भारत ने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी गूंज सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक नहीं बल्कि पूरी दुनिया के समुद्री व्यापार में सुनाई देने वाली है। ₹51,000 करोड़ का मेगा प्लान, 62 नए जहाज, विदेशी शिपिंग कंपनियों पर निर्भरता कम करने का मिशन और सबसे बड़ी बात भारत अब साफ कह चुका है कि हमारे व्यापार, हमारी ऊर्जा सुरक्षा और हमारी सप्लाई चेन किसी दूसरे देश के भरोसे नहीं चलेगी। दोस्तों, यह सिर्फ जहाज खरीदने का मसला नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, इकोनॉमिक सिक्योरिटी और ग्लोबल पावर बनने की तैयारी है। तो आज की इस रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे भारत ने अचानक इतना बड़ा फैसला क्यों लिया? कौन-कौन से जहाज खरीदे जाएंगे? किन-किन कंपनियों को फायदा होगा? क्यों यह कदम चीन, यूरोप और दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियों के लिए चेतावनी मानी जा रही है। दरअसल, भारत सरकार ने ₹51,383 करोड़ का मेगा टेंडर तैयार किया। जिसके तहत कुल 62 शिपिंग वेसल्स खरीदी या बनाई जाएंगी। इन जहाजों में शामिल होंगे क्रूड ऑयल टैंकर, एलपीजी कैरियर, एलएनजी कैरियर, कंटेनरशिप, बल्क कारगो वेसल्स, ग्रीन टक बोट्स और ड्रेजर्स।
भारत अब सिर्फ एक सेक्टर पर नहीं बल्कि पूरे समुद्री इकोसिस्टम पर काम कर रहा है। सबसे बड़ी बात दोस्तों कि 34 जहाजों का टेंडर पहले ही जारी किया जा चुका है। बाकी जहाजों के लिए जल्द प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इस पूरी योजना से भारत की समुद्री क्षमता में लगभग 2.85 मिलियन ग्रॉस टनेज का इजाफा हो जाएगा जो अपने आप में बहुत बड़ा आंकड़ा है। लेकिन सवाल तो उठेगा ही और सवाल है भारत को अचानक यह फैसला क्यों लेना पड़ा? तो इसका सीधा जवाब है दुनिया का बदलता माहौल। पिछले कुछ समय से वेस्ट एशिया में तनाव बढ़ा। रेड सी, हॉर्मज और कई समुद्री रास्तों पर खतरे बढ़े। जहाजों का बीमा महंगा हो गया। फ्रेट कॉस्ट बढ़ गई और दुनिया को समझ में आया कि अगर समुद्री रास्ते रुक जाए तो अर्थव्यवस्था डगमगा जाएगी। भारत ने इसी खतरे को समय रहते पहचान लिया। आज भारत की स्थिति यह है कि भारत का 90% से ज्यादा व्यापार समुद्री रास्ते से होता है। लेकिन जहाजों के मामले में भारत अभी भी बड़ी मात्रा में विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। जहाज किराए पर लिए जाते हैं ग्रीस से, चीन से, सिंगापुर से, जापान से, दक्षिण कोरिया से यानी भारत का व्यापार चलता है। लेकिन जहाज किसी और के और यही निर्भरता अब भारत खत्म करना चाहता है।
यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है। सोचिए अगर कल युद्ध और भड़क जाए ईरान और अमेरिका के बीच या फिर किसी देश ने जहाज देना बंद कर दिया या किराया दोगुना कर दिया तो भारत के तेल, गैस, कोयला, उर्वरक, कंटेनर, सप्लाई सब कुछ प्रभावित हो जाएगी। इसलिए भारत ने कहा अब अपने जहाज होंगे, अपनी शर्तें होंगी और अपना कंट्रोल होगा। अब बात करते हैं कौन-कौन कंपनियां इसमें शामिल होगी। सबसे बड़ा रोल रहेगा शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का भारत की सरकारी शिपिंग दिग्गज कंपनी।
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अमेरिका की गोद में बैठे पाकिस्तान को चीन ने एक ऐसा झटका दिया है कि पूरा इस्लामाबाद इस वक्त हिल गया है। अमेरिका को बॉस बनाने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान की अब चीन ने एक ऐसे तरीके से हेकड़ी निकाली है कि उसकी कमर टूटती हुई नजर आ रही है। कहावत आपने सुनी होगी कि गरीबी में आटा गीला और इस वक्त यह कहावत पाकिस्तान पर एकदम फिट बैठती नजर आ रही है। पहले से ही कंगाली ऊपर से कर्ज का पहाड़ और अब सबसे बड़ा झटका। खुद चीन की कंपनी ने पाकिस्तान में काम बंद कर दिया है। दरअसल बता दें कि चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी कि सीपीईसी जिसे पाकिस्तान अपनी लाइफ लाइन बताता रहा उसी सीपीईसी के सबसे अहम प्रोजेक्ट गदर पोर्ट से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई।
ग्वादर फ्री जोन में काम कर रही चीनी कंपनी अपनी फैक्ट्री बंद कर चुकी है। सिर्फ बंद ही नहीं बल्कि सभी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता यहां से दिखा दिया गया। कारण क्या बताया गया? कंपनी ने यह साफ कहा है कि खराब कारोबारी यहां पर माहौल है। ऑपरेशनल दिक्कतें हैं। शिपमेंट अटक गई है। एक्सपोर्ट पूरी तरीके से रुक गया है और यहां पर लगातार घाटा हो रहा है। यानी जिस पाकिस्तान को चीन अरबों डॉलर देकर खड़ा करना चाहता था वही पाकिस्तान अपने ही सिस्टम से विदेशी निवेशकों को भगाने में लगा हुआ है। अब जरा सीपीईसी का पूरा खेल समझिए। साल 2015 में करीब 60 अरब डॉलर के इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई। मकसद था चीन को ग्वादर के जरिए अरब सागर तक सीधी पहुंच देना। लेकिन आज हालात क्या है उसे देखिए। प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है। कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। सुरक्षा खतरे में है। जहां चीनी नागरिक भी सुरक्षित नहीं है और अब कंपनियों को पीछे हटना पड़ रहा है।
भारत को इससे क्या फायदा?
सबसे बड़ा फायदा स्ट्रेटेजिक राहत। ग्वादर पोर्ट को चीन गेम चेंजर बताता था जो भारत के लिए समुद्री घेराबंदी का हिस्सा था। लेकिन अगर वहीं प्रोजेक्ट अटकने लगे तो भारत पर दबाव अपने आप कम हो जाता है। दूसरा फायदा इंडिया की ग्लोबल इमेज मजबूत। जब विदेशी कंपनियां पाकिस्तान से निकलतीहैं तो वह स्टेबल और सुरक्षित मार्केट ढूंढती है और यहां भारत एक भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आता है। मजबूत कानून, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बहुत बड़ा बाजार और सुरक्षा बहुत ज्यादा। तीसरा फायदा ट्रेड और पोर्ट्स में भड़कत। भारत पहले ही चबहार पोर्ट जहां पर ईरान काम कर रहा है और जो अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक पहुंच का एक बड़ा रास्ता है अगर ग्वादर कमजोर पड़ता है तो चबाहार की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। चौथा फायदा चीन की रणनीति को झटका। चीन का स्ट्रिंग ऑफ पल्स प्लांट जिसमें हिंद महासागर के चारों तरफ अपने पोर्ट्स बनाना शामिल है। उसमें ग्वादर एक अहम कड़ी था और अगर वही कड़ी कमजोर हो जाए तो पूरा नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। धराशाई हो सकता है। पांचवा फायदा निवेश का डायवर्जन।
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