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"गंगा एक्सप्रेसवे से जुड़ेगा जेवर एयरपोर्ट, पश्चिमी यूपी और पड़ोसी राज्यों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का नया द्वार"

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को गंगा एक्सप्रेसवे और यमुना एक्सप्रेसवे से जोड़ने वाले लगभग 74.5 किलोमीटर लंबे 6-लेन ग्रीनफील्ड लिंक एक्सप्रेसवे को मंजूरी मिलने से जेवर की कनेक्टिविटी को नई ताकत मिलने जा रही है। लगभग 8,586 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए हालिया अनुपूरक बजट में ₹250 करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान भी किया गया है।

लिंक एक्सप्रेसवे के निर्माण से गंगा एक्सप्रेसवे के माध्यम से पश्चिमी एवं मध्य उत्तर प्रदेश के बड़े भूभाग को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट तक तेज और सुगम सड़क संपर्क मिलेगा। साथ ही दिल्ली-एनसीआर, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान से आने वाले यात्रियों एवं व्यावसायिक यातायात के लिए भी जेवर एयरपोर्ट तक पहुंच के बेहतर विकल्प विकसित होंगे। इससे एयरपोर्ट का कैचमेंट एरिया बढ़ने के साथ यात्री संख्या, एयर कार्गो, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, पर्यटन, होटल, निर्यात और औद्योगिक निवेश को भी गति मिलने की संभावना है।

जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार व्यक्त करते हुए कहा, “यह केवल एक एक्सप्रेसवे नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को देश और दुनिया से जोड़ने वाला आर्थिक कॉरिडोर साबित होगा। माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की दूरदर्शिता से जेवर आज उत्तर प्रदेश के एविएशन, औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स गेटवे के रूप में उभर रहा है।”

विधायक धीरेंद्र सिंह ने किसानों के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा, “जेवर के विकास की इस नई इबारत की नींव में हमारे किसानों का त्याग और सहयोग है। एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे और औद्योगिक विकास के लिए भूमि देने वाले किसान परिवारों का योगदान आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। किसानों के हितों और सम्मान की रक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

उन्होंने इस परियोजना के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश सरकार तथा भूमि देने वाले किसानों, ग्रामवासियों, अधिकारियों, कर्मचारियों और इससे जुड़े सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।

“यह एक्सप्रेसवे केवल दूरियां कम नहीं करेगा, बल्कि जेवर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों को रोजगार, निवेश और वैश्विक अवसरों के और करीब लेकर आएगा।”

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Sharad Pawar के बाद MK Stalin भी आएंगे PM Modi के साथ! भारत का चुनावी गणित बदलने की तैयारी लगभग पूरी

संसद के मानसून सत्र के अंतिम दौर में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। शरद पवार गुट के सांसदों का सुप्रिया सुले के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके आवास पर मिलना महज महाराष्ट्र के सूखे, सिंचाई और क्षेत्रीय मांगों तक सीमित मुलाकात नहीं माना जा रहा। बैठक के बाद भले ही परिसीमन विधेयक पर प्रत्यक्ष चर्चा से इंकार किया गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने तलाशे जाने लगे हैं। खासकर इसलिए कि शरद पवार गुट के बारे में पहले से संकेत मिलते रहे हैं कि वह विधेयक के अंतिम स्वरूप और सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि जैसी शर्तों के आधार पर सरकार के प्रस्ताव का समर्थन कर सकता है।

यहीं से मोदी सरकार की रणनीति का असली राजनीतिक खेल दिखाई देता है। सरकार के लिए परिसीमन महज एक विधेयक नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावी प्रतिनिधित्व के ढांचे को प्रभावित करने वाला बड़ा संवैधानिक सवाल है। ऐसे में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर नरमी और परिसीमन पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिशों को अलग-अलग घटनाओं की बजाय एक बड़े राजनीतिक समीकरण के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। स्रोतों के मुताबिक FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध करने वाले दलों में DMK और NCP(SP) शामिल हैं, जबकि दोनों को परिसीमन के मामले में संभावित संवाद-साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: Supriya Sule का बयान: Prashant Kishor संग काम का फैसला NCP का आंतरिक मामला

मोदी सरकार का FCRA विधेयक को आज के लोकसभा एजेंडे में नहीं रखना इसी रणनीतिक गणित को हवा देता है। रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि सरकार विवादित FCRA प्रावधानों पर तत्काल टकराव से बचकर उन दलों के साथ राजनीतिक संवाद की गुंजाइश बनाए रखना चाहती है, जिनकी जरूरत परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर पड़ सकती है। हालांकि इसका एक दूसरा कारण भी हो सकता है कि सरकार विधेयक पर विस्तृत बहस चाहती हो। इसलिए इसे किसी पक्के राजनीतिक सौदे का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।

सबसे दिलचस्प मोर्चा DMK का है। तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर DMK लगातार दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व की चिंता उठा रही है। पार्टी सांसद कनिमोझी ने हाल में साफ कहा कि DMK अपने पुराने रुख पर कायम है और तमिलनाडु के प्रतिनिधित्व की रक्षा तथा ‘Fair Delimitation’ की मांग से पीछे नहीं हटी है। पार्टी ने यह भी कहा कि सरकार ने मौजूदा सत्र में विधेयक लाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है और संशोधित मसौदा भी उसके सामने नहीं आया है।

इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि एमके स्टालिन सरकार के साथ आ गए हैं। लेकिन राजनीति में दरवाजे बंद होने और बातचीत की गुंजाइश बने रहने के बीच फर्क होता है। परिसीमन का प्रश्न दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण DMK का रुख निर्णायक महत्व रख सकता है। यदि केंद्र सरकार तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं का निराकरण करने वाला कोई ऐसा फार्मूला निकालती है, जिसमें प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे, तो मौजूदा राजनीतिक विरोध में दरार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

शरद पवार के मामले में भी तस्वीर इसी तरह सावधानी से पढ़नी होगी। प्रधानमंत्री से मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हुई हैं, लेकिन सुले ने स्पष्ट किया है कि विधेयक सामने आने के बाद ही पार्टी अपना रुख तय करेगी। यानी पवार खेमे का समर्थन अभी ‘तय’ नहीं, बल्कि संभावित समर्थन की राजनीतिक संभावना है।

फिर भी भाजपा के लिए यह घटनाक्रम विपक्षी एकजुटता की परीक्षा जरूर है। राहुल गांधी और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच परिसीमन सहित गतिरोध पर हुई बातचीत को सरकार की ओर से ‘अच्छी’ बातचीत बताया गया और यह संदेश दिया गया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं हैं।

उधर, आज भी हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों का कामकाज प्रभावित हुआ, लेकिन सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती दिख रही हैं। सरकार यदि इस सत्र में विधेयक के लिए पर्याप्त राजनीतिक सहमति जुटा पाती है, तो यह उसके लिए बड़ी संसदीय उपलब्धि होगी। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल होगा कि क्या वह ऐसी सहमति बना पाएगी जो उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व के विवाद को शांत कर सके?

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने परिसीमन को केवल सदन की संख्या का सवाल न रहने देकर उसे व्यापक राजनीतिक बातचीत का केंद्र बना दिया है। शरद पवार गुट के साथ संवाद और DMK की चिंताओं को साधने की कोशिश इसी बड़े समीकरण के संकेत हैं। यदि भाजपा इस गणित को साध लेती है, तो विपक्ष के लिए चुनौती केवल एक विधेयक का विरोध करना नहीं होगी, बल्कि बदलते राजनीतिक और चुनावी समीकरण का जवाब देना भी होगा।

बहरहाल, फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है कि मोदी सरकार ने अपने सामने खड़े राजनीतिक संकटों से निकलने की कला को अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया है। टकराव की बजाय संवाद, विरोधी खेमे में संभावित सहयोगियों की तलाश और बड़े मुद्दों पर सहमति का रास्ता बनाना उसकी राजनीति की खासियत बनती जा रही है। शरद पवार से संवाद हो या DMK की चिंताओं को साधने की कोशिश, सरकार हर मोर्चे पर ऐसा राजनीतिक रास्ता तलाश रही है जिससे विपक्ष की एकजुटता कमजोर हो और उसके लिए बड़े फैसलों की राह आसान बने। परिसीमन पर यदि यह रणनीति सफल होती है, तो मोदी सरकार आने वाले वर्षों के चुनावी समीकरणों पर भी अपनी मजबूत राजनीतिक छाप छोड़ सकती है।

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