Uncovered with Manoj Gairola: देश में कितने Muslim MLAs? क्या सियासत से गायब हो रहा अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व?
Uncovered with Manoj Gairola: भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का सवाल हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है. हाल ही में संपन्न हुए असम विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है. असम में कांग्रेस के प्रदर्शन और वहां जीते हुए मुस्लिम विधायकों की संख्या को लेकर खुद मुस्लिम नेता मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपनी चिंता जाहिर की है. उन्होंने कांग्रेस पर 'मुस्लिम लीग' बनने का आरोप मढ़ दिया है. यह विवाद सिर्फ असम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे देश में मुस्लिम विधायकों की स्थिति और उनकी घटती संख्या पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
असम का चुनावी समीकरण और विवाद की जड़
असम में कांग्रेस ने इस बार 99 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें 20 मुस्लिम और 79 हिंदू प्रत्याशी शामिल थे. नतीजों ने सबको चौंका दिया क्योंकि कांग्रेस के 20 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 18 ने जीत दर्ज की, यानी उनका स्ट्राइक रेट 90 प्रतिशत रहा. इसके विपरीत, 79 हिंदू उम्मीदवारों में से केवल एक ही जीत सका. इसी आंकड़े को आधार बनाकर बदरुद्दीन अजमल कांग्रेस पर हमलावर हैं. हालांकि, कांग्रेस का तर्क है कि देशभर में उनके कुल विधायकों में मुस्लिम भागीदारी मात्र 12 प्रतिशत है, जो बहुत अधिक नहीं कही जा सकती.
देशभर में मुस्लिम विधायकों की वर्तमान स्थिति
अगर हम पूरे देश के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है. वर्तमान में भारत के विभिन्न राज्यों में कुल 4123 विधायक हैं. इनमें से मुस्लिम विधायकों की कुल संख्या 282 है, जो प्रतिशत के हिसाब से मात्र 6.8 प्रतिशत बैठती है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 14.5 प्रतिशत है. इस लिहाज से देखा जाए तो विधानसभाओं में उनकी भागीदारी आबादी के मुकाबले आधे से भी कम है.
2013 में प्रतिनिधित्व का सबसे ऊंचा शिखर
भारतीय इतिहास में मुस्लिम विधायकों की संख्या कभी भी उनकी आबादी के बराबर नहीं रही है, लेकिन साल 2013 में यह अपने उच्चतम स्तर पर थी. उस साल मई महीने तक देश में 4120 विधायकों में से 339 मुस्लिम विधायक थे, जो कुल संख्या का 8.22 प्रतिशत था. इसके बाद से इस ग्राफ में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. जानकारों का मानना है कि 2014 के बाद देश की राजनीति में आए बड़े बदलावों ने इस संख्या को प्रभावित किया है.
मोदी लहर और ध्रुवीकरण का प्रभाव
साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद भारतीय राजनीति का मिजाज बदला. बीजेपी यह संदेश देने में सफल रही कि विपक्षी दल केवल तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं. इसके जवाब में काउंटर पोलराइजेशन यानी जवाबी ध्रुवीकरण शुरू हुआ. इसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा. बीजेपी की चुनावी मजबूती के साथ ही विपक्षी दलों का आधार सिमटने लगा और मुस्लिम विधायकों की संख्या कम होती गई. वर्तमान में बीजेपी शासित 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पार्टी के पास केवल 2 मुस्लिम विधायक हैं.
उत्तर प्रदेश एक बड़ा उदाहरण
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब 19.5 प्रतिशत है. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में यूपी में 68 मुस्लिम विधायक जीते थे, जो कुल सीटों का 17 प्रतिशत था. यह वह समय था जब प्रतिनिधित्व आबादी के लगभग करीब पहुंच गया था. लेकिन 2017 में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद यह संख्या घटकर 24 रह गई. हालांकि 2022 के चुनावों में मामूली सुधार हुआ और 34 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे, जो 8.4 प्रतिशत है, लेकिन यह 2012 के मुकाबले अब भी काफी पीछे है.
क्या अल्पसंख्यकों की आवाज पहले के मुकाबले कम हुई?
असम से उठी यह चिंगारी अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व की नई बहस को जन्म दे चुकी है. क्या राजनीतिक पार्टियां केवल जिताऊ उम्मीदवार के चक्कर में एक विशेष वर्ग तक सिमट रही हैं या फिर मतदाताओं का झुकाव ही बदल गया है, यह भविष्य की राजनीति तय करेगी. फिलहाल आंकड़े बताते हैं कि देश की विधानसभाओं में अल्पसंख्यकों की आवाज पहले के मुकाबले कम हुई है.
यह भी पढ़ें: Uncovered with Manoj Gairola: सुवेंदु अधिकारी या दिलीप घोष… Bengal में CM पद की रेस में सबसे आगे कौन?
अबू धाबी में विक्रम मिस्री ने रीम अल हाशिमी से की मुलाकात, भारत-यूएई साझेदारी पर हुई चर्चा
अबू धाबी, 7 मई (आईएएनएस)। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने गुरुवार को अबू धाबी में यूएई की अंतरराष्ट्रीय सहयोग मामलों की राज्य मंत्री रीम अल हाशिमी से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने भारत-यूएई के व्यापक रणनीतिक साझेदारी के पूरे दायरे की समीक्षा की और आगे सहयोग बढ़ाने के नए क्षेत्रों पर चर्चा की।
विदेश मंत्रालय (एमईए) ने बताया, “विदेश सचिव ने गुरुवार को अबू धाबी में यूएई की अंतरराष्ट्रीय सहयोग मामलों की राज्य मंत्री रीम अल हाशिमी से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने भारत-यूएई व्यापक रणनीतिक साझेदारी के पूरे दायरे की समीक्षा की और आगे सहयोग के संभावित क्षेत्रों की पहचान की। उन्होंने मौजूदा क्षेत्रीय स्थिति और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा की, जो दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं।”
इससे पहले इसी हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फुजैरा (यूएई) में हुए हमले की कड़ी निंदा की थी, जिसमें तीन भारतीय नागरिक घायल हो गए थे। उन्होंने कहा कि आम लोगों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है।
पीएम मोदी ने यूएई के साथ भारत की एकजुटता जताई और कहा कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति से शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “यूएई पर हुए हमलों की मैं कड़ी निंदा करता हूं, जिनमें तीन भारतीय नागरिक घायल हुए हैं। आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना बिल्कुल अस्वीकार्य है। भारत, यूएई के साथ मजबूती से खड़ा है और सभी मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति का समर्थन करता है। होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित और बिना रुकावट आवाजाही क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब सोमवार को फुजैरा में हुए हमलों में तीन भारतीय नागरिक घायल हुए थे। यूएई ने इन हमलों के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। भारतीय दूतावास ने भी कहा कि वह स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है, ताकि घायलों को सही इलाज और मदद मिल सके।
यूएई के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों की निंदा करते हुए इन्हें ईरान की ओर से बिना उकसावे के की गई नई आक्रामक कार्रवाई बताया। मंत्रालय ने कहा कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की वजह से नागरिक इलाकों और सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है और तीन भारतीय नागरिक घायल हुए हैं।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation




















