आज की मोटरसाइकलें केवल स्टाइल और स्पीड तक सीमित नहीं रह गई हैं। अब इनमें ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी शामिल हो रही है जो राइडिंग को पहले से ज्यादा सुरक्षित, आरामदायक और कंट्रोल्ड बनाती है। एबीएस, टीसीएस, क्विक शिफ्टर, स्लिपर क्लच और राइड-बाय-वायर जैसे फीचर्स अब धीरे-धीरे स्टैंडर्ड बनते जा रहे हैं। ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये तकनीकें न सिर्फ दुर्घटनाओं को कम करती हैं, बल्कि लंबी दूरी की यात्रा के दौरान राइडर की थकान भी कम करती हैं।
नीचे जानिए बाइक के ऐसे 5 मॉडर्न फीचर्स, जो आपकी राइडिंग को पूरी तरह बदल सकते हैं।
1. एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS)
एबीएस अब 150cc से ऊपर की अधिकांश मोटरसाइकलों में जरूरी फीचर बन चुका है। जब राइडर अचानक ब्रेक लगाता है तो सामान्य स्थिति में पहिए लॉक हो सकते हैं, जिससे बाइक फिसलने का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन ABS इस स्थिति में पहियों को लॉक होने से रोकता है और बाइक का संतुलन बनाए रखता है।
गीली, रेतीली या खराब सड़कों पर यह फीचर बेहद उपयोगी साबित होता है। तेज रफ्तार में अचानक ब्रेक लगाने पर भी राइडर बाइक को आसानी से नियंत्रित कर सकता है। यही कारण है कि सुरक्षा के लिहाज से इसे सबसे जरूरी तकनीक माना जाता है।
2. ट्रैक्शन कंट्रोल सिस्टम (TCS)
ट्रैक्शन कंट्रोल सिस्टम का मुख्य काम टायर और सड़क के बीच पकड़ बनाए रखना है। ज्यादा पावर वाली बाइक में मोड़ लेते समय या फिसलन भरी सड़क पर पिछला पहिया स्लिप कर सकता है।
ऐसी स्थिति में TCS तुरंत इंजन की पावर को नियंत्रित कर देता है ताकि टायर सड़क पर पकड़ बनाए रखे। यह फीचर खासकर बारिश, कच्ची सड़क या तेज एक्सीलरेशन के समय बहुत काम आता है। इससे बाइक फिसलने का खतरा कम होता है और राइडिंग ज्यादा सुरक्षित बनती है।
3. क्विक शिफ्टर
क्विक शिफ्टर प्रीमियम और स्पोर्ट्स बाइक्स में मिलने वाला आधुनिक फीचर है। इसकी मदद से राइडर बिना क्लच दबाए गियर बदल सकता है। यह तकनीक सेंसर आधारित होती है और इंजन की पावर को क्षणभर के लिए कम कर देती है, जिससे गियर स्मूद तरीके से बदल जाता है।
इसका फायदा यह है कि ट्रैफिक में बार-बार क्लच दबाने की जरूरत नहीं पड़ती और लंबी राइड में थकान कम होती है। साथ ही, स्पोर्ट्स राइडिंग के दौरान यह तेजी से गियर बदलने में मदद करता है।
4. स्लिपर क्लच
स्लिपर क्लच एक महत्वपूर्ण फीचर है जो अचानक गियर डाउन करने पर बाइक को स्थिर बनाए रखता है। जब राइडर तेज गति में अचानक कम गियर में आता है तो इंजन ब्रेकिंग ज्यादा हो जाती है, जिससे पिछला पहिया हिलने लगता है या लॉक हो सकता है।
स्लिपर क्लच इस झटके को नियंत्रित कर देता है और बाइक का संतुलन बनाए रखता है। यह फीचर खासकर पहाड़ी रास्तों, घुमावदार सड़कों और स्पोर्ट्स राइडिंग के दौरान बहुत उपयोगी होता है। इससे राइडिंग ज्यादा स्मूद और सुरक्षित बनती है।
5. राइड-बाय-वायर तकनीक
राइड-बाय-वायर तकनीक पारंपरिक थ्रोटल केबल की जगह इलेक्ट्रॉनिक सेंसर का उपयोग करती है। जब राइडर एक्सीलरेटर घुमाता है तो सेंसर इंजन कंट्रोल यूनिट को सिग्नल भेजते हैं और उसी हिसाब से पावर मिलती है।
इसका फायदा यह है कि बाइक का एक्सीलरेशन ज्यादा सटीक होता है और राइडिंग अनुभव बेहतर बनता है। साथ ही यह तकनीक माइलेज सुधारने और इंजन परफॉर्मेंस को ऑप्टिमाइज़ करने में मदद करती है। कई बाइक्स में इसके साथ अलग-अलग राइडिंग मोड भी दिए जाते हैं।
क्यों जरूरी हैं ये आधुनिक फीचर्स?
आज के ट्रैफिक, खराब सड़कें और बढ़ती स्पीड को देखते हुए ये फीचर्स अब केवल लग्जरी नहीं रहे। ये राइडर की सुरक्षा को बढ़ाने के साथ-साथ बाइक को ज्यादा कंट्रोल्ड बनाते हैं।
- दुर्घटना की संभावना कम होती है
- लंबी यात्रा में थकान घटती है
- खराब मौसम में बेहतर नियंत्रण मिलता है
- गियर बदलना आसान होता है
- राइडिंग अनुभव स्मूद बनता है
इसलिए अगर आप नई बाइक खरीदने की सोच रहे हैं तो इन फीचर्स को जरूर ध्यान में रखें। ये तकनीकें आपकी राइड को सुरक्षित, स्मार्ट और आरामदायक बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
- डॉ. अनिमेष शर्मा
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आगामी मानसून को लेकर के पहला पूर्वानुमान जारी करने के साथ ही मौसम विभाग ने आने वाले मानसूनी सत्र में सामान्य से कम बरसात के संकेत दे दिए हैं। हांलाकि अभी मानसून के पूर्वानुमान और भी जारी किये जाएंगे पर यह आरंभिक सूचना आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार सामान्य से 8 फीसदी तक कम बरसात की संभावना जताई गई है। देश के कई हिस्सों में कम बरसात होने के संकेत है तो कुछ हिस्सों में सामान्य बरसात भी हो सकती है। माना जा रहा है कि अल नीनो इफेक्ट के चलते मानसून कमजोर रहेगा। यह भी सही है कि हमारे मौसम मंत्रालय द्वारा जारी पूर्वानुमान अब काफी हद तक आसपास रहने लगे हैं। यहां तक कि दो से तीन घंटों में बरसात होने या आंधी तूफान या ओलावृष्टि तक के पूर्वानुमान खरे उतरने लगे हैं। ऐसे में मौसम विभाग के पूर्वानुमानों को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र व राज्यों की सरकारों को अभी से पूर्व तैयारियां करने में जुट जाना चाहिए। खासतौर से आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से भावी रणनीति तय करनी होगी। देश में मानसून सीजन में 87 सेमी बरसात होती है जिसके अनुमानों के अनुसार 81 सेमी तक रहने की आशंका है। पूर्वानुमानों को माने तो 2018 में 91 प्रतिशत बरसात हुई थी उसके बाद के सालों में मानसून लगभग अच्छा ही रहा है। पिछले आठ सालों में मानसून की स्थिति देखें तो 2023 में मानसून अवश्य कमजोर रहा है अन्यथा देष में मानसूनी वर्षा 100 प्रतिशत के आसापास व इससे अधिक ही रही है।
हमारे देश में मानसूनी बरसात पर निर्भरता अधिक है। जहां खेती में मानसूनी बरसात की निर्भरता बहुत अधिक है तो दूसरी और पेयजल को लेकर भी मानसून पर निर्भरता अधिक है। जलाशयों में पानी के भण्डारण और भूजल स्तर भी बरसाती पानी पर ही निर्भर है। हमारी खेती मुख्यतः मानसून पर निर्भर हैं। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कमी के कारण मानसून पर खेती 55 से 64 प्रतिशत निर्भर है। पीने के पानी की समस्या भी कमजोर मानसून से प्रभावित होती है। हमारे यहां मानसून का समय जून से सितंबर तक का रहता है। अब सवाल उठता है कि पिछले सालों में मानसून सामान्य से अच्छा रहने के बावजूद कमजोर मानसून की स्थिति से निपटने में हमारी तैयारी कोई अच्छी नहीं मानी जा सकती। अत्यधिक भूजल दोहन और जल संचयन की दीर्घकालीक नीति के अभाव में ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हो पाये हैं। ऐसा नहीं है कि नीति नहीं बनती हो या ऐसा भी नहीं है कि जल संचयन के प्रयास नहीं होते हो पर जो परिणाम देखने में आए हैं वह कोई आशाजनक नहीं माने जा सकते। पानी के विवेकपूर्ण उपयोग की बात करना तो हमारे यहां बेमानी ही रही है। प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण व संधारण में भी हम कुछ अधिक नहीं कर पाये हैं। इसके अलावा हमारे यहां दुर्भाग्यजनक बात यह है कि तात्कालिक प्रयास होते हैं। शहरीकरण की आड़ में प्राकृतिक जल स्रोत या तो नष्ट हो गए हैं या उनमें बरसात के पानी जाने के रास्ते अवरुद्ध या बंद हो गए हैं। नदी नालों के रास्ते या तो बंद हो गए हैं या अवरुद्ध हो गए हैं। बरसात के पानी के जलाशयों में रास्तों में अनधिकृत कब्जें, निर्माण और रिसोर्ट बना दिए है। एक समय ऐसा भी आया कि जब विशेषज्ञों ने बरसात के पानी जाने के रास्तों में जगह जगह एनिकट बनाने की सलाह दे ड़ाली और छोटे छोटे एनिकट बनने से नदियों-जलाशयों में पानी की आवक प्रभावित हो गई। इससे तात्कालीक यानी कि एनिकटों में पहले पानी एकत्र तो हुआ पर बाद में इनका रख रखाव नहीं होने से दोहरा नुकसान हुआ। इसी तरह से वर्षा जल संचयन के लिए वाटर हार्वेंस्टिंग सिस्टम के लिए सरकार ने अरबों रुपये खर्च किये पर उनके निर्माण के आंकड़ें पूरे करने के चक्कर में हम भूल गए कि बरसात के पानी इनमें कितना व कैसे जा पाएगा। फिर बरसात से पहले इनकी देखरेख पर भी ध्यान नहीं देने से जो परिणाम मिलने चाहिए थे वे नहीं मिल सके हैं। एक और हमारे दैनिक उपभोग में भी पानी का उपयोग अधिक बढ़ा है आज पेयजल से कई गुणा अधिक पानी टायलेट और कुलरों में उपयोग होने लगा है। समय रहते टायलेट में कम पानी के उपयोग की कोई राह निकाली जाती तो हालात में सुधार ही होता। इसी तरह से देशभर में वाटर ट्र्टिमेंट सिस्टम लगाने का अभियान चला पर इनके परिणाम भी ज्यादा अच्छे नहीं देखे जा रहे है। रिसाइकिल पानी को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति तय हो तो कुछ हद तक समाधान हो सकता है। खैर यह तो हालात की तस्वीर है।
सौ टके का सवाल यह है कि कमजोर मानसून के हालात से निपटने की कार्ययोजना हमें अभी से बनानी होगी। मौसम विभाग ने अप्रेल में यह चेतावनी दे दी है। मानसून जून में आएगा। ऐसे में अभी मई का महीना हमारे पास है। अभी से सरकार को कमर कसनी होगी। कमजोर मानसून के हालात में हमें कम पानी से अधिक बेहतर हालात बनाने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए जहां पानी की एक एक बूंद को सहेजने की रणनीति तैयार करनी होगी वहीं कृषि मंत्रालय को खरीफ के लिए इस तरह की रणनीति बनानी होगी जिसमें कम पानी के उपयोग से बेहतर फसल तैयार होने वाली फसलों और किस्मों के लिए किसानों को प्रेरित हो सके। खेती किसानी भी प्रभावित ना हो और पैदावार भी अच्छी हो इसकी रणनीति बनानी होगी। अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती ना करने के लिए किसानों को उत्साहित करना होगा। इसी तरह से जलाशयों, बांधों में उपलब्ध पानी का प्रबंधन योजनाबद्ध तरीके से करना होगा। अभी से आमजन को पानी के अपव्यय को रोकने के लिए प्रेरित करना होगा। कहने का अर्थ है कि जब आने वाले हालात की तस्वीर हमारे सामने कमोबेस आ चुकी है तो फिर समय रहते इस तरह की रणनीति बनानी होगी ताकि कमजोर मानसून में भी हमारी जल प्रबंधन क्षमता बेहतर रह सके। आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से संबंधित मंत्रालयों खासतौर से कृषि, जल आपूर्ति करने वाले विभागों, बांधों एवं जलाशयों का प्रबंधन करने वाले विभागों, जल संसाधन विभागों से समन्वय बनाकर रणनीति तैयार करनी होगी। इसके साथ ही आमजन को भी पानी के उपयोग को लेकर अधिक सजग और जिम्मेदार नागरिक के रुप में भूमिका निभानी होगी।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
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