किसी भी समस्या के प्रति किसी व्यक्ति का व्यवहार कैसा है, इसको मनोविज्ञान की भाषा में 'लोकस ऑफ कंट्रोल' बोलते हैं। अगर हर मुश्किल के लिए कोई व्यक्ति खुद को जिम्मेदार मानते हुए उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करता है। तो इसको इंटरनल लोकस ऑफ कंट्रोल कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जब कोई अपनी हर एक समस्या के लिए बाहरी वजहों को दोषी मानता है, तो इसको एक्सटर्नल लोकस ऑफ कंट्रोल कहा जाता है।
इमोशनल मैनेजमेंट
बता दें कि इंटरनल एलओसी वाले लोगों को खुद पर इस बात का यकीन रहता है कि वह अपने व्यवहार और इच्छाओं को कंट्रोल कर सकते हैं। इसके ठीक उलट एक्सटर्नल एलओसी वाले लोग यह मानते हैं कि उनकी जिंदगी को बाहरी लोग कंट्रोल करते हैं।
लोकस ऑफ कंट्रोल उस मनोदशा की जांच करता है, जिसके तहत लोग यह यकीन करते हैं कि उनकी सेहत और अन्य किसी हालात पर आंतरिक या बाहरी वजहों का किस सीमा तक कंट्रोल है। लेकिन यह उनके दिमाग के काम करने के तरीके का अध्ययन है।
एक्सटर्नल एलओसी
इन लोगों के मन में ऐसी धारणा बनी रहती है कि उनके जीवन की स्थितियां किसी के भाग्य या फिर किस्मत के कंट्रोल में हैं।
इंटरनल एलओसी
इन लोगों का मानना होता है कि उनका जीवन जैसा भी है, वह उनके अपने कामों का प्रत्यक्ष परिणाम है।
ये लोग मानते हैं कि उनका जीवन जैसा भी है, वह उनके अपने कार्यों का ही प्रत्यक्ष परिणाम है।
उदाहरण के तौर पर जो लोग वेट कम करने के लिए दवाओं की मदद लेना चाहते हैं। वह वेट लॉस में उतना सफल नहीं होते हैं। जबकि संतुलित खानपान और रोजाना की एक्सरसाइज अपनाने वाले लोग आसानी से अपना वेट कंट्रोल कर लेते हैं।
इस लिहाज से अपनी मनोदशा को समझते हुए खुद को इमोशनल मैनेजमेंट करना ज्यादा पॉजिटिव और सही कोशिश है। इसके उलट एक्सटर्नल एलओसी वाले लोगों में पेशेंस की खासी कमी होती है। फिर भी कई बार समस्या के हिसाब से संतुलित ढंग से उसके समाधान के लिए दोनों तरीकों को अपनाते हुए इमोशनल मैनेजमेंट की जरूरत होती है।
छोटी शुरुआत जरूरी
बदलते वक्त की जरूरतों के हिसाब से लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसले दूसरों से पूछे बिना खुद लें। लोकस ऑफ कंट्रोल आपके बारे में काफी कुछ कहता है। अगर आप इसको मैनेज करना सीख गए तो हर समस्या का हल खोजना आसान हो जाएगा।
आपकी खुशियों का पासवर्ड
आत्मसम्मान
दूसरों के सामने ऐसा कोई भी काम न करें, जो दूसरों के सामने तो आपकी छवि को बेहतर बनाए, लेकिन आपको वह काम नापसंद हो।
संतुलन है जरूरी
सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव आता है। दोनों की स्थितियों में संयमित रहना जरूरी होता है। सफलता के बाद अति-उत्साहित और नाकामी से मिलने वाली निराशा की वजह से अक्सर लोग गलतियां करते हैं। इसलिए दोनों ही स्थितियों में शांत रहना जरूरी है।
बातचीत करना जरूरी
अगर आपका मन कभी तनावग्रस्त हो और आप किसी समस्या का समाधान नहीं खोज पा रहे हैं। तो परिवार के सदस्यों या किसी अपने करीबी दोस्त से बात करें।
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बदलता हुआ मौसम अपने साथ ढेर सारी बीमारियां लेकर आता है। मानसून के समय कई बीमारियों का खतरा अधिक हो जाता है। इस दौरान वायरल फीवर के मामले में भी काफी तेजी से बढ़ते हैं। बरसात के समय मौसम में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक कोई भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।
असल में वायरल फीवर एक वायरस से नहीं, बल्कि कई तरह के वायरल संक्रमणों के कारण होता है। इसकी शुरुआत अक्सर तेज बुखार, शरीर में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश, खांसी, जुकाम और कमजोरी जैसे लक्षणों से होती है।
इस दौरान पर्याप्त रुप से आराम करना भी काफी जरुरी है। अगर लंबे समय तक बुखार बना रहें और सांस लेने में समस्या हो, कमजोरी महसूस हो या कोई अन्य लक्षण नजर आए, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। आइए आपको वायरल फीवर के लक्षण क्या है और इससे बचने के आसान तरीके बताते हैं।
वायरल फीवर कितने दिन रहता है?
- आमतौर पर वायरल फीवर 3 से 7 दिन तक रहता है।
- अक्सर लोगों में बुखार उतरने के बाद भी 1 से 2 सप्ताह तक कमजोरी और थकान महसूस होने लगती है।
- यदि आपको बुखार 5 से 7 दिन से ज्यादा बना हुआ है या बार-बार आ रहा है, तो एक बार डॉक्टर जरुर दिखा लें।
वायरल फीवर के सामान्य लक्षण
- तेज बुखार आना
- पूरे शरीर और मांसपेशियों में दर्द बना रहना
- लगातार सिरदर्द होना
- गले में खराश
- खांसी और जुकाम से परेशान रहना
- कमजोरी और थकान
- भूख कम लगना
- ठंड लगना या कंपकंपी
वायरल फीवर होने पर क्या करें?
- आराम करना बेहद जरुरी है।
- दिनभर खूब पानी पिएं, नारियल पानी का सेवन, सूप और अन्य तरल पदार्थ जरुर लें।
- इस दौरान हल्का और न्यूट्रिशन से भरपूर जैसे खिचड़ी, दाल, सूप और फल खाएं।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवाई लें।
- शरीर का तापमान नियमित रुप से चेक करते रहे हैं।
वायरल फीवर से बचाव के तरीके
- हाथों को साबुन से अच्छे तरीके से बार-बार धोएं।
- भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क जरुर पहनें।
- संक्रमित व्यक्ति से संपर्क में आने से बचें।
- संतुलित आहार लें और पर्याप्त नींद जरुर लें।
- रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी जरुर पिएं।
- घर और आसपास साफ-सफाई जरुर रखें।
- नियमित तौर पर व्यायाम कर इम्यूनिटी को मजबूत बनाएं।
कब डॉक्टर को दिखाएं?
- बुखार में 5 से 7 दिन से ज्यादा रहे।
- अगर आपको सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर को दिखाएं।
- लगातार उल्टी या तेज कमजोरी महसूस होना।
- बेहोश होना, भ्रम या दौरे जैसे लक्षण दिखाईं दे।
- बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को तेज बुखार हो।
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