाली समय में मोबाइल देखते हैं, तो बच्चे भी वही करेंगे। इसलिए रोज एक ऐसा समय तय करें, जब घर के सभी लोग 15-20 मिनट कोई किताब, मैगजीन या अखबार पढ़ें। इससे बच्चे में रीडिंग हैबिट डेवलप होगी। साथ ही ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ख्याल रखें- बच्चे से पूछें कहानी से जुड़े सवाल कई बार पेरेंट्स बच्चे से सिर्फ यह पूछते हैं- "कितने पेज पढ़े?" इसके बजाय उससे कुछ सवाल पूछें। जैसेकि- ऐसी बातचीत बच्चे की कल्पनाशक्ति, भाषा और सोचने की क्षमता बढ़ाती है। उसे महसूस होता है कि किताब पढ़ने के साथ सोचने और महसूस करने का माध्यम भी है। स्क्रीन टाइम कम करने के तरीके आज के समय में बच्चों को स्क्रीन से पूरी दूर रखना संभव नहीं है। इसलिए लक्ष्य स्क्रीन हटाना नहीं, बल्कि उसका ‘संतुलित इस्तेमाल सिखाना’ होना चाहिए। किताबों को इनाम का जरिया न बनाएं। कई बार माता-पिता कहते हैं- शुरुआत में इससे फायदा दिख सकता है। लेकिन धीरे-धीरे बच्चा सिर्फ इनाम के लिए पढ़ने लगता है। बेहतर होगा कि उसकी मेहनत और रुचि की तारीफ करें। जैसे- इससे पढ़ने की आंतरिक प्रेरणा मिलती है। पेरेंट्स की गलतियां रीडिंग हैबिट विकसित करने की कोशिश में कई बार माता-पिता कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिनसे बच्चा किताबों से दूरी बनाने लगता है। सभी गलतियां ग्राफिक में देखिए- अगर पढ़ाई में बिल्कुल भी बच्चे का मन न लगे तो किसी स्पेशल एजुकेटर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर है। कई बार इसके पीछे रुचि की कमी नहीं, बल्कि कई दूसरे कारण हो सकते हैं। अंत में यही कहूंगी कि रीडिंग हैबिट एक दिन में विकसित नहीं होती। यह छोटे-छोटे अनुभवों, सही माहौल और लगातार प्रोत्साहन से बनती है। बच्चे को किताबों से प्यार करने के लिए उन्हें सबसे पहले यह महसूस होना चाहिए कि पढ़ाई सिर्फ परीक्षा की तैयारी के लिए नहीं है, बल्कि दुनिया को जानने का एक बेहतरीन तरीका है। याद रखिए, बच्चे किताबें तब पढ़ते हैं, जब घर में किताबों को महत्व मिलता है। अगर आप धैर्य रखें, खुद उदाहरण बनें और बच्चे की रुचि का सम्मान करें, तो धीरे-धीरे किताबें भी उसके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन सकती हैं। …………………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा कोई काम खुद नहीं करता: चाहता है, सबकुछ कोई और करके दे, उसे घर के काम करना, जिम्मेदार होना कैसे सिखाएं? बच्चों को उम्र के अनुसार छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना बिल्कुल भी गलत नहीं है। लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘जिम्मेदारी सिखाने’ और ‘बच्चे से काम करवाने’ में एक बारीक अंतर है। पूरी खबर पढ़िए…
जरूरत की खबर- आज वर्ल्ड ऑर्गन डोनेशन डे:दुनिया से जाने वाले 8 लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं, जानें इससे जुड़े हर सवाल का जवाब
किसी इंसान की जिंदगी बचाने के लिए अपना कोई अंग दे देना, शायद इससे बड़ा मानवीय उपहार कुछ नहीं हो सकता। लेकिन भारत में हर साल हजारों लोग सिर्फ इसलिए समय से पहले जिंदगी से हार मान जाते हैं, क्योंकि हमारे देश में जरूरत के मुताबिक डोनर नहीं हैं। जबकि सच तो ये है कि एक इंसान अपने ऑर्गन डोनेट करके इस दुनिया से जाने के बाद भी 8 लोगों को नई जिंदगी दे सकता है। अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 13 अगस्त को दुनियाभर में ‘वर्ल्ड ऑर्गन डोनेशन डे’ मनाया जाता है। भारत में ऑर्गन डोनेशन को लेकर लोगों में जागरूकता बहुत कम है। यही वजह है कि यहां अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। ‘नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन’ (NOTTO) के मुताबिक, मार्च 2026 तक देश में करीब 90 हजार मरीज ऑर्गन ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में थे, जबकि 2025 में करीब 20 हजार ऑर्गन ट्रांसप्लांट ही हो सके। वहीं ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथ-ईस्ट एशिया’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, साल 2021 में भारत में किडनी, लिवर, हार्ट और लंग्स के करीब 3.9 लाख ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। रिसर्चर्स का अनुमान है कि 2040 तक यह जरूरत बढ़कर करीब 4.63 लाख सालाना हो सकती है। अंगदान की जरूरत इतनी ज्यादा होने के बावजूद इसे लेकर लोगों के मन में कई सवाल और गलतफहमियां हैं। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में ऑर्गन डोनेशन की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- डॉ. अत्तार मोहम्मद इस्माइल, कंसल्टेंट, यूरोलॉजी, रीनल ट्रांसप्लांट सर्जन, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई सवाल- ऑर्गन डोनेशन क्या है? जवाब- ऑर्गन डोनेशन यानी किसी जरूरतमंद मरीज के इलाज के लिए अपने अंग या टिश्यू दान करना। ऑर्गन डोनेशन दो तरह से होता है- लिविंग डोनर: व्यक्ति जीवित रहते हुए कुछ अंग या उनका हिस्सा डोनेट करता है। डिसीज्ड डोनर: व्यक्ति की मृत्यु के बाद मेडिकल एलिजिबिलिटी पूरी होने पर अंग डोनेट किए जाते हैं। सवाल- एक ऑर्गन डोनर कितने लोगों की जान बचा सकता है? जवाब- एक मृत ऑर्गन डोनर कम–से–कम 8 लोगों की जान बचा सकता है। इसके अलावा कॉर्निया, स्किन, हड्डियां, हार्ट वाल्व, टेंडन और अन्य टिश्यू डोनेट करके 50 से ज्यादा लोगों की जिंदगी बेहतर बना सकता है। ग्राफिक में देखिए- सवाल- ऑर्गन डोनेशन और ऑर्गन ट्रांसप्लांट में क्या अंतर है? जवाब- ऑर्गन डोनेशन में कोई व्यक्ति अपना अंग दान करता है। वहीं, ऑर्गन ट्रांसप्लांट में डॉक्टर उस डोनेट किए गए अंग को जरूरतमंद मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित करते हैं। ग्राफिक में दोनों के बीच का फर्क देखिए- सवाल- कौन-से अंग डोनेट किए जा सकते हैं? जवाब- शरीर के कई अंग डोनेट किए जा सकते हैं। इनमें कुछ अंग जीवित व्यक्ति डोनेट कर सकता है, जबकि हार्ट और लंग्स जैसे अंग मृत्यु के बाद ही डोनेट किए जा सकते हैं। सवाल- क्या कोई भी व्यक्ति ऑर्गन डोनेट कर सकता है? जवाब- नहीं, यह व्यक्ति की उम्र, हेल्थ कंडीशन और डोनेट किए जाने वाले अंग की स्थिति पर निर्भर करता है। मेडिकल जांच के बाद डॉक्टर तय करते हैं कि व्यक्ति ऑर्गन डोनेट कर सकता है या नहीं। सवाल- ऑर्गन डोनेट करने की न्यूनतम उम्र क्या है? जवाब- भारत में जीवित व्यक्ति आमतौर पर 18 साल या उससे अधिक उम्र में अंगदान कर सकता है। वहीं मृत्यु के बाद अंगदान के लिए कोई न्यूनतम उम्र तय नहीं है। बच्चों के अंग और टिश्यू भी मेडिकली उपयुक्त होने पर डोनेट किए जा सकते हैं। 18 साल से कम उम्र के मृत व्यक्ति के अंगदान के लिए माता-पिता या नियमों के तहत अधिकृत व्यक्ति की सहमति जरूरी है। बीमारी और ऑर्गन डोनेशन सवाल- क्या टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटीज होने पर अंगदान किया जा सकता है? जवाब- हां, टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटिक व्यक्ति कुछ स्थितियों में अंगदान कर सकता है। इसका फैसला डॉक्टर करते हैं। सवाल- जिन्हें हाई BP है, क्या वे अंगदान कर सकते हैं? जवाब- हां, अगर BP कंट्रोल में है और इससे शरीर के अंगों को गंभीर नुकसान नहीं हुआ है, तो अंगदान किया जा सकता है। सवाल- जिन्हें ओबिसिटी है, क्या वे अंगदान कर सकते हैं? जवाब- हां, लेकिन यह ओबिसिटी की गंभीरता और व्यक्ति की ओवरऑल हेल्थ पर निर्भर करता है। इसलिए डॉक्टर मेडिकल टेस्ट के बाद तय करते हैं कि अंगदान सेफ है या नहीं। सवाल- अगर किसी व्यक्ति का एक अंग खराब हो तो क्या वे दूसरे स्वस्थ अंग को डोनेट कर सकते हैं? जवाब- हां, अगर बीमारी ने दूसरे अंगों को प्रभावित नहीं किया है, तो डॉक्टर उनका टेस्ट करके डोनेशन के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का हार्ट डोनेशन के लायक न हो, लेकिन उसकी किडनी या लिवर हेल्दी हों, तो वे डोनेट किए जा सकते हैं। सवाल- क्या स्मोकिंग करने वाले लोग ऑर्गन डोनेट कर सकते हैं? जवाब- हां, अगर स्मोकिंग से फेफड़े या हार्ट खराब हो चुके हैं, तो इन्हें डोनेट नहीं किया जा सकता। लेकिन किडनी, लिवर जैसे दूसरे अंग स्वस्थ हैं, तो व्यक्ति उन्हें डोनेट कर सकता है। सवाल- क्या कैंसर के मरीज ऑर्गन डोनेट कर सकते हैं? जवाब- यह कैंसर के प्रकार और उसकी स्थिति पर निर्भर करता है। याद रखने वाली बात सवाल- भारत में हर साल कितने लोगों को ऑर्गन नहीं मिलने के कारण जान गंवानी पड़ती है? जवाब- इसका कोई आधिकारिक सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट्स और एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक, भारत में अंगों की कमी के कारण हर साल करीब 5 लाख लोगों की मौत हो जाती है। सवाल– भारत में ऑर्गन डोनेशन की दर दुनिया के मुकाबले कितनी है? जवाब- साल 2024 में भारत में हर 10 लाख लोगों पर करीब 0.8 डिसीज्ड डोनर यानी 1 से भी कम थे। इसके मुकाबले स्पेन में हर 10 लाख पर करीब 54 और अमेरिका में करीब 50 मृत अंगदाता हैं। ग्राफिक में देखिए- सबसे जरूरी सवाल सवाल- ऑर्गन डोनेट करने के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करें? जवाब- पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- परिवार पहले से किन बातों पर चर्चा कर ले, ताकि जरूरत पड़ने पर निर्णय आसान हो? जवाब- इसके लिए डोनर को परिवार से कुछ बातें जरूर डिस्कस कर लेनी चाहिए। जैसेकि- परिवार को अंगदान की प्रक्रिया और अंतिम संस्कार से जुड़े सवालों की सही जानकारी है या नहीं? अंगदान से जुड़े मिथ और सच्चाई मिथ 1: ऑर्गन डोनेट करने के बाद मृत शरीर विकृत हो जाता है। सच्चाई- डॉक्टर सर्जरी के जरिए अंग निकालते हैं और चीरे को ठीक से बंद कर देते हैं। इसके बाद शरीर को सम्मानपूर्वक परिवार को सौंप दिया जाता है। मिथ 2- अंगदान के बाद शव का अंतिम संस्कार या धार्मिक रीति-रिवाज सामान्य तरीके से नहीं हो सकते? सच्चाई- अंगदान के बाद परिवार शव का अंतिम संस्कार और धार्मिक रीति-रिवाज सामान्य तरीके से कर सकता है। मिथ 3: बुजुर्ग लोग ऑर्गन डोनेट नहीं कर सकते। सच्चाई- ज्यादा उम्र अपने आप में अंगदान में बाधा नहीं बनती। डॉक्टर उम्र के साथ अंगों की स्थिति देखते हैं और तय करते हैं कि कौन-से अंग डोनेट किए जा सकते हैं। मिथ 4: डोनेट किए गए अंग सिर्फ अमीर लोगों को ही मिलते हैं। सच्चाई- अंग मरीज की आर्थिक स्थिति देखकर आवंटित नहीं किए जाते। भारत में निर्धारित वेटिंग लिस्ट और मेडिकल मानकों के आधार पर अंगों का आवंटन होता है। इसमें मेडिकल जरूरत, ब्लड ग्रुप, अंग की अनुकूलता और वेटिंग लिस्ट जैसे फैक्टर देखे जाते हैं। मिथ 5: ऑर्गन डोनेशन से अंगों की खरीद-फरोख्त होती है। सच्चाई- भारत में मानव अंगों को खरीदना या बेचना गैरकानूनी है। मिथ 6: ऑर्गन डोनेट करने के लिए पहले से कार्ड बनवाना जरूरी है। सच्चाई- यह व्यक्ति की अंगदान की इच्छा दर्ज करने का एक तरीका है। मृत्यु के बाद मेडिकल सूटेबिलिटी और जरूरी सहमति के आधार पर अंगदान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। ……………………… ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- सोया चाप बैटर में लोटता दिखा वर्कर:जानें FSSAI के हाइजीन रूल्स, रेस्त्रां में खाने से पहले बरतें 11 सावधानियां हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें एक शर्टलेस वर्कर गीले फर्श पर रखे सोया चाप के बैटर में लोटता हुआ नजर आया। वीडियो कथित तौर पर एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का है। इस घटना ने फूड हाइजीन और फूड सेफ्टी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरी खबर पढ़ें…
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