फिटनेस की शुरुआत करना आसान है लेकिन उसे लम्बे समय तक जारी रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कई लोग कुछ हफ़्तों तक पूरे जोश के साथ वर्कआउट (workout) करते हैं, फिर थकान, व्यस्त दिनचर्या या मोटिवेशन (motivation) की कमी के कारण अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते।
अपने स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती के लिए के लिए आपको हर दिन खुद को पूरी तरह थकाने की ज़रूरत नहीं है। कुछ छोटे और स्मार्ट बदलाव आपकी यात्रा को आसान और टिकाऊ बना सकते हैं। ऐसे पांच टिप्स हमने यहाँ सूचीबद्ध किए हैं:
1. हर दिन 100% देने की बजाय नियमित रहें
क्या आप सोचते हैं कि हर वर्कआउट का लक्ष्य (workout goal) खुद को पूरी तरह थका देना होता है? तो, यह बिलकुल गलत है। कुछ दिन आपकी एनर्जी (energy) कम होगी और यह बिलकुल सामान्य है। ऐसे दिनों में हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग या छोटी वॉक भी काफी होती है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि आपकी आदत बनी रहे। यदि आपको लंबे समय तक अच्छे नतीजे चाहिए तो नियमित रहना आवश्यक है न कि सिर्फ कुछ दिनों तक बहुत ज़यादा मेहनत करना।
2. रिकवरी को भी प्राथमिकता दें
अगर आपके शरीर को आराम नहीं मिलेगा, तो प्रदर्शन भी धीरे-धीरे गिरने लगेगा। अच्छी नींद, पर्याप्त पानी और संतुलित आहार आपकी रिकवरी को बेहतर बनाते हैं। अगर आप नियमित रूप से स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (strength training) करते हैं, तो अपने आहार में पर्याप्त प्रोटीन शामिल करने की कोशिश करें। ज़रूरत के अनुसार आप
whey protein powder का इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि रोज़ाना की प्रोटीन (protein) ज़रूरत पूरी करने में आसानी हो सके। हालांकि, यह संतुलित भोजन का विकल्प नहीं बल्कि एक सुविधाजनक पूरक है।
3. छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं
अगर आपका लक्ष्य सिर्फ 10 किलो वज़न कम करना या सिक्स पैक बनाना है, तो इसमें समय लग सकता है। इसकी बजाय छोटे लक्ष्य तय करें, जैसे इस हफ्ते चार दिन वर्कआउट करना, रोज़ 8,000 कदम चलना या पहले से थोड़ा ज़्यादा वज़न उठाना। छोटे-छोटे लक्ष्य पूरे होने पर आत्मविश्वास बढ़ता है और फिटनेस का सफर ज़्यादा मज़ेदार लगता है।
4. फिटनेस को आदत बनाएं
अपनी फिटनेस के लिए ऐसी गतिविधियां चुनें जिनमें आपको मज़ा आता हो, चाहे वह जिम (gym) हो, योग (yoga), साइक्लिंग (cycling), डांस (dance) या तेज़ चलना। जब फिटनेस आपकी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन जाती है, तो उसे जारी रखना आपके लिए आसान हो जाता है।
5. अपने शरीर की सुनें
हर दिन एक जैसा नहीं होता। अगर लगातार थकान महसूस हो रही है या मांसपेशियों (muscles) में दर्द बना हुआ है, तो आपका शरीर शायद आराम मांग रहा है। ज़रूरत से ज़्यादा ट्रेनिंग करने की बजाय आप रिकवरी (recovery) पर ध्यान दें। कुछ लोग अपने फिटनेस प्लान के अनुसार
liquid carnitine जैसे सप्लीमेंट्स को शामिल करते हैं, लेकिन याद रखें कि किसी भी सप्लीमेंट लेने के साथ नियमित ट्रेनिंग, सही खानपान और पर्याप्त आराम का पूरा ध्यान रखें।
निष्कर्ष
फिटनेस कोई 30 दिन का चैलेंज नहीं, बल्कि लंबे समय की आदत है। खुद को हर दिन थकाने की बजाय समझदारी से ट्रेनिंग करें, शरीर को पर्याप्त आराम दें और छोटे-छोटे कदमों पर ध्यान रखें। धीरे-धीरे यही छोटी आदतें बड़े बदलाव लेकर आती हैं। याद रखें, सबसे सफल फिटनेस जर्नी वही होती है जो लंबे समय तक बिना रुके चलती है।
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किसी भी समस्या के प्रति किसी व्यक्ति का व्यवहार कैसा है, इसको मनोविज्ञान की भाषा में 'लोकस ऑफ कंट्रोल' बोलते हैं। अगर हर मुश्किल के लिए कोई व्यक्ति खुद को जिम्मेदार मानते हुए उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करता है। तो इसको इंटरनल लोकस ऑफ कंट्रोल कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जब कोई अपनी हर एक समस्या के लिए बाहरी वजहों को दोषी मानता है, तो इसको एक्सटर्नल लोकस ऑफ कंट्रोल कहा जाता है।
इमोशनल मैनेजमेंट
बता दें कि इंटरनल एलओसी वाले लोगों को खुद पर इस बात का यकीन रहता है कि वह अपने व्यवहार और इच्छाओं को कंट्रोल कर सकते हैं। इसके ठीक उलट एक्सटर्नल एलओसी वाले लोग यह मानते हैं कि उनकी जिंदगी को बाहरी लोग कंट्रोल करते हैं।
लोकस ऑफ कंट्रोल उस मनोदशा की जांच करता है, जिसके तहत लोग यह यकीन करते हैं कि उनकी सेहत और अन्य किसी हालात पर आंतरिक या बाहरी वजहों का किस सीमा तक कंट्रोल है। लेकिन यह उनके दिमाग के काम करने के तरीके का अध्ययन है।
एक्सटर्नल एलओसी
इन लोगों के मन में ऐसी धारणा बनी रहती है कि उनके जीवन की स्थितियां किसी के भाग्य या फिर किस्मत के कंट्रोल में हैं।
इंटरनल एलओसी
इन लोगों का मानना होता है कि उनका जीवन जैसा भी है, वह उनके अपने कामों का प्रत्यक्ष परिणाम है।
ये लोग मानते हैं कि उनका जीवन जैसा भी है, वह उनके अपने कार्यों का ही प्रत्यक्ष परिणाम है।
उदाहरण के तौर पर जो लोग वेट कम करने के लिए दवाओं की मदद लेना चाहते हैं। वह वेट लॉस में उतना सफल नहीं होते हैं। जबकि संतुलित खानपान और रोजाना की एक्सरसाइज अपनाने वाले लोग आसानी से अपना वेट कंट्रोल कर लेते हैं।
इस लिहाज से अपनी मनोदशा को समझते हुए खुद को इमोशनल मैनेजमेंट करना ज्यादा पॉजिटिव और सही कोशिश है। इसके उलट एक्सटर्नल एलओसी वाले लोगों में पेशेंस की खासी कमी होती है। फिर भी कई बार समस्या के हिसाब से संतुलित ढंग से उसके समाधान के लिए दोनों तरीकों को अपनाते हुए इमोशनल मैनेजमेंट की जरूरत होती है।
छोटी शुरुआत जरूरी
बदलते वक्त की जरूरतों के हिसाब से लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसले दूसरों से पूछे बिना खुद लें। लोकस ऑफ कंट्रोल आपके बारे में काफी कुछ कहता है। अगर आप इसको मैनेज करना सीख गए तो हर समस्या का हल खोजना आसान हो जाएगा।
आपकी खुशियों का पासवर्ड
आत्मसम्मान
दूसरों के सामने ऐसा कोई भी काम न करें, जो दूसरों के सामने तो आपकी छवि को बेहतर बनाए, लेकिन आपको वह काम नापसंद हो।
संतुलन है जरूरी
सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव आता है। दोनों की स्थितियों में संयमित रहना जरूरी होता है। सफलता के बाद अति-उत्साहित और नाकामी से मिलने वाली निराशा की वजह से अक्सर लोग गलतियां करते हैं। इसलिए दोनों ही स्थितियों में शांत रहना जरूरी है।
बातचीत करना जरूरी
अगर आपका मन कभी तनावग्रस्त हो और आप किसी समस्या का समाधान नहीं खोज पा रहे हैं। तो परिवार के सदस्यों या किसी अपने करीबी दोस्त से बात करें।
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