भविष्य में जंग कैसे लड़ी जाएगी इसके कई जवाब हो सकते हैं। मिसाइल से फाइटर जेट से या जंगी जहाजों से ये सभी चीजें अपनी-अपनी जगह बेहतर हैं। लेकिन हालिया युद्धों ने हमें जो सिखाया है उसे देखकर तो यही लगता है कि भविष्य की जंगों की दिशा ड्रोन्स तय कर सकते हैं। कम खर्चे में ज्यादा तबाही, दुश्मन के खेमे में ज्यादा कंफ्यूजन और एयर डिफेंस को चकमा। इन सभी कामों में ड्रोन से बेहतर फिलहाल कुछ नहीं है। अब चीन ने एक नया ड्रोन सिस्टम लॉन्च किया है जो भारत समेत पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन सकता है। इस सिस्टम का नाम एटलस है। एटलस ड्रोन स्वार्म सिस्टम। पहले आपको बताते हैं कि स्वार्म ड्रोनस क्या होते हैं? स्वार्म शब्द का मतलब होता है एक झुंड। मधुमक्खी के झुंडों के लिए स्वार्म शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के ड्रोंस एक साथ बड़ी संख्या में हमला करते हैं। इससे फायदा यह होता है कि दुश्मन का एयर डिफेंस कंफ्यूज हो जाता है। वो समझ नहीं पाता कि ड्रोन को पहले रोके। जब तक वह अपना टारगेट चुनता है तब तक और भी ड्रोंस आ जाते हैं। इससे एयर डिफेंस को पहले ही नाकाम करने में मदद मिलती है जिससे मिसाइल्स और फाइटर जेट्स के लिए कोई रुकावट नहीं रह जाती।
अब आपको बताते हैं कि चाइना का नया एटलस फॉर्म ड्रोन सिस्टम क्या है? चीन का एटलस सिस्टम पहियों पर चलने वाले एक छोटे बैटल फील्ड नेटवर्क जैसा है जिसमें ड्रोन को एक ट्रक से लॉन्च किया जाता है। इन ड्रोंस और उनके लॉन्च को एक ही ऑपरेटर दूर से कंट्रोल करते हैं। यह एक बड़े इलाके में जासूसी, कम्युनिकेशन और एयर डिफेंस के लिए भ्रम पैदा करने का काम करते हैं। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि यह एक बहुत ही छोटी यूनिट होती है जिसे छिपाना, कैमोफ्लाज में रखना और दूरदराज से ऑपरेट करना आसान है। एटलस सिस्टम एक साथ 96 छोटे-छोटे और मीडियम साइज के तेज ड्रोन लॉन्च कर सकता है। यह ड्रोन जो बचाव और हमला दोनों में बहुत काम आते हैं। एक ड्रोन के बीच लॉन्च का समय 3 सेकंड से भी कम का होता है। इसलिए 300 सेकंड के अंदर यह सिस्टम हमला करने, जासूसी करने या दुश्मन को कंफ्यूज करने के लिए सभी 96 ड्रोंस लॉन्च कर सकता है। हाल के युद्धों में ही देख लें तो ईरान अमेरिका युद्ध के दौरान सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर मौजूद अमेरिका के E3 सेंट्री एडब्ल्यूएसीएस विमान को 29 ड्रोंस के एक झुंड और कुछ बैलस्टिक मिसाइलों ने तबाह कर दिया था। पूरे एटलस सिस्टम को देखें तो इनमें तीन यूनिट्स होती हैं। इनमें एक स्वम टू ग्राउंड कॉम्बैट व्हीकल, एक कमांड व्हीकल और एक सपोर्ट व्हीकल होता है। एक अकेला स्वम टू ग्राउंड कॉम्बैट व्हीकल 48 फिक्स्ड विंग ड्रोन लॉन्च कर सकता है। एक अकेला कमांड व्हीकल एक ही समय में एक झुंड में 96 ड्रोंस को कंट्रोल कर सकता है। इसका आकार और इसकी स्पीड इसे जासूसी करने, इंटरसेप्शन करने और जरूरी टारगेट्स पर हमला करने के लिए बेहद उपयोगी बनाती है।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक ऑपरेशनल जरूरतों के आधार पर एटलस को अपने हिसाब से कंफिगर भी किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए पहले जासूसी ड्रोन तैनात किए जा सकते हैं। जबकि दुश्मनों को दबाने के लिए हमलावर ड्रोन से पहले इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर वाले ड्रोन भेजे जा सकते हैं। इससे अलग-अलग स्थितियों के अनुसार खास तरह से जवाब देना संभव हो जाता है। स्वर्म इंटेलिजेंस से लैस लगभग 100 हाई स्पीड ड्रोन मिशन के दौरान बहुत कम समय में सटीक इंफॉर्मेशन बना सकते हैं। वो हवा के बहाव में गड़बड़ी जैसी स्थिति में भी खुद को संभालने में सक्षम होते हैं। अब आपको यह भी बताते हैं कि यह एटलस वर्म ड्रोंस इंडिया और ताइवान के लिए टेंशन की बात क्यों है। एटलस सिस्टम ताइवान और भारत के एयर डिफेंस को कंफ्यूज कर सकता है। इसे नष्ट करने के लिए भारत और ताइवान को इसके कई हिस्सों को बर्बाद करना पड़ेगा जो इसकी स्पीड और कैमोफ्लैश क्षमता को देखते हुए मुश्किल जान पड़ता है। इसके अलावा सिस्टम की एल्गोरिदम से ऑपरेट होने वाली किल चेन और खुद से टारगेट की पहचान करने की क्षमता इसे और घातक बनाती है।
Continue reading on the app
ईरान ने अमेरिका के सामने ऐसा तीन स्टेप प्लान रख दिया है जो ट्रंप की टेंशन बढ़ा सकता है। इस बीच खबर यह भी है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता पर ईरान को शक है कि वो निष्पक्ष नहीं है और अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है। ईरान ने अमेरिका के सामने एक नया और चौंकाने वाला प्रस्ताव रख दिया है। एक्सओस की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने पाकिस्तान के जरिए वाशिंगटन को संदेश भेजा है कि पहले हॉर्मोज स्ट्रेट को फिर से खोलने और युद्ध खत्म करने पर समझौता किया जाए। जबकि परमाणु मुद्दे पर बातचीत बाद में भी की जा सकती है। ईरान का कहना है कि अगर अमेरिका बातचीत को सफल बनाना चाहता है तो उसे इन तीन चरणों से गुजरना होगा। सबसे पहले युद्ध को पूरी तरह खत्म करना होगा। साथ ही अमेरिका को यह गारंटी देनी होगी कि भविष्य में ईरान और लेबनान के खिलाफ दोबारा ऐसी जंग शुरू नहीं की जाएगी।
पहला चरण: युद्ध पूरी तरह से खत्म होना चाहिए और इस बात की पक्की गारंटी मिलनी चाहिए कि ईरान और लेबनान के खिलाफ दोबारा कोई जंग नहीं छेड़ी जाएगी।
दूसरा चरण: अगर पहले चरण की मांगें मान ली जाती हैं, तो दूसरे चरण में सभी पक्ष होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के कामकाज और देखरेख पर चर्चा करेंगे। यह दुनिया के लिए एक बेहद अहम समुद्री रास्ता है।
तीसरा चरण: ऊपर के दोनों चरण पूरे होने के बाद ही ईरान परमाणु मुद्दे पर बातचीत करेगा। यह सबसे अहम बात है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से यह मांग कर रहा है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) बंद करे और अपने परमाणु भंडार को देश से बाहर भेजे।
इस प्रस्ताव पर जवाब देते हुए व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने एक्सियोस को बताया, ये बहुत ही संवेदनशील कूटनीतिक बातचीत है और अमेरिका मीडिया के ज़रिए कोई मोलभाव नहीं करेगा। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा है, अमेरिका का पलड़ा भारी है और वह सिर्फ वही समझौता करेगा जो अमेरिकी लोगों के हित में हो। अमेरिका कभी भी ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा।
Continue reading on the app