अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ फिर से सख्त रुख दिखाया। उन्होंने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी। एक तस्वीर पोस्ट की जिसे ईरान के लिए फाइनल वार्निंग माना जा रहा है। जब कूटनीति से समाधान नहीं निकला तो अब अमेरिका ने अपना रुख खड़ा कर लिया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट टूथ पर एक पोस्ट किया जिसमें वह हाथ में M4 ऑटोमेटिक असॉल्ट राइफल के साथ दिख रहे हैं और लिखा है नो मोर मिस्टर नाइस गाय। ट्रंप ने बातचीत की धीमी गति पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि ईरान अपने मामलों को ठीक से संभाल नहीं पा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब पहले से ही मिडिल ईस्ट में तनाव है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सहयोगी जर्मनी को चेतावनी देते हुए संकेत दिया कि वह वहां तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम कर सकते हैं। यह बयान ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध को लेकर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ बढ़ते तनाव के बीच आया है। मर्ज ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि ईरानी नेतृत्व के सामने अमेरिका ‘‘अपमानित’’ हो रहा है और उन्होंने युद्ध में वाशिंगटन की रणनीति पर सवाल उठाए थे। इसके बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि अमेरिका जर्मनी में सैनिकों की तैनाती में कटौती की संभावना की समीक्षा कर रहा है और इस पर जल्द फैसला लिया जाएगा।
अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा खर्च को कम बताते हुए जर्मनी से सैनिक घटाने की घोषणा की थी। 2020 में उन्होंने लगभग 34,500 में से 9,500 सैनिक वापस बुलाने की बात कही थी, लेकिन यह योजना लागू नहीं हो सकी। बाद में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 2021 में इस निर्णय को रद्द कर दिया था। जर्मनी में अमेरिका के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें यूरोपीय और अफ्रीकी कमान मुख्यालय, रामस्टीन एयर बेस और एक क्षेत्रीय मेडिकल सेंटर शामिल हैं। मर्ज ने कहा कि ट्रंप के साथ उनके संबंध अच्छे हैं, लेकिन ईरान युद्ध को लेकर उन्हें शुरुआत से ही संदेह था। उन्होंने चेतावनी दी कि इस संघर्ष के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से, जहां से विश्व का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है।
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एक ऐसा फैसला जिसने नेपाल की सियासत को हिला दिया है और सीमा पार तक हलचल मचा दी है। कुछ ही हफ्तों पहले जिसे जनता का समर्थन हासिल था। आज उसी नेतृत्व के खिलाफ विरोध की लहर उठती दिख रही है और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ठीक 1 महीने पहले नेपाल की जिस जजी ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाया था वही जजी अब बालेन शाह के खिलाफ उतर आई है। कुछ दिन पहले नेपाल में सीमा और व्यापार से जुड़े कुछ नए नियम लागू किए गए जिनके बाद हालात धीरे-धीरे बदलने लगे। वहीं दूसरी तरफ भारत नेपाल बॉर्डर पर भी कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव देखने को मिला। जिससे आम लोगों की आवाजाही और रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी असर पड़ने लगा। अब हालात ऐसे बनते नजर आ रहे हैं कि नेपाल के भीतर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। जहां एक तरफ सरकार अपने फैसले को जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी तरफ जनता के एक वर्ग में असंतोष और नाराजगी की आवाजें तेज हो रही हैं। कुछ दिन पहले नेपाल की बालेन शाह सरकार ने भारत को अकर दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन भारत ने 48 घंटों में नेपाल का इलाज कर दिया।
भारत कभी नहीं चाहेगा कि नेपाल के साथ उसके रिश्ते पर कभी भी आ जाए। लेकिन अगर नेपाल की सरकार अकड़ दिखाएगी तो गद्दारी का बदला लिया जाएगा और इस बार भारत ने 48 घंटों के अंदर ही नेपाल की सरकार को गद्दारी की सजा भी दे दी है। दरअसल भारत की तरफ से एक बड़ा कदम सामने आया है। बिहार के सीमावर्ती जिलों पूर्णिया, किशनगंज, सुफोल और कटिहार में अब नेपाली नंबर प्लेट वाले वाहनों को पेट्रोल और डीजल देने पर रोक लगा दी गई है। यह फैसला सामने आते ही पूरे सीमा क्षेत्र में हलचल मच गई है। आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले नेपाल की बालनशाह सरकार ने एक ऐलान किया था। इस ऐलान के तहत नेपाल के लोग अगर भारत से 100 से ज्यादा का सामान खरीद लेते हैं तो इन पर नेपाली लोगों को कस्टम ड्यूटी देना ही होगा। कहा जा रहा है कि इन फैसलों के बाद नेपाल में हलचल और बढ़ गई। कुछ लोग इसे रणनीतिक दबाव मान रहे हैं तो कुछ इसे प्रशासनिक कदम बता रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इसका असर आम जनता पर साफ दिखने लगा है।
नेपाल पहले ही महंगाई और ईंधन संकट से जूझ रहा था। तराई क्षेत्रों में पेट्रोल डीजल की कीमतें भारत से काफी ज्यादा है। जिससे लोग सीमावर्ती इलाकों पर निर्भर रहते थे। लेकिन हाल में बदलावों ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। जहां एक तरफ सरकार अपने फैसलों पर कायम है, वहीं दूसरी तरफ विरोध और असंतोष की आवाजें भी उठने लगी हैं। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ नीतियों का टकराव है या फिर नेपाल की राजनीतिक एक बड़े बदलाव की तरफ बढ़ रही है।
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