Harsh Dubey: 'सच में...इंडिया के लिए...' हर्ष दुबे की टीम इंडिया में एंट्री पर पिता का कैसा था रिएक्शन
भारतीय क्रिकेट में हर खिलाड़ी का सपना होता है कि एक दिन वह टीम इंडिया की जर्सी पहने, लेकिन उस सपने के पीछे सिर्फ खिलाड़ी की मेहनत नहीं होती, पूरा परिवार अपनी जिंदगी लगा देता है। विदर्भ के युवा स्पिन ऑलराउंडर हर्ष दुबे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। भारत की टीम में पहली बार चुने जाने की खबर ने सिर्फ हर्ष को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को भावुक कर दिया।
जब बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने अगले महीने अफगानिस्तान के खिलाफ टेस्ट और वनडे सीरीज के लिए हर्ष का नाम घोषित किया, तब उनके पिता सुरेंद्र दुबे को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह रोज की तरह सुबह ब्लैक कॉफी पीकर क्रिकेट ग्राउंड जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी फोन पर उन्हें बताया गया कि उनका बेटा भारत के लिए चुना गया है।
सुरेंद्र दुबे की पहली प्रतिक्रिया थी, 'सच में? इंडिया के लिए? अफगानिस्तान? सच में?' इसके बाद वह सिर्फ धन्यवाद बोल पाए। बाद में उन्होंने बताया कि उस पल वह पूरी तरह जम गए थे और खुशी में उनके पास शब्द ही नहीं थे।
सुरेंद्र कहते हैं, 'यह सपना सिर्फ हर्ष का नहीं था, मेरा भी था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे झकझोरकर कहे कि यह सपना नहीं, सच है।'
हर्ष और उनके पिता दोनों भावुक स्वभाव के हैं। बचपन से ही उनके करियर का हर बड़ा पल आंसुओं से जुड़ा रहा। जब हर्ष 13 साल की उम्र में पहली बार रूबी क्रिकेट क्लब के सेंटर विकेट पर बल्लेबाजी करने उतरे थे, तब बिना गेंद खेले रन आउट हो गए थे। उस दिन हर्ष रो पड़े थे और स्टैंड में बैठे उनके माता-पिता की आंखें भी भर आई थीं।
करीब दस साल बाद हर्ष ने विदर्भ को 2025 रणजी ट्रॉफी जिताने में बड़ी भूमिका निभाई। वह टूर्नामेंट के प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बने और रिकॉर्ड विकेट भी लिए। उस दिन भी पिता-पुत्र की आंखों में आंसू थे।
सुरेंद्र दुबे पहले सीआईएसएफ में अधिकारी थे। वह खुद बचपन में क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। जब उन्होंने बेटे में वही सपना देखा तो नौकरी छोड़कर उसके करियर पर पूरा ध्यान दिया। बाद में हर्ष की मां ज्योति दुबे, जो स्कूल टीचर थीं, उन्होंने भी खुद को बेटे के क्रिकेट सफर के लिए समर्पित कर दिया।
हर्ष ने इस दौरान कई निराशाएं भी देखीं। अंडर-19 वर्ल्ड कप जैसे बड़े मौके हाथ से निकले, वजन कम करने के लिए पसंदीदा खाना छोड़ा, लेकिन हार नहीं मानी। अब आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई है।
सुरेंद्र कहते हैं, 'मैंने देश की सेवा की है, लेकिन जब पता चला कि मेरा बेटा भारत के लिए खेलेगा, उससे बड़ी खुशी कुछ नहीं हो सकती। अब बस भगवान से यही दुआ है कि वह अगले 10-15 साल तक हिंदुस्तान के लिए खेले।'
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