मानव सभ्यता के इतिहास में तकनीकी क्रांतियों ने सदैव हमारे अस्तित्व की दिशा को बदला है, किंतु वर्तमान में कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जो तीव्र विस्तार हम देख रहे हैं, वह पूर्ववर्ती सभी आविष्कारों से मौलिक रूप से भिन्न है। यह केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक समानांतर बुद्धिमत्ता है जो हमारे सोचने, निर्णय लेने और सामाजिक ताने-बाने को समझने के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दे रही है। आज जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि क्या हम इस तकनीक से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं, तो उत्तर केवल तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि हमारी नैतिक, कानूनी और सामाजिक तैयारियों में छिपा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जेनेरेटिव एआई के उदय ने सूचनाओं की सत्यता पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। डीपफेक तकनीक और परिष्कृत एल्गोरिदम के माध्यम से जिस प्रकार से भ्रामक सूचनाएं या मिसइन्फॉर्मेशन फैलाई जा रही हैं, उसने न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है, बल्कि व्यक्तिगत गरिमा को भी जोखिम में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 2 वर्षों में एआई-जनित भ्रामक सामग्रियों में 900 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारी कानूनी प्रणालियां और डिजिटल साक्षरता के मानक इस गति का मुकाबला करने में फिलहाल अक्षम सिद्ध हो रहे हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो कृत्रिम मेधा का प्रभाव रोजगार के बाजारों पर अत्यंत गहरा और बहुआयामी होने वाला है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की भविष्य की नौकरियों से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, एआई और ऑटोमेशन के कारण अगले दशक में करोड़ों नौकरियों के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। जहाँ एक ओर यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने और नए प्रकार के व्यवसायों को जन्म देने की क्षमता रखती है, वहीं दूसरी ओर यह निम्न और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों के लिए एक बड़ा विस्थापन संकट भी पैदा कर रही है। क्या हमारी शिक्षा प्रणालियां और कौशल विकास कार्यक्रम इस गति से परिवर्तित हो रहे हैं कि वे भविष्य की कार्यशक्ति को इस नई व्यवस्था के अनुकूल बना सकें? यह प्रश्न अनुत्तरित है क्योंकि विकासशील देशों में डिजिटल विभाजन आज भी एक कठोर वास्तविकता है। जब तक हम एक समावेशी तकनीकी ढांचे का निर्माण नहीं करते, तब तक कृत्रिम मेधा केवल वैश्विक असमानता को बढ़ाने का एक माध्यम बनकर रह जाएगी। इसके अतिरिक्त, एआई मॉडल्स के भीतर मौजूद 'एल्गोरिथमिक बायस' या पक्षपात एक और बड़ा संकट है, जो ऐतिहासिक डेटा के आधार पर लिंग, जाति और राष्ट्रीयता के प्रति पूर्वाग्रहों को अनजाने में सुदृढ़ कर रहा है।
तकनीकी सुरक्षा और स्वायत्त हथियारों का मुद्दा कृत्रिम मेधा के सबसे भयावह संकटों में से एक है। 'लीथल ऑटोनॉमस वेपन्स सिस्टम्स' या स्वायत्त घातक हथियार प्रणालियों का विकास वैश्विक शांति के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है। जब युद्ध के मैदान में जीवन और मृत्यु का निर्णय एक एल्गोरिदम द्वारा लिया जाने लगेगा, तो मानवीय उत्तरदायित्व और युद्ध के अंतरराष्ट्रीय कानूनों का क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस पर नियंत्रण की अपील की है, लेकिन महाशक्तियों के बीच एआई की प्रतिस्पर्धा ने एक नई डिजिटल शीत युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह तकनीकी रेस हमें एक ऐसे बिंदु पर ले जा सकती है जहाँ नियंत्रण की लगाम मानव के हाथ से निकलकर मशीनों के पास चली जाए। सुरक्षा का अर्थ केवल भौतिक हथियारों से नहीं है, बल्कि डेटा की गोपनीयता और एल्गोरिदम के माध्यम से किए जाने वाले 'बिहेवियरल मैनिपुलेशन' या व्यवहारिक हेरफेर से भी है। बड़ी तकनीकी कंपनियाँ जिस प्रकार डेटा का एकत्रीकरण कर रही हैं, वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को एक संकीर्ण घेरे में बंद कर रहा है।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी कृत्रिम मेधा की तैयारी पर प्रश्न उठना लाजिमी है। विशाल एआई मॉडल्स को प्रशिक्षित करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा और जल संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न कर सकता है। एक शोध के अनुसार, एक बड़े लैंग्वेज मॉडल को प्रशिक्षित करने में उतनी कार्बन फुटप्रिंट पैदा होती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में उत्सर्जित करती हैं। जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझती दुनिया के लिए यह एक अतिरिक्त भार है। इसलिए, जब हम एआई के संकटों की बात करते हैं, तो हमें 'सस्टेनेबल एआई' या संवहनीय कृत्रिम मेधा की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। क्या हमारे पास ऐसी नीतियां हैं जो इन कंपनियों को पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी बना सकें? वर्तमान में अधिकांश विनियमन केवल लाभ और तकनीकी श्रेष्ठता पर केंद्रित हैं, जबकि पारिस्थितिक संतुलन को हाशिए पर धकेल दिया गया है।
निष्कर्षतः कृत्रिम मेधा के संकटों के लिए हमारी तैयारी अभी भी प्रारंभिक और खंडित अवस्था में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'यूरोपीय संघ एआई अधिनियम' जैसे प्रयास एक सकारात्मक दिशा दिखाते हैं, लेकिन यह वैश्विक स्तर पर एक समान मानकों के बिना अपर्याप्त हैं। हमें एक ऐसे वैश्विक गठबंधन की आवश्यकता है जो न केवल तकनीक के विकास की निगरानी करे, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिकता और न्याय को इसके केंद्र में रखे। तैयारी का अर्थ केवल उन्नत फायरवॉल बनाना नहीं है, बल्कि एक जागरूक समाज का निर्माण करना है जो सत्य और मिथ्या के बीच अंतर कर सके। कृत्रिम मेधा एक शक्तिशाली लहर की तरह है, जिसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यदि हम इसके लिए सही बांध और नहरें तैयार नहीं करते, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था के तटबंधों को नष्ट कर सकती है। हमें तकनीकी प्रगति के साथ-साथ अपनी नैतिक चेतना को भी उन्नत करना होगा, क्योंकि अंततः तकनीक का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, न कि उसका विनाश। समय कम है और चुनौतियां अपार हैं, अतः भविष्य की तैयारी के लिए हमें आज ही अपनी प्राथमिकताओं को पुन: परिभाषित करना होगा।
- डॉ. शैलेश शुक्ला
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, नईदुनिया
आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश
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गर्मियों में बुरा हाल सिर्फ हम सबका ही नहीं, बल्कि गाड़ियों पर इसका असर देखने को मिलता है। जब पारा 40-50 डिग्री तक पहुंच जाता है, तो कार भी काफी प्रभाव पड़ता है। लंबे ट्रैफिक जाम, तपती सड़कें और लगातार चलते एसी की वजह से गाड़ी के हर हिस्से पर डबल दबाव देखने को मिलता है।
गर्मी में अक्सर में इंजन का ओवरहीट होना, टायर फेलियर और बैटरी से जुड़ी समस्याएं काफी देखने को मिलती है। यदि इंजन खराब हुआ तो आपका लाखों का खर्चा हो सकता है। अगर आप इन सभी समस्याओं से बचना चाहते हैं, तो ड्राइविंग की आदतों में सुधार करने से बड़े-बड़े हादसे टाले जा सकते हैं। यदि आप गर्मी में रोजाना अपनी कार का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आपको काफी सावधानी बरतने की जरुरत है।
कार का कूलेंट लेवल को चेक करते रहें
भयंकर गर्मी में कार का इंजन ठंडा रहना बेहद जरुरी है। TOI की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि, यदि कूलेंट कम है या बहुत पुराना हो गया है, तो वह अपना काम ठीक से नहीं कर सकता है। इससे इंजन ओवरहीट हो सकता है। इसलिए समय-समय पर कूलेंट का लेवल जरुर चेक करें। इतना ही नहीं, कार के इंजन ऑयल और ब्रेक ऑयल को भी चेक करते रहे हैं। यदि इंजन ऑयल पुराना हो गया या गाढ़ा हो गया, तो वह इंजन को ठीक से लुब्रिकेंट नहीं कर पाएगा, जिससे परफॉर्मेंस पर काफी असर दिखेगा।
AC की सर्विस जरुर कराएं
समर सीजन में सबसे जरुरी एसी है। ऐसे AC खराब हो जाए तो गर्मी के दिनों में कार में सफर करना काफी मुश्किल हो जाता है। इसलिए सर्विस कराना बेहद ही जरुरी है। यदि कूलिंग कम लग रही है, तो एसी की गैस और फिल्टर चेक कराएं। साफ फिल्टर हवा ठंडी देगा और माइलेज भी बढ़ाएगा।
टायरों की हवा पर ध्यान दें
आग उगलने वाली गर्मी में तपती सड़कों के कारण टायर के अंदर की हवा का प्रेशर अपने आप बढ़ने लगता है। इसलिए गर्मियों में टायरों में बहुत ही ज्यादा हवा न भराएं। वरना ज्यादा हवा के कारण टायर फट सकता है। हर 10 से 15 दिनों में टायरों का प्रेशर चेक जरुर कराएं।
इंजन गर्म होने की चेतावनी को नजरअंदाज न करें
बार-बार डैशबोर्ड पर इंजन गर्म होने वाली लाइट जल रही है, तो इसको जरा-सा भी नजरअंदाज न करें। ऐसे में कार को तुरंत छांव में रोक दें और इंजन को ठंडा होने दें। इस स्थिति में बिल्कुल भी जबरदस्ती गाड़ी न चलाएं, इंजन पूरी तरह से खराब हो सकता है और आपको लाखों का खर्चा हो सकता है। इसके साथ ही कभी भी धूप में गाड़ी का पार्क न करें। धूप में कार खड़ी होने से गाड़ी अंदर से बहुत तेज गर्म हो जाती है, इसलिए हमेशा कार को किसी पेड़ के नीचे या कवर्ड पार्किंग में खड़ा करें।
बैटरी का ध्यान रखें
अधिक गर्मी बैटरी के अंदर के लिक्विड को सुखा देती है। इसलिए बैटरी जल्दी खराब हो सकती है। ऐसे में आपकी गाड़ी स्टार्ट होने में समय ले रही है या लाइटें डिम है, तो समझें कि बैटरी खराब होने वाली है। भयंकर गर्मी में बैटरी फेल होना आपको मुसीबत में डाल देगी।
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