अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आखिरकार व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन डिनर में लौट रहे थे। ट्रंप ने बाद में खुद माना कि वह मीडिया के साथ खास तौर पर तीखे अंदाज़ में पेश आने की तैयारी कर रहे थे। फिर गोलियां चलीं। सीक्रेट सर्विस के अधिकारियों ने राष्ट्रपति, फर्स्ट लेडी और उपराष्ट्रपति को कैबिनेट के दूसरे सदस्यों के साथ सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया। हमलावर, 31 साल के कोल थॉमस एलन, तीन हथियार लेकर वॉशिंगटन हिल्टन पहुंचे थे - दो हैंडगन और एक शॉटगन। उनके पास एक प्लान भी था, और उन्होंने यह सब लिख रखा था। गोलीबारी शुरू करने से करीब दस मिनट पहले परिवार वालों को भेजे गए एक मैनिफेस्टो में, एलन ने साफ-साफ बताया था कि वह किसे निशाना बनाना चाहते थे। न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस लिस्ट में सबसे ऊपर ट्रंप प्रशासन के सबसे सीनियर अधिकारी थे, और लिस्ट नीचे की तरफ जाती थी। लेकिन एक नाम इस लिस्ट में नहीं था।
एलन ने लिखा कि प्रशासन के अधिकारी पटेल को छोड़कर वे निशाने पर हैं, उन्हें सबसे ऊंचे पद से लेकर सबसे नीचे पद तक के क्रम में रखा गया है। एलन ने अपनी लिस्ट से एफबीआई डायरेक्टर काश पटेल को क्यों बाहर रखा, इसकी वजह अभी तक साफ नहीं हो पाई है। घोषणापत्र में एलन द्वारा हमले का औचित्य भी शामिल था। उन्होंने लिखा कि दूसरा गाल आगे करना तब उचित होता है जब आप स्वयं उत्पीड़ित हों। मैं वह व्यक्ति नहीं हूँ जिसका बलात्कार किसी नजरबंदी शिविर में हुआ। मैं वह मछुआरा नहीं हूँ जिसे बिना मुकदमे के फाँसी दे दी गई। मैं वह स्कूली बच्चा नहीं हूँ जिसे बम से उड़ा दिया गया, न ही वह बच्चा हूँ जिसे भूखा रखा गया, न ही वह किशोरी हूँ जिसका इस प्रशासन के कई अपराधियों द्वारा शोषण किया गया। जब कोई और उत्पीड़ित हो तो दूसरा गाल आगे करना ईसाई आचरण नहीं है; यह उत्पीड़क के अपराधों में सहभागिता है। एलन ने अपनी योजना का भी विस्तार से वर्णन किया, जिसमें उनके द्वारा चुने गए गोला-बारूद का प्रकार और कारण भी शामिल था।
उन्होंने लिखा कि हताहतों को कम करने के लिए, मैं छर्रों के बजाय बकशॉट का उपयोग करूँगा (दीवारों में कम पैठ)। यदि यह बिल्कुल आवश्यक हुआ तो मैं यहाँ मौजूद लगभग सभी लोगों को मार डालूँगा (इस आधार पर कि अधिकांश लोगों ने एक बाल यौन शोषण करने वाले, बलात्कारी और देशद्रोही का भाषण सुनने का विकल्प चुना है, और इस प्रकार वे सहभागी हैं), लेकिन मुझे वास्तव में उम्मीद है कि ऐसी नौबत नहीं आएगी।
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इस साल होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कमान भारत के हाथों में। दुनिया भर में बढ़ते तनाव के बीच इस बार के ब्रिक्स पर वैसे ही कई देशों की नजर है और इसी बीच चीन की ओर से भी एक बड़ा बयान सामने आया जो इस आयोजन की अहमियत को और बढ़ाने का काम कर रहा है। दरअसल चीनी विदेश मंत्रालय के विशेष दूत ने हाल ही में नई दिल्ली में भारतीय अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का सम्मान करता है और भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना करता है। साथ ही साथ चीन ने उम्मीद जताई कि भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स देश मिडिल ईस्ट के तनाव को कम करने और वैश्विक शांति के लिए एक मजबूत संदेश देंगे। चीन का मानना है कि भारत और चीन जैसे बड़े विकासशील देशों का साथ आना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक 23 अप्रैल 2026 को मध्यपूर्व मुद्दे पर चीनी सरकार के विशेष दूत झाई जून ने नई दिल्ली में भारत की विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा से मुलाकात की। इस दौरान दोनों पक्षों ने ब्रिक्स तंत्र के तहत सहयोग को मजबूत करने पर विचारों का आदान प्रदान किया। भारत में चीन के राजदूत ज फहोंग भी इस बैठक में उपस्थित रहे। जाई जून ने कहा कि प्रमुख विकासशील देशों के रूप में चीन और भारत ने हमेशा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर संवाद बनाए रखा। चीन ब्रिक्स की रोटेटिंग प्रेसिडेंसी के रूप में भारत द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को महत्व देता है और उम्मीद करता है कि मध्य पूर्व पर होने वाली यह ब्रिक्स परामर्श बैठक क्षेत्रीय स्थिति पर एक मजबूत आवाज उठाएगी और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता प्राप्त करने में रचनात्मक भूमिका भी निभाएगी। वहीं भारत की ओर से नीना मल्होत्रा ने कहा कि भारत ब्रिक्स तंत्र के भीतर चीन द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका को महत्व देता है और इस तंत्र के तहत प्रासंगिक गतिविधियों की मेजबानी में भारत को चीन के समर्थन की सराहना करता है।
भारत क्षेत्रीय तनाव को जल्द से जल्द कम करने के लिए चीन सहित अन्य ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। आपको बता दें भारत 2026 में Bricks का मेजबान है और इस बार की थीम रेलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी रखी गई है। भारत का लक्ष्य है केवल आर्थिक चर्चा करना नहीं बल्कि डिजिटल तकनीक, ग्रीन एनर्जी और विकासशील देशों की आवाज को दुनिया के सामने मजबूती से रखना। और सबसे बड़ी बात bricks अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं रहा। 2026 तक ये 11 शक्तिशाली देशों का एक कुबा बन चुका है। इसमें संस्थापक सदस्य ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। और नए सदस्य सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया। इन देशों के पास दुनिया की बड़ी आबादी, विशाल बाजार और तेल व गैस के असीमित संसाधन। वहीं ब्रिक्स की बढ़ती ताकत अमेरिका और पश्चिम देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं। पहला डीडोलराइजेशन। ब्रिक्स देश अब अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दे रहे हैं और अगर डॉलर का दबदबा कम हो जाता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक पकड़ कमजोर हो सकती है। अमेरिका को डर है कि भारत चीन इस मंच का इस्तेमाल अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। कुल मिलाकर जहां पश्चिमी देशों में पहले से ही ब्रिक्स का विरोध हो रहा है। वहीं ब्रिक्स 2026 भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है। जहां एक ओर चीन के साथ मिलकर क्षेत्रीय शांति पर बात हो रही है। वहीं दूसरी ओर भारत को अमेरिका और रूस चीन के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
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