400 पुलिसकर्मियों के साए में कार्रवाई, भोपाल में 70 साल पुरानी बस्ती पर चला बुलडोजर
भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में शनिवार की सुबह किसी आम दिन जैसी नहीं थी। सूरज निकलने से पहले ही पूरा इलाका पुलिस छावनी में बदल चुका था। पॉलिटेक्निक चौराहे के पास स्थित मानस भवन के पीछे की 70 साल पुरानी आदिवासी बस्ती, जहां पीढ़ियों से लोग रहते आए थे, अचानक प्रशासन की कार्रवाई के केंद्र में आ गई।
भोपाल बुलडोजर एक्शन की शुरुआत सुबह करीब 6 बजे हुई, लेकिन इसकी तैयारी रात से ही शुरू हो चुकी थी। चार बजे से ही पुलिस बल तैनात कर दिया गया था। जब जेसीबी मशीनों ने एक-एक कर झुग्गियों को तोड़ना शुरू किया, तो वहां मौजूद लोगों के लिए यह पल किसी सदमे से कम नहीं था। जिन घरों में कभी हंसी-खुशी की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब मलबा नजर आ रहा था।
400 पुलिसकर्मियों के साए में चली पूरी कार्रवाई
भोपाल बुलडोजर एक्शन को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। पूरे इलाके में करीब 400 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे, ताकि किसी भी तरह का विरोध या तनाव न बढ़े। चारों ओर बैरिकेडिंग लगाकर आम लोगों की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी गई थी।
कार्रवाई के दौरान 27 झुग्गियों को पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया। यह प्रक्रिया देर रात तक चली। प्रशासन की प्राथमिकता यह थी कि कार्रवाई बिना किसी बाधा के पूरी हो, इसलिए इलाके को पूरी तरह सील कर दिया गया था। भोपाल बुलडोजर एक्शन के दौरान यह साफ दिखा कि प्रशासन किसी भी हालत में पीछे हटने के मूड में नहीं था।
हालांकि इस दौरान आम लोगों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। सीएम हाउस और बोट क्लब की ओर जाने वाले रास्ते बंद होने से लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ा। यह कार्रवाई सिर्फ एक बस्ती तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे शहर की आवाजाही को प्रभावित करती नजर आई।
झुग्गियों से निकला 50 ट्रक सामान
भोपाल बुलडोजर एक्शन के दौरान एक और दिलचस्प और भावनात्मक पहलू सामने आया। जब प्रशासन की टीम झुग्गियों को खाली कराने पहुंची, तो कई घरों में ताले लगे हुए थे। रहवासी पहले ही अपनी झुग्गियों को छोड़कर जा चुके थे और उन्होंने अपने घरों में कुत्तों को छोड़ दिया था।
ऐसे में कार्रवाई में देरी हुई और नगर निगम को डॉग स्क्वाड बुलाना पड़ा। ताले तोड़ने के बाद जब कुत्ते बाहर निकले, तो उन्हें सुरक्षित तरीके से पकड़ा गया। यह पूरा दृश्य प्रशासन के लिए भी चुनौतीपूर्ण बन गया।
भोपाल बुलडोजर एक्शन के दौरान करीब 50 ट्रक सामान झुग्गियों से निकालकर मालीखेड़ी भेजा गया। इनमें दरवाजे, खिड़कियां, पानी के ड्रम और अन्य घरेलू सामान शामिल था। यह दिखाता है कि लोग अपने घरों को छोड़ते वक्त कितनी जल्दबाजी और असहायता में थे।
सड़क पर उतरे लोग, पुलिस ने किया नियंत्रण
भोपाल बुलडोजर एक्शन के खिलाफ स्थानीय लोगों का गुस्सा भी खुलकर सामने आया। झुग्गीवासी पॉलिटेक्निक कॉलेज के सामने धरने पर बैठ गए और कार्रवाई को रोकने की मांग करने लगे। दोपहर होते-होते यह विरोध और तेज हो गया।
महिलाओं ने जमकर हंगामा किया, जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हो गए। स्थिति को बिगड़ता देख पुलिस ने हस्तक्षेप किया और महिला पुलिस की मदद से प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया गया। कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया।
भोपाल बुलडोजर एक्शन के दौरान यह साफ नजर आया कि यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक मुद्दा भी बन चुका है। लोगों के लिए यह उनके अस्तित्व और सम्मान का सवाल बन गया था।
नेताओं ने उठाए सवाल
जैसे ही भोपाल बुलडोजर एक्शन की खबर फैली, सियासत भी गर्म हो गई। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व विधायक पीसी शर्मा सहित कई नेता मौके पर पहुंचे और इस कार्रवाई का विरोध किया। उन्होंने इसे गरीबों के खिलाफ अन्याय बताया।
नेताओं ने प्रशासन से सवाल किया कि क्या विकास के नाम पर लोगों को इस तरह बेघर करना सही है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यही कार्रवाई किसी और परिस्थिति में उनके साथ हो, तो कैसा लगेगा। भोपाल बुलडोजर एक्शन ने एक बार फिर राजनीति और प्रशासन के बीच टकराव को उजागर कर दिया।
27 परिवारों का विस्थापन
भोपाल बुलडोजर एक्शन के तहत हटाए गए 27 परिवारों को मालीखेड़ी में शिफ्ट किया गया है। प्रशासन का कहना है कि वहां उन्हें एक बीएचके फ्लैट दिए गए हैं, जिनकी कीमत करीब 12 लाख रुपये है और जिनमें सभी जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विस्थापन उनके जीवन को आसान बनाएगा या नई चुनौतियां खड़ी करेगा। कई परिवारों का रोजगार, बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक जुड़ाव इसी इलाके से जुड़ा हुआ था। ऐसे में अचानक नए स्थान पर जाना उनके लिए आसान नहीं है।
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मशहूर कोरियोग्राफर ने हाल ही में अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे एक वक्त पर उन्हें सांवले रंग की वजह से रिजेक्शन झेलना पड़ा था. उन दिनों वो एक बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम करते थे और उन्हें दिन के महज 750 मिलते थे, जबकि उनकी पत्नी एक मॉडल थीं और उनकी कमाई कहीं ज्यादा थी. फिल्म के सेट पर ही दोनों की मुलाकात हुई और प्यार परवान चढ़ा. भारी रिस्क और अटूट लगन के दम पर उन्होंने फर्श से अर्श तक का यह सफर तय किया है.
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