Explainer: चीन अरुणाचल प्रदेश पर क्यों करता है दावा? तिब्बत, तवांग और मैकमोहन लाइन का क्या है कनेक्शन
भारत और चीन के बीच सीमा का विवाद दशकों पुराना है. चीन भारत के अभिन्न अंग लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के हिस्सों को अपना बताता है. अरुणाचल प्रदेश भारत और चीन के सीमा विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. वह अरुणाचल के बड़े हिस्से को अपना बताता है. चीन इसे जांगनान यानी दक्षिणी तिब्बत कहता है. चीन के इस दावे को भारत पूर्ण रूप से खारिज करता है. भारत ने हर बार अरुणाचल को भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग बताया है.
आखिर में सवाल है कि आखिर अरुणाचल प्रदेश पर चीन हमेशा दावा क्यों करता है? आखिर इस विवाद में तिब्बत, तवांग और 1914 की मैकमोहन लाइन की क्या भूमिका है? आइये जानते हैं….
सबसे पहले समझिए अरुणाचल प्रदेश का महत्व
अरुणाचल प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर में स्थित एक राज्य हैै. इसकी सीमा भूटान, म्यांमार और चीन के साथ लगती है. भारत-चीन सीमा के पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता है. चीन करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर वाले भारतीय इलाके को अपना कहता है. ये इलाका सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं है. इसकी भौगोलिक स्थिति बहुत ज्यादा रणनीतिक है. यहीं हिमालयी दर्रों के जरिए तिब्बत के पठार की ओर जाने वाला रास्ता है. इसके अलावा, तवांग का धार्मिक और सामरिक महत्व इसे और अधिक संवेदनशील बना देता है.
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तिब्बत का इस विवाद से क्या संबंध है?
अरुणाचल पर चीन के दावे को समझने के लिए तिब्बत सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. साल 1914 में जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब तिब्बत और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा तय करने के लिए शिमला में एक सम्मेलन हुआ. इसमें ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधि शामिल हुए थे. इसी प्रक्रिया में भारत और तिब्बत के बीच सीमा के लिए जिस रेखा का निर्धारण हुआ, उसे बाद में मैकमोहन लाइन कहा गया.
चीन तर्क देता है कि उस वक्त तिब्बत को स्वतंत्र रूप से इंटरनेशनल समझौते करने का अधिकार नहीं था. इसलिए चीन 1914 में तय हुई सीमा को स्वीकार नहीं करता है. चीन का कहना है कि तिब्बत चीन का हिस्सा था और तिब्बती प्रतिनिधि को ब्रिटिश भारत के साथ ऐसी सीमा तय करने का अधिकार नहीं था. चीन के उलट भारत की स्थिति अलग है. भारत मैकमोहन लाइन को पूर्वी सीमा की वैध ऐतिहासिक सीमा कहता है.
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क्या है 1914 की मैकमोहन लाइन?
अब बात विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी- मैकमोहन लाइन. 1913-14 में शिमला सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन ने भारत और तिब्बत के बीच सीमा का निर्धारण किया था. ये रेखा करीब 890 किलोमीटर लंबी है. इस सीमा को हिमालय के पहाड़ी क्षेत्र को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. इस दौरान, तवांग भारतीय सीमा की ओर आ गया था. लेकिन चीन ने शिमला सम्मेलन की अंतिम व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया.
तवांग इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
अरुणाचल विवाद की कोई सबसे संवेदनशील जगह है- तवांग. तवांग भारत का हिस्सा है, जो तिब्बत के भी करीब है. तवांग सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से भी ये काफी ज्यादा अहम है. तवांग मठ तिब्बती बौद्ध धर्म की प्रमुख संस्थाओं में से एक है. इसका संबंध तिब्बती बौद्ध परंपरा और दलाई लामा की संस्था से रहा है. छठ दलाईलामा का जन्म तवांग में ही हुआ था.
चीन तवांग और ल्हासा के बीच पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों का हवाला देता है. चीन का तर्क है कि तवांग का ऐतिहासिक रूप से तिब्बत के धार्मिक संस्थाओं से संबंध रहा है, जिस वजह से यह क्षेत्र दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है. सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को आधुनिक इंटरनेशनल सीमा का निर्णायक आधार मानना भारत स्वीकार नहीं करता है.
चीन अरुणाचल को ‘दक्षिणी तिब्बत’ क्यों कहता है?
चीन अरुणाचल को आधिकारिक तौर पर भारत का राज्य मानने से इनकार करता है. वह इसे दक्षिणी तिब्बत कहता है. अप्रैल 2026 में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा था कि जांगनान चीन का क्षेत्र है. चीन अरुणाचल प्रदेश नाम को मान्यता नहीं देता है. चीन का तर्क तिब्बत की ऐतिहासिकता से जुड़ा है और अरुणाचल तिब्बत के दक्षिण में है, जिस वजह से चीन इसे दक्षिणी तिब्बत कहता है.
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फिर 1962 का युद्ध क्यों हुआ?
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद 1950 और 1960 के दशक में तेजी से बढ़ा, जिस वजह से भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ गया. 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हो गया. युद्ध में भारतीय सेना को पीछे हटना पड़ा. बाद में चीन ने भी अपनी सेना वापस बुला ली. युद्ध के बाद भी सीमा विवाद का समाधान नहीं हुआ. आज भारत और चीन के बीच पूरी सीमा पर Line of Actual Control यानी LAC है, लेकिन दोनों देशों की LAC की धारणा पूरी तरह समान नहीं है. पूर्वी सेक्टर में LAC का बड़ा हिस्सा मैकमोहन लाइन के आसपास माना जाता है।
चीन बार-बार अरुणाचल के स्थानों के नाम क्यों बदलता है?
वक्त-वक्त पर चीन अरुणाचल के शहरों, गांवों, पहाड़ों और अन्य भौगौलिक स्थानों के लिए चीनी नाम जारी करता है. भारत का कहना है कि इस प्रकार से असल में देश की संप्रभुता नहीं बदलती है. भारत 2023 और 2024 में भी चीन की ऐसी कोशिशों को खारिज कर चुका है. चीन ने 2026 में भी जांगनान क्षेत्र के कुछ स्थानों के लिए मानकीकृत नाम जारी किए. चीन इसे अपने प्रशासनिक अधिकारों के तहत उठाया गया कदम बताता है. भारत इसे अपने क्षेत्र पर गलत दावा मजबूत करने की कोशिश मानता है.
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टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने एजीएम से पहले दिया इस्तीफा, पुनर्नियुक्ति के लिए नहीं करेंगे आवेदन
नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। टाटा समूह में एक बड़े नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत हो गई है। एनडीटीवी प्रॉफिट के सूत्रों के हवाले से आई एक रिपोर्ट के अनुसार, टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि वह अपने मौजूदा कार्यकाल के अंत तक, यानी फरवरी 2027 तक चेयरमैन की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे, लेकिन पुनर्नियुक्ति के लिए आवेदन नहीं करेंगे।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पिछले कई महीनों से उनके कार्यकाल के विस्तार को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेदों की खबरें सामने आ रही थीं।
टाटा संस देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक है और टीसीएस, टाटा मोटर्स, एयर इंडिया समेत 30 से अधिक प्रमुख कंपनियों को नियंत्रित करता है। वहीं, टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसके चलते समूह के रणनीतिक फैसलों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
अपने बयान में एन. चंद्रशेखरन ने कहा, मैंने टाटा ग्रुप में अपने प्रोफेशनल जीवन के 40 साल पूरे कर लिए हैं। मैं इस प्रतिष्ठित संस्थान में योगदान देने के बेहद संतोषजनक अवसर के लिए आभारी हूं। पिछले एक दशक से टाटा संस का नेतृत्व करना मेरे लिए बहुत सम्मान और बड़ी ज़िम्मेदारी की बात रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव को लेकर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और उनके बीच मतभेद उभरकर सामने आए थे। बताया जा रहा है कि समूह के भविष्य के गवर्नेंस ढांचे, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और बोर्ड में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के विचार अलग-अलग थे। इसी कारण कार्यकाल विस्तार पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
गौरतलब है कि एन. चंद्रशेखरन ने वर्ष 1987 में टाटा समूह के साथ अपना करियर शुरू किया था। वर्ष 2009 में वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) बने और उनके नेतृत्व में कंपनी ने वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय विस्तार किया। इसके बाद 2017 में उन्हें टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया था।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान टाटा समूह ने कई बड़े कारोबारी और परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना किया है। एयर इंडिया से जुड़े नियामकीय मुद्दे, टीसीएस पर मूल्य निर्धारण का दबाव और जगुआर लैंड रोवर पर हुए साइबर हमले जैसी घटनाएं समूह के लिए चुनौती बनी रहीं। इसके बावजूद समूह ने विभिन्न क्षेत्रों में निवेश और विस्तार की रणनीति को आगे बढ़ाया।
टाटा समूह के इतिहास में टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद पहली बार सामने नहीं आए हैं। इससे पहले वर्ष 2016 में तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को पद से हटाने को लेकर भी दोनों संस्थाओं के संबंध चर्चा में रहे थे। अब चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद समूह की अगली नेतृत्व व्यवस्था पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
--आईएएनएस
डीबीपी
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