इस साल होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कमान भारत के हाथों में। दुनिया भर में बढ़ते तनाव के बीच इस बार के ब्रिक्स पर वैसे ही कई देशों की नजर है और इसी बीच चीन की ओर से भी एक बड़ा बयान सामने आया जो इस आयोजन की अहमियत को और बढ़ाने का काम कर रहा है। दरअसल चीनी विदेश मंत्रालय के विशेष दूत ने हाल ही में नई दिल्ली में भारतीय अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का सम्मान करता है और भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना करता है। साथ ही साथ चीन ने उम्मीद जताई कि भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स देश मिडिल ईस्ट के तनाव को कम करने और वैश्विक शांति के लिए एक मजबूत संदेश देंगे। चीन का मानना है कि भारत और चीन जैसे बड़े विकासशील देशों का साथ आना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक 23 अप्रैल 2026 को मध्यपूर्व मुद्दे पर चीनी सरकार के विशेष दूत झाई जून ने नई दिल्ली में भारत की विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा से मुलाकात की। इस दौरान दोनों पक्षों ने ब्रिक्स तंत्र के तहत सहयोग को मजबूत करने पर विचारों का आदान प्रदान किया। भारत में चीन के राजदूत ज फहोंग भी इस बैठक में उपस्थित रहे। जाई जून ने कहा कि प्रमुख विकासशील देशों के रूप में चीन और भारत ने हमेशा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर संवाद बनाए रखा। चीन ब्रिक्स की रोटेटिंग प्रेसिडेंसी के रूप में भारत द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को महत्व देता है और उम्मीद करता है कि मध्य पूर्व पर होने वाली यह ब्रिक्स परामर्श बैठक क्षेत्रीय स्थिति पर एक मजबूत आवाज उठाएगी और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता प्राप्त करने में रचनात्मक भूमिका भी निभाएगी। वहीं भारत की ओर से नीना मल्होत्रा ने कहा कि भारत ब्रिक्स तंत्र के भीतर चीन द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका को महत्व देता है और इस तंत्र के तहत प्रासंगिक गतिविधियों की मेजबानी में भारत को चीन के समर्थन की सराहना करता है।
भारत क्षेत्रीय तनाव को जल्द से जल्द कम करने के लिए चीन सहित अन्य ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। आपको बता दें भारत 2026 में Bricks का मेजबान है और इस बार की थीम रेलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी रखी गई है। भारत का लक्ष्य है केवल आर्थिक चर्चा करना नहीं बल्कि डिजिटल तकनीक, ग्रीन एनर्जी और विकासशील देशों की आवाज को दुनिया के सामने मजबूती से रखना। और सबसे बड़ी बात bricks अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं रहा। 2026 तक ये 11 शक्तिशाली देशों का एक कुबा बन चुका है। इसमें संस्थापक सदस्य ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। और नए सदस्य सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया। इन देशों के पास दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल बाजार और तेल व गैस के असीमित संसाधन। वहीं ब्रिक्स की बढ़ती ताकत अमेरिका और पश्चिम देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं। पहला डीडोलराइजेशन। ब्रिक्स देश अब अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दे रहे हैं और अगर डॉलर का दबदबा कम हो जाता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक पकड़ कमजोर हो सकती है। अमेरिका को डर है कि भारत चीन इस मंच का इस्तेमाल अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। कुल मिलाकर जहां पश्चिमी देशों में पहले से ही ब्रिक्स का विरोध हो रहा है। वहीं ब्रिक्स 2026 भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है। जहां एक ओर चीन के साथ मिलकर क्षेत्रीय शांति पर बात हो रही है। वहीं दूसरी ओर भारत को अमेरिका और रूस चीन के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
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ईरान को ट्रंप की नई धमकी मिली है। ईरान के ऑल इंफ्रा पर हमले की धमकी दी गई है। ट्रंप ने ईरान की लीडरशिप को बहुत अजीब बताया है। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने दूतों को इस्लामाबाद की यात्रा न करने के लिए कहा था। उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के बारे में पूछे जाने पर, ट्रंप ने कहा कि वह इस सैन्य गठबंधन से ‘‘बहुत, बहुत निराश’’ हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस गठबंधन से अलग होने पर विचार कर सकता है, क्योंकि सदस्य देशों ने ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद करने के बाद उनकी मदद की अपील को नजरअंदाज कर दिया। ट्रंप ने कहा हम कई वर्षों से उनकी मदद कर रहे हैं, खरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं, और जब हमें उनकी मदद चाहिए थी तो वे मौजूद नहीं थे, इसलिए हमें यह बात याद रखनी होगी।
अमेरिका के साथ वार्ता के दूसरे दौर को लेकर अनिश्चितता के बीच तीन दिन में दूसरी बार पाकिस्तान पहुंचे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल मुनीर और अन्य शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद अराघची शनिवार को इस्लामाबाद से रवाना हुए थे। वह ओमान गए थे, जहां उन्होंने सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सैद के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा और ईरान-अमेरिका संघर्ष को समाप्त करने के लिए राजनयिक प्रयासों पर बातचीत की। ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी ‘आईआरएनए’ के अनुसार, इस्लामाबाद में संक्षिप्त प्रवास के बाद ईरानी नेता मॉस्को के लिए रवाना होंगे। पाकिस्तान की ओर से इस बैठक को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। बताया जा रहा है कि यह बैठक पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता के दूसरे दौर की व्यवस्था करने के लिए जारी शांति प्रयासों पर केंद्रित है।
ग्यारह और बारह अप्रैल को आयोजित शांति वार्ता का पहला दौर संघर्ष में शामिल पक्षों के लिए वांछित परिणाम लाने में विफल रहा। ‘डॉन’ अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि ईरानी नेता ओमान की एक दिवसीय यात्रा पूरी करने के बाद रावलपिंडी के नूर खान हवाई अड्डे पर पहुंचे। अखबार के मुताबिक, इस्लामाबाद में अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान वह पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे और उसके बाद मॉस्को के लिए रवाना होंगे। पाकिस्तान ने अराघची के आगमन के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन ‘जियो न्यूज’ सहित निजी मीडिया ने राजनयिक सूत्रों के हवाले से पूर्व में ही खबर दी थी कि ईरानी विदेश मंत्री मॉस्को जाने से पहले एक संक्षिप्त यात्रा पर पाकिस्तान पहुंचेंगे। शनिवार को अराघची के ओमान रवाना होने के बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर अब ईरान के साथ वार्ता के लिए इस्लामाबाद नहीं जाएंगे। रविवार को ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिकी और ईरानी अधिकारी संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए फोन पर बातचीत कर सकते हैं।
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