बंगाल चुनाव परिणाम: बिष्णुपुर (एससी) से टीएमसी के दिलीप मंडल जीते, भाजपा उम्मीदवार अभिजीत सरदार हारे
कोलकाता, 4 मई (आईएएनएस)। विष्णुपुर (एससी) विधानसभा सीट से टीएमसी के दिलीप मंडल ने जीत दर्ज की है। उन्होंने 36925 वोटों से भाजपा के अभिजीत सरदार को मात दी। उन्हें कुल 132647 वोट प्राप्त हुए।
अपना ही किला नहीं बचा पाईं ममता बनर्जी, जानें कैसे 'स्ट्रीट फाइटर' से सियासत के पतन तक पहुंची 'दीदी'
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई 2026 का दिन हमेशा याद रखा जाएगा. क्योंकि इस दिन न सिर्फ बंगाल में भगवा लहराया बल्कि ममता बनर्जी अपना ही किला यानी अपनी ही विधानसभा सीट को बचाने में नाकाम रहीं. जी हां उन्हें बीजेपी के प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी ने 15000 से ज्यादा वोटों से मात दे डाली. 'राजपथ की राजनीति' हमेशा निर्णायक रही है सड़कों पर संघर्ष, आंदोलनों और जनभावनाओं के सहारे सत्ता बदलती रही. इसी परंपरा से उभरकर ममता ने 2011 में वाम मोर्चे को हटाकर सत्ता हासिल की थी. लेकिन 2026 के चुनावी रुझानों ने संकेत दिया कि वही स्ट्रीट फाइटर अब अपने ही किले को बचाने में संघर्ष करती नजर आईं.
आक्रामक प्रचार, लेकिन नतीजों में कमी
ममता बनर्जी का चुनावी अंदाज हमेशा की तरह तेज और आक्रामक रहा. 'मैं हर सीट की उम्मीदवार हूं' जैसे नारों के साथ उन्होंने करीब 90 रैलियां और 22 रोड शो किए. उनकी ऊर्जा और जमीनी पकड़ अब भी मजबूत दिखी, लेकिन यह बढ़त वोटों में तब्दील नहीं हो सकी. इसके उलट, बीजेपी ने बूथ स्तर पर अपनी रणनीति से बढ़त बना ली.
SIR विवाद और वोटर लिस्ट पर सवाल
इस चुनाव में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) बड़ा मुद्दा बना. लाखों मतदाताओं के नाम हटने के बाद टीएमसी ने आरोप लगाया कि यह उनके समर्थकों को निशाना बनाने की साजिश है. हालांकि चुनावी प्रक्रिया पर उठे इन सवालों के बीच भी जमीनी हकीकत यही रही कि विपक्ष ने इसे अपने पक्ष में मुद्दा बना लिया.
आंदोलन से सत्ता तक का सफर
ममता बनर्जी का राजनीतिक उभार संघर्षों से भरा रहा है. सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने उन्हें जनता की आवाज बना दिया. इन आंदोलनों ने वाम शासन के खिलाफ माहौल तैयार किया और 2011 में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन हुआ. उस समय ममता “परिवर्तन” का चेहरा थीं एक ऐसी नेता जो सड़कों पर उतरकर लड़ाई लड़ती थी.
सत्ता में रहते हुए बढ़ीं चुनौतियां
सत्ता में आने के बाद सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सवाल बढ़ते गए. शिक्षक भर्ती घोटाला, सारदा चिटफंड स्कैम और नरौदा स्टिंग ऑपरेशन जैसे मामलों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया.
इन मुद्दों ने एंटी-इनकंबेंसी को जन्म दिया, जो धीरे-धीरे चुनावी माहौल में बदल गया.
ध्रुवीकरण और बदलते समीकरण
2012 के बाद बीजेपी ने बंगाल में तेजी से विस्तार किया. धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण बढ़ा, जिससे पारंपरिक वोटबैंक में दरार आई. वहीं, ममता सरकार द्वारा लिए गए कुछ फैसलों को विपक्ष ने “तुष्टिकरण” के रूप में पेश किया, जिसने राजनीतिक बहस को और तीखा बना दिया.
रोजगार और प्रवासन का असर
विशेषज्ञों के अनुसार, रोजगार की कमी और उद्योगों का अभाव भी टीएमसी के खिलाफ गया. बड़ी संख्या में युवा राज्य से बाहर काम की तलाश में गए. इस मुद्दे को विपक्ष ने प्रभावी तरीके से उठाया, जिससे मतदाताओं का रुझान बदला.
महिला वोटबैंक में सेंध
ममता बनर्जी की सबसे मजबूत ताकत मानी जाने वाली महिला वोटर भी इस बार पूरी तरह साथ नहीं दिखीं. ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के बावजूद विपक्ष के नए वादों और सुरक्षा के मुद्दों ने उनके वोटबैंक को प्रभावित किया.
स्ट्रीट फाइटर से सत्ता संघर्ष तक
ममता बनर्जी का सफर एक संघर्षशील नेता से मुख्यमंत्री तक का रहा है, लेकिन 2026 के चुनाव ने दिखाया कि राजनीति में कोई भी किला स्थायी नहीं होता. जिस एंटी-इनकंबेंसी की लहर पर वह खुद सत्ता में आई थीं, वही अब उनके खिलाफ खड़ी दिखी. यह चुनाव सिर्फ हार-जीत नहीं, बल्कि एक दौर के अंत और नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत का संकेत भी है.
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