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इनफिनिट स्क्रॉल से ऑटो-प्ले तक, सोशल मीडिया बच्चों को स्क्रीन से चिपकाए रखता है, जानें माता-पिता क्या करें?

नई दिल्ली, 13 मई (आईएएनएस)। आजकल के समय में मोबाइल फोन एक बड़ी जरूरत बन चुका है लेकिन परेशानी तब आती है, जब कम उम्र में इसकी जद में बच्चे व युवा पीढ़ी आ जाती है। कड़वी सच्चाई है कि बच्चों को फोन से अलग करना मुश्किल हो गया है। वे घंटों स्क्रॉल करते रहते हैं। क्या आप जानते हैं कि यह कोई संयोग नहीं है? सोशल मीडिया ऐप्स को जानबूझकर ऐसे डिजाइन किया गया है कि बच्चे लगातार उन पर बने रहें।

यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फंड (यूनिसेफ) इस बारे में डिजिटल पेरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. जैकलीन नेसी के हवाले से विस्तार से जानकारी देता है। डॉ. जैकलीन नेसी बताती हैं कि सोशल मीडिया कंपनियां कई खास फीचर्स का इस्तेमाल करती हैं, जो बच्चों और बड़ों को स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं। इनमें सबसे आम हैं इनफिनिट स्क्रॉल यानी ऐसी फीड जो कभी खत्म नहीं होती, ऑटो-प्ले मतलब कि वीडियो अपने आप चलते रहते हैं और नोटिफिकेशन, लाइक्स, व्यूज और स्ट्रीक्स जैसी गिनती वाले फीचर्स। इनकी वजह से बच्चे बार-बार ऐप खोलते रहते हैं और समय का पता ही नहीं चलता।

एक्सपर्ट बताते हैं कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम बहुत चालाक तरीके से काम करता है। यह देखता है कि आप कौन से वीडियो ज्यादा देर तक देखते हैं, कौन सी पोस्ट पर रुकते हैं। फिर उसी तरह का और ज्यादा कंटेंट आपके सामने लाता है। इसका मकसद सिर्फ एक है- आप जितना ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएं, उतना बेहतर। हालांकि, ये एल्गोरिदम बच्चों की भलाई को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते, बल्कि उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं।

अब सवाल है कि बच्चे इसमें क्यों ज्यादा फंस जाते हैं? तो एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चों और किशोरों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। उनमें खुद पर कंट्रोल करने की क्षमता पूरी तरह नहीं आई होती। वे सोशल रिवार्ड्स जैसे लाइक्स और कमेंट्स के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर दोस्त सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से बात कर रहे हैं और बच्चा उसमें शामिल नहीं है तो उसे अकेलापन महसूस होता है। इसलिए वे ऐप छोड़ पाने में मुश्किल महसूस करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ता है। सोशल मीडिया का असर हर बच्चे पर अलग-अलग होता है। कुछ बच्चे जो पहले से भावनात्मक रूप से संवेदनशील हैं, उन्हें ज्यादा नुकसान हो सकता है। वहीं, कुछ बच्चे सही मार्गदर्शन के साथ इसका सकारात्मक इस्तेमाल भी कर सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया नींद, खेलकूद, पढ़ाई और असली जीवन के रिश्तों की जगह लेने लगता है।

अगर बच्चा सोशल मीडिया की वजह से नींद नहीं ले पा रहा, होमवर्क अधूरा छोड़ रहा, परिवार के साथ समय नहीं बिता रहा या स्कूल में ध्यान नहीं दे पा रहा है, तो यह चिंता की बात है।

ऐसे में डॉ. जैकलीन नेसी माता-पिता को तीन मुख्य सुझाव देती हैं- पहला खुलकर बात करें – बच्चे से बिना डांटे पूछें कि उन्हें सोशल मीडिया पर इतना समय क्यों बिताना अच्छा लगता है। इन ऐप्स के डिजाइन ट्रिक्स के बारे में भी समझाएं। दूसरा है सीमाएं तय करें – स्क्रीन टाइम की लिमिट रखें और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता दें। तीसरा है रोल मॉडल बनें यानी खुद भी फोन का संतुलित इस्तेमाल करें।

एक्सपर्ट का मानना है कि सोशल मीडिया पूरी तरह से बुरा नहीं है, लेकिन इसके इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है। इसमें माता-पिता को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि बच्चे स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकें।

--आईएएनएस

एमटी/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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नेपाल में बंदरों के आतंक से परेशान नगरपालिका ने लिया अजीबोगरीब फैसला!

काठमांडू, 13 मई (आईएएनएस)। बंदरों ने नेपाल के कई पहाड़ी क्षेत्रों में इस कदर तबाही मचाई है कि स्थानीय सरकार को एक अजीबोगरीब फैसला करना पड़ा। बंदरों के आतंक से निपटने के लिए एक दिन के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा कर दी गई है। ये लालिगुरास नगरपालिका ने लिया है। इस दिन इलाके के लोग सामूहिक तौर पर बंदरों को खेतों और बस्तियों से भगाने का काम करेंगे।

लालिगुरास नगरपालिका तेहरथुम जिले की है। एक दिन की छुट्टी जेष्ठ (1), यानी 15 मई को, पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक अवकाश घोषित की गई है, ताकि स्थानीय भाषा में “रातो बांदर” कहलाने वाले रीसस मकाक बंदरों के विरुद्ध ऑपरेशन चलाया जा सके। ये बंदर फसलों और सब्जियों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।

दरअसल, हुड़दंगी बंदरों का झुंड मक्का, आलू, कोदो, फल और सब्जियों को आए दिन नष्ट कर रहा है। बंदरों की इस हरकत से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, जबकि कई स्कूली बच्चे फसलों की सुरक्षा के लिए पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

मेयर अर्जुन माबुहांग के हस्ताक्षर से जारी सूचना में कहा गया कि बंदरों की समस्या को अक्सर मामूली समझा जाता है, लेकिन इसने ग्रामीण किसानों की आजीविका पर गंभीर असर डाला है।

सूचना में कहा गया, किसान अपनी कृषि उपज बचाने के लिए पूरी रात जागकर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। इसका असर न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर पड़ा है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और परिवारों के दैनिक जीवन पर भी पड़ा है।

नगरपालिका ने बताया कि 15 और 16 मई को दो दिवसीय अभियान चलाकर बंदरों को नगरपालिका की सीमा से बाहर खदेड़ा जाएगा। किसानों, जनप्रतिनिधियों, कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों से वार्ड कार्यालयों की ओर से तय किए गए स्थानों और निश्चित समय पर भाग लेने का आग्रह किया गया है।

मेयर माबुहांग ने कहा, “यह समस्या सामान्य लग सकती है, लेकिन इसने किसानों की आजीविका पर नकारात्मक असर डाला है। बंदर ग्रामीणों के उगाए मक्का, आलू, कोदो, फल और सब्जियों को नष्ट कर रहे हैं।”

नगरपालिका ने बंदरों से अधिक प्रभावित इलाकों में देखरेख करने वाले कर्मियों की तैनाती और अस्थायी चौकियां भी बनाई हैं। अधिकारियों के अनुसार, वार्ड-8 के मेघा, वार्ड-6 और 8 की सीमा पर स्थित नागेश्वरी और वार्ड-5 के सिंहाथाप में बंदर गश्ती दल तैनात किए गए हैं। फिलहाल चार कर्मचारी बस्तियों और खेतों से बंदरों को भगाने का काम कर रहे हैं।

माबुहांग ने कहा कि जब उनके कार्यकाल की शुरुआत में बंदरों को नियंत्रित करने के लिए कर्मचारियों की तैनाती की गई थी, तब कई लोगों ने इसका मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा, “उस समय लोगों ने इसे सामान्य समस्या माना, लेकिन अब किसान निराश हैं।”

उन्होंने संघीय सरकार से बंदरों की समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा मानते हुए दीर्घकालिक समाधान लागू करने की अपील की।

माबुहांग ने कहा, “केवल स्थानीय सरकारों के लिए इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। कृषि उत्पादन की रक्षा और किसानों को राहत देने के लिए संघीय सरकार को ठोस नीतियां और कार्यक्रम लाने होंगे।”

नगरपालिका सामुदायिक जंगलों में अमरूद और नाशपाती जैसे फलदार पेड़ लगाने की योजना भी बना रही है, ताकि जंगलों में ही बंदरों के लिए भोजन उपलब्ध हो सके और वे बस्तियों और खेतों में कम आएं।

हाल के वर्षों में नेपाल के पहाड़ी जिलों में फसलों पर बंदरों के हमले बड़ी समस्या बन गए हैं। किसानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

अधिकारियों और समुदायों ने पारंपरिक डराने के तरीकों से लेकर तकनीकी उपायों और नसबंदी अभियानों तक कई प्रयास किए, लेकिन सफलता सीमित रही।

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, 2024 में दिक्तेल रुपाकोट मझुवागढ़ी नगरपालिका के मेयर तीर्थ राज भट्टराई ने काठमांडू में भूख हड़ताल कर बंदरों और अन्य वन्यजीवों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग की थी।

इसके बावजूद सरकार अब तक बंदरों के आतंक को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी उपाय नहीं ढूंढ पाई है।

गंडकी प्रांतीय उद्योग, पर्यटन, वन और पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में सख्त उपायों की सिफारिश नहीं की गई, क्योंकि हिंदू धर्म में बंदरों का धार्मिक महत्व है और उन्हें भगवान हनुमान का रूप मानकर पूजा जाता है। अध्ययन में यह भी कहा गया कि नसबंदी और पकड़ने जैसे उपाय बंदरों की आबादी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाएंगे।

नेपाल में बंदरों की तीन प्रजातियां रीसस मकाक, असमिया बंदर और हनुमान लंगूर पाई जाती हैं।

नेपाल वन्य जीव और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध लगाने वाले कन्वेंशन (सीआईटीईएस) का भी हिस्सा है। राष्ट्रीय कानूनों के तहत सरकार की अनुमति के बिना संरक्षित वन्यजीवों के निर्यात पर रोक है। दोषी पाए जाने पर 5 से 15 वर्ष तक की जेल या 5 लाख से 10 लाख नेपाली रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में रीसस बंदर को संरक्षित पशुओं की सूची में शामिल किया गया है, इसलिए सरकारी अनुमति के बिना इसका निर्यात प्रतिबंधित है। हालांकि, अधिनियम में उन संरक्षित जानवरों को नियंत्रित करने के उपायों का जिक्र नहीं है जो लोगों और कृषि उत्पादन के लिए खतरा बनते हैं। अधिकारियों ने मंकी पार्क स्थापित करने का सुझाव भी दिया है।

--आईएएनएस

केआर/

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