पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का सार्वजनिक शिक्षा क्षेत्र तेजी से गिरावट का सामना कर रहा है, क्योंकि हजारों सरकारी स्कूलों को निजीकरण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी नीतियों के तहत सौंपा जा रहा है। इससे शिक्षक संगठनों और शिक्षा कार्यकर्ताओं के बीच गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के आंकड़ों के अनुसार, लगभग साढ़े तीन साल पहले पंजाब में 47,413 सरकारी प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय थे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग योजनाओं के लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 38,108 रह गई है। शेष संस्थानों में 21,637 प्राथमिक विद्यालय, 7,298 माध्यमिक विद्यालय, 8,236 उच्च विद्यालय और 937 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई आउटसोर्सिंग पहलों के तहत गर्मियों की छुट्टियों के दौरान 15,000 और स्कूलों को निजी प्रबंधन को सौंपा जा सकता है। अधिकारियों ने कथित तौर पर "नवाज़ शरीफ एनिमेशन" नामक एक परियोजना के तहत प्रमुख शहरों और जिला मुख्यालयों में स्थित लगभग 500 हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों को बेचने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इन संस्थानों के लिए निविदा आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। पंजाब के स्कूल शिक्षा विभाग में वर्तमान में 673,120 स्वीकृत शिक्षण पद हैं। हालांकि, वर्तमान में पूरे प्रांत में केवल 310,401 शिक्षक ही कार्यरत हैं। इनमें 161,128 प्राथमिक विद्यालय शिक्षक, 100,056 माध्यमिक विद्यालय शिक्षक और 43,826 हाई और हायर सेकेंडरी स्तर के शिक्षक शामिल हैं, जबकि हजारों शेष पदों को कथित तौर पर समाप्त कर दिया गया है।
शिक्षक भर्ती 2018 से निलंबित है, और अधिकारी अब स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति के बजाय दैनिक मजदूरी और निश्चित वेतन पर शिक्षण प्रशिक्षुओं की भर्ती पर विचार कर रहे हैं। एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, कई शिक्षक संघों के नेताओं ने इस नीति की कड़ी आलोचना करते हुए तर्क दिया कि पहले निजीकृत स्कूल प्रभावी ढंग से कार्य करने में विफल रहे थे। पंजाब शिक्षक संघ के अध्यक्ष रमज़ान इंकलाबी और अन्य प्रतिनिधियों ने दावा किया कि परिचालन संबंधी विफलताओं के कारण कई खरीदार अब सरकार से उन संस्थानों को वापस लेने का अनुरोध कर रहे हैं। शिक्षा प्रतिनिधियों ने प्रांतीय नौकरशाही पर सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को कमजोर करने और शिक्षा में राज्य की भूमिका को कम करने का प्रयास करने का आरोप लगाया। उन्होंने निजीकरण पर तत्काल रोक लगाने की मांग की और जोर देकर कहा कि संविधान नागरिकों के लिए मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की गारंटी देता है।
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अमेरिका और इजरायल ने जिस युद्ध को ईरान के खिलाफ अपनी ताकत का प्रदर्शन समझकर शुरू किया था, वही अब उनके गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी कांग्रेस की शोध सेवा की ताजा रिपोर्ट ने उस सच से पर्दा उठा दिया है जिसे अब तक वॉशिंगटन दबाने की कोशिश करता रहा। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के खिलाफ चलाई गई चालीस दिन की भीषण सैन्य मुहिम में अमेरिका के कम से कम 42 सैन्य विमान या तो तबाह हो गए या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए।
यह खुलासा केवल सैन्य नुकसान का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस अमेरिकी दंभ पर सीधा प्रहार है जो खुद को दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति बताता रहा है। अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध में चार एफ-15 ई स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान, एक एफ-35 ए लड़ाकू विमान, एक ए-10 हमला विमान, सात केसी-135 ईंधन आपूर्ति विमान, एक ई-3 चेतावनी और नियंत्रण विमान, दो एमसी-130 जे विशेष अभियान विमान, एक एचएच-60 डब्ल्यू बचाव हेलीकाप्टर, चौबीस एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और एक एमक्यू-4 सी ट्राइटन ड्रोन को भारी नुकसान पहुंचा।
रिपोर्ट के मुताबिक यह पूरा सैन्य अभियान 28 फरवरी 2026 को इजरायल के साथ मिलकर “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के नाम से शुरू किया गया था। अमेरिका ने सोचा था कि कुछ ही दिनों में ईरान को घुटनों पर ला दिया जाएगा, लेकिन हालात इसके बिल्कुल उलट हो गए। पूरे पश्चिम एशिया में मिसाइल, समुद्री और हवाई संघर्ष भड़क उठा। अप्रैल में संघर्ष विराम के बाद हमले कुछ समय धीमे जरूर पड़े, लेकिन तनाव अब भी विस्फोटक बना हुआ है।
सबसे बड़ी चोट अमेरिका की उस तकनीकी श्रेष्ठता पर लगी है जिस पर वह वर्षों से दुनिया को डराता आया है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने दावा किया कि उनकी सेना ने दुनिया के सबसे आधुनिक माने जाने वाले एफ पैंतीस लड़ाकू विमान को मार गिराया। उन्होंने साफ कहा कि अगर युद्ध दोबारा शुरू हुआ तो दुनिया को और भी बड़े झटके देखने को मिलेंगे।
युद्ध का आर्थिक बोझ भी अमेरिका की कमर तोड़ने लगा है। अमेरिकी रक्षा विभाग के नियंत्रक जूल्स हर्स्ट तृतीय ने अमेरिकी सांसदों के सामने माना कि ईरान अभियान की लागत अब 29 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। यह रकम लगातार बढ़ रही है क्योंकि तबाह हुए विमानों और सैन्य उपकरणों की मरम्मत और बदली पर भारी खर्च आ रहा है।
स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि अमेरिकी नौसेना ने चेतावनी दी है कि अगर कांग्रेस से आपातकालीन धन नहीं मिला तो आने वाले महीनों में बजट संकट खड़ा हो जाएगा। युद्ध में कम से कम पंद्रह अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और पांच सौ से ज्यादा घायल हुए हैं। अमेरिकी युद्धपोत जेराल्ड आर फोर्ड में आग लगने की घटना ने अमेरिकी सैन्य व्यवस्था की कमजोरी को और उजागर कर दिया। दूसरी तरफ अमेरिका की वायु रक्षा और लंबी दूरी की मिसाइलों का भंडार तेजी से खाली हो रहा है।
देखा जाये तो ईरान ने इस पूरे संघर्ष में केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी अमेरिका को गहरी चोट पहुंचाई है। हार्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है। यही वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है। अमेरिकी विश्लेषकों तक ने मानना शुरू कर दिया है कि अगर इस क्षेत्र पर ईरान का दबदबा कायम रहता है तो पश्चिम एशिया में अमेरिका की पकड़ ढह सकती है और चीन तथा रूस का प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
साथ ही युद्ध के बाद अमेरिका की छवि भी बुरी तरह हिल गई है। जिस देश ने खुद को दुनिया का प्रहरी बताया, वही अब अधूरे युद्ध और बिखरी रणनीति का प्रतीक बनता दिख रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि वियतनाम और अफगानिस्तान जैसी हारों के बावजूद अमेरिका की वैश्विक स्थिति पर इतना बड़ा असर नहीं पड़ा था, लेकिन ईरान के साथ मौजूदा टकराव पूरी तरह अलग है। यह हार ऐसी हो सकती है जिसे न सुधारा जा सके और न छिपाया जा सके।
रिपोर्ट में यह भी साफ कहा गया कि वास्तविक नुकसान का आंकड़ा आगे और बढ़ सकता है क्योंकि कई सूचनाएं अब भी गोपनीय हैं और संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अमेरिकी रक्षा विभाग और सेंटकाम अब तक इस युद्ध में हुए वास्तविक नुकसान का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने से बच रहे हैं। इससे यह आशंका और मजबूत हो रही है कि असली तबाही आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती है।
इस बीच, संघर्ष विराम के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता ठप पड़ी है। ईरान की मांग है कि उसके खिलाफ सभी सैन्य कार्रवाइयां बंद हों, उसके सहयोगी गुटों पर हमले रोके जाएं, अमेरिकी सेना ईरान के आसपास के इलाकों से हटे, आर्थिक प्रतिबंध खत्म किए जाएं और फ्रीज किये गये धन को वापस किया जाए। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इन मांगों को मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने परमाणु वार्ता को युद्धविराम से अलग करने की ईरानी मांग को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है।
बहरहाल, ईरान युद्ध ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि केवल अत्याधुनिक हथियार और अरबों डॉलर का सैन्य बजट किसी देश को अजेय नहीं बना सकता। अमेरिका ने जिस घमंड के साथ “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया था, वही अब उसकी वैश्विक साख पर सबसे बड़ा हमला बन गया है। दुनिया देख रही है कि पश्चिम एशिया की आग में अमेरिका की सैन्य ताकत, आर्थिक संसाधन और राजनीतिक प्रतिष्ठा तीनों झुलसते जा रहे हैं।
-नीरज कुमार दुबे
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