तमिलनाडु में होगा बड़ा खेला! सरकार बनाने के लिए विजय ने चला नया दांव
तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद जबरदस्त हलचल मची हुई है. अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत के आंकड़े से अभी भी दूर है. ऐसे में सरकार बनाने के लिए विजय अब दूसरे दलों का समर्थन जुटाने में लगे हैं. दूसरी ओर ई के. पलानीस्वामी की AIADMK ने अपने विधायकों को पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया है, जिससे राज्य की राजनीति में “रिसॉर्ट पॉलिटिक्स” की वापसी हो गई है.
बहुमत से दूर TVK, समर्थन की तलाश तेज
234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की जरूरत है. रिपोर्ट्स के मुताबिक TVK करीब 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाई. इसके बाद विजय ने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया, हालांकि राज्यपाल ने उनसे बहुमत साबित करने के लिए समर्थन पत्र मांगे हैं.
अब विजय छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ AIADMK के कुछ नेताओं से भी संपर्क साध रहे हैं. खबरें हैं कि कांग्रेस पहले ही TVK को समर्थन देने का संकेत दे चुकी है और अब वाम दलों और VCK जैसे दलों की भूमिका भी अहम हो सकती है.
#WATCH | AIADMK General Secretary Edappadi K Palaniswami arrives at a private resort in Puducherry's Poorankuppam, where 28 Tamil Nadu AIADMK MLAs are currently accommodated as per media reports. pic.twitter.com/HSPJ18ihBO
— ANI (@ANI) May 7, 2026
इन पार्टियों के संपर्क में विजय
सूत्रों की मानें तो TVK ने TTV दिनाकरन की पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (एएमएमके) के इकलौते विजयी विधायक कमराज एस से संपर्क किया है. उधर VCK प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने कहा कि उनकी पार्टी की उच्चस्तरीय समिति शुक्रवार को बैठक करेगी और उसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा. यानी यहां से भी विजय के लिए अच्छी खबर आ सकती है.
विजय के पास ये भी है विकल्प
दरअसल राजनीतिक गलियारों में ये भी चर्चा है कि अगर AIADMK और DMK मिलकर सरकार बनाते हैं तो TVK के सभी विधायक जी हां 108 विधायक एक साथ इस्तीफा दे सकते हैं. ऐसा होता है कि तमिलनाडु के चुनाव दोबारा होंगे. ऐसे में हो सकता है कि किसी एक दल को बहुमत मिल जाए.
AIADMK ने क्यों शिफ्ट किए विधायक?
तमिलनाडु की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा AIADMK विधायकों को पुडुचेरी के रिसॉर्ट में भेजे जाने को लेकर हो रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी नेतृत्व को डर है कि कुछ विधायक विजय के समर्थन में जा सकते हैं। इसी वजह से 20 से ज्यादा विधायकों को रिसॉर्ट में रखा गया है.
बताया जा रहा है कि AIADMK के भीतर भी दो राय बन चुकी हैं. एक धड़ा विजय को समर्थन देकर सत्ता में हिस्सेदारी चाहता है, जबकि दूसरा विपक्ष में बैठने के पक्ष में है. यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व लगातार अपने विधायकों के साथ बैठकें कर रहा है.
DMK-AIADMK समीकरण की भी चर्चा
राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. सूत्रों के मुताबिक लंबे समय से एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे DMK और AIADMK के बीच भी बैकचैनल बातचीत चल रही है. हालांकि अभी किसी औपचारिक गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर विजय बहुमत साबित नहीं कर पाए तो तमिलनाडु में नए समीकरण बन सकते हैं. ऐसी स्थिति में राज्यपाल दूसरी पार्टियों को मौका दे सकते हैं या फिर राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति भी बन सकती है.
तमिलनाडु में बदली राजनीति की तस्वीर
2026 का चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक माना जा रहा है. कई दशकों बाद ऐसा हुआ है जब DMK और AIADMK के अलावा कोई नई पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है. विजय की लोकप्रियता, युवाओं में पकड़ और 'नई राजनीति' के वादे ने राज्य की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है.
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Uncovered with Manoj Gairola: देश में कितने Muslim MLAs? क्या सियासत से गायब हो रहा अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व?
Uncovered with Manoj Gairola: भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का सवाल हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है. हाल ही में संपन्न हुए असम विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है. असम में कांग्रेस के प्रदर्शन और वहां जीते हुए मुस्लिम विधायकों की संख्या को लेकर खुद मुस्लिम नेता मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपनी चिंता जाहिर की है. उन्होंने कांग्रेस पर 'मुस्लिम लीग' बनने का आरोप मढ़ दिया है. यह विवाद सिर्फ असम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे देश में मुस्लिम विधायकों की स्थिति और उनकी घटती संख्या पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
असम का चुनावी समीकरण और विवाद की जड़
असम में कांग्रेस ने इस बार 99 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें 20 मुस्लिम और 79 हिंदू प्रत्याशी शामिल थे. नतीजों ने सबको चौंका दिया क्योंकि कांग्रेस के 20 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 18 ने जीत दर्ज की, यानी उनका स्ट्राइक रेट 90 प्रतिशत रहा. इसके विपरीत, 79 हिंदू उम्मीदवारों में से केवल एक ही जीत सका. इसी आंकड़े को आधार बनाकर बदरुद्दीन अजमल कांग्रेस पर हमलावर हैं. हालांकि, कांग्रेस का तर्क है कि देशभर में उनके कुल विधायकों में मुस्लिम भागीदारी मात्र 12 प्रतिशत है, जो बहुत अधिक नहीं कही जा सकती.
देशभर में मुस्लिम विधायकों की वर्तमान स्थिति
अगर हम पूरे देश के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है. वर्तमान में भारत के विभिन्न राज्यों में कुल 4123 विधायक हैं. इनमें से मुस्लिम विधायकों की कुल संख्या 282 है, जो प्रतिशत के हिसाब से मात्र 6.8 प्रतिशत बैठती है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 14.5 प्रतिशत है. इस लिहाज से देखा जाए तो विधानसभाओं में उनकी भागीदारी आबादी के मुकाबले आधे से भी कम है.
2013 में प्रतिनिधित्व का सबसे ऊंचा शिखर
भारतीय इतिहास में मुस्लिम विधायकों की संख्या कभी भी उनकी आबादी के बराबर नहीं रही है, लेकिन साल 2013 में यह अपने उच्चतम स्तर पर थी. उस साल मई महीने तक देश में 4120 विधायकों में से 339 मुस्लिम विधायक थे, जो कुल संख्या का 8.22 प्रतिशत था. इसके बाद से इस ग्राफ में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. जानकारों का मानना है कि 2014 के बाद देश की राजनीति में आए बड़े बदलावों ने इस संख्या को प्रभावित किया है.
मोदी लहर और ध्रुवीकरण का प्रभाव
साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद भारतीय राजनीति का मिजाज बदला. बीजेपी यह संदेश देने में सफल रही कि विपक्षी दल केवल तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं. इसके जवाब में काउंटर पोलराइजेशन यानी जवाबी ध्रुवीकरण शुरू हुआ. इसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा. बीजेपी की चुनावी मजबूती के साथ ही विपक्षी दलों का आधार सिमटने लगा और मुस्लिम विधायकों की संख्या कम होती गई. वर्तमान में बीजेपी शासित 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पार्टी के पास केवल 2 मुस्लिम विधायक हैं.
उत्तर प्रदेश एक बड़ा उदाहरण
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब 19.5 प्रतिशत है. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में यूपी में 68 मुस्लिम विधायक जीते थे, जो कुल सीटों का 17 प्रतिशत था. यह वह समय था जब प्रतिनिधित्व आबादी के लगभग करीब पहुंच गया था. लेकिन 2017 में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद यह संख्या घटकर 24 रह गई. हालांकि 2022 के चुनावों में मामूली सुधार हुआ और 34 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे, जो 8.4 प्रतिशत है, लेकिन यह 2012 के मुकाबले अब भी काफी पीछे है.
क्या अल्पसंख्यकों की आवाज पहले के मुकाबले कम हुई?
असम से उठी यह चिंगारी अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व की नई बहस को जन्म दे चुकी है. क्या राजनीतिक पार्टियां केवल जिताऊ उम्मीदवार के चक्कर में एक विशेष वर्ग तक सिमट रही हैं या फिर मतदाताओं का झुकाव ही बदल गया है, यह भविष्य की राजनीति तय करेगी. फिलहाल आंकड़े बताते हैं कि देश की विधानसभाओं में अल्पसंख्यकों की आवाज पहले के मुकाबले कम हुई है.
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