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Sharad Pawar के बाद MK Stalin भी आएंगे PM Modi के साथ! भारत का चुनावी गणित बदलने की तैयारी लगभग पूरी

संसद के मानसून सत्र के अंतिम दौर में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। शरद पवार गुट के सांसदों का सुप्रिया सुले के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके आवास पर मिलना महज महाराष्ट्र के सूखे, सिंचाई और क्षेत्रीय मांगों तक सीमित मुलाकात नहीं माना जा रहा। बैठक के बाद भले ही परिसीमन विधेयक पर प्रत्यक्ष चर्चा से इंकार किया गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने तलाशे जाने लगे हैं। खासकर इसलिए कि शरद पवार गुट के बारे में पहले से संकेत मिलते रहे हैं कि वह विधेयक के अंतिम स्वरूप और सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि जैसी शर्तों के आधार पर सरकार के प्रस्ताव का समर्थन कर सकता है।

यहीं से मोदी सरकार की रणनीति का असली राजनीतिक खेल दिखाई देता है। सरकार के लिए परिसीमन महज एक विधेयक नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावी प्रतिनिधित्व के ढांचे को प्रभावित करने वाला बड़ा संवैधानिक सवाल है। ऐसे में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर नरमी और परिसीमन पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिशों को अलग-अलग घटनाओं की बजाय एक बड़े राजनीतिक समीकरण के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। स्रोतों के मुताबिक FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध करने वाले दलों में DMK और NCP(SP) शामिल हैं, जबकि दोनों को परिसीमन के मामले में संभावित संवाद-साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।

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मोदी सरकार का FCRA विधेयक को आज के लोकसभा एजेंडे में नहीं रखना इसी रणनीतिक गणित को हवा देता है। रिपोर्टों में यह संभावना जताई गई है कि सरकार विवादित FCRA प्रावधानों पर तत्काल टकराव से बचकर उन दलों के साथ राजनीतिक संवाद की गुंजाइश बनाए रखना चाहती है, जिनकी जरूरत परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर पड़ सकती है। हालांकि इसका एक दूसरा कारण भी हो सकता है कि सरकार विधेयक पर विस्तृत बहस चाहती हो। इसलिए इसे किसी पक्के राजनीतिक सौदे का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।

सबसे दिलचस्प मोर्चा DMK का है। तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर DMK लगातार दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व की चिंता उठा रही है। पार्टी सांसद कनिमोझी ने हाल में साफ कहा कि DMK अपने पुराने रुख पर कायम है और तमिलनाडु के प्रतिनिधित्व की रक्षा तथा ‘Fair Delimitation’ की मांग से पीछे नहीं हटी है। पार्टी ने यह भी कहा कि सरकार ने मौजूदा सत्र में विधेयक लाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है और संशोधित मसौदा भी उसके सामने नहीं आया है।

इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि एमके स्टालिन सरकार के साथ आ गए हैं। लेकिन राजनीति में दरवाजे बंद होने और बातचीत की गुंजाइश बने रहने के बीच फर्क होता है। परिसीमन का प्रश्न दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण DMK का रुख निर्णायक महत्व रख सकता है। यदि केंद्र सरकार तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं का निराकरण करने वाला कोई ऐसा फार्मूला निकालती है, जिसमें प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे, तो मौजूदा राजनीतिक विरोध में दरार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

शरद पवार के मामले में भी तस्वीर इसी तरह सावधानी से पढ़नी होगी। प्रधानमंत्री से मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हुई हैं, लेकिन सुले ने स्पष्ट किया है कि विधेयक सामने आने के बाद ही पार्टी अपना रुख तय करेगी। यानी पवार खेमे का समर्थन अभी ‘तय’ नहीं, बल्कि संभावित समर्थन की राजनीतिक संभावना है।

फिर भी भाजपा के लिए यह घटनाक्रम विपक्षी एकजुटता की परीक्षा जरूर है। राहुल गांधी और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच परिसीमन सहित गतिरोध पर हुई बातचीत को सरकार की ओर से ‘अच्छी’ बातचीत बताया गया और यह संदेश दिया गया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं हैं।

उधर, आज भी हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों का कामकाज प्रभावित हुआ, लेकिन सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती दिख रही हैं। सरकार यदि इस सत्र में विधेयक के लिए पर्याप्त राजनीतिक सहमति जुटा पाती है, तो यह उसके लिए बड़ी संसदीय उपलब्धि होगी। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल होगा कि क्या वह ऐसी सहमति बना पाएगी जो उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व के विवाद को शांत कर सके?

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने परिसीमन को केवल सदन की संख्या का सवाल न रहने देकर उसे व्यापक राजनीतिक बातचीत का केंद्र बना दिया है। शरद पवार गुट के साथ संवाद और DMK की चिंताओं को साधने की कोशिश इसी बड़े समीकरण के संकेत हैं। यदि भाजपा इस गणित को साध लेती है, तो विपक्ष के लिए चुनौती केवल एक विधेयक का विरोध करना नहीं होगी, बल्कि बदलते राजनीतिक और चुनावी समीकरण का जवाब देना भी होगा।

बहरहाल, फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है कि मोदी सरकार ने अपने सामने खड़े राजनीतिक संकटों से निकलने की कला को अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया है। टकराव की बजाय संवाद, विरोधी खेमे में संभावित सहयोगियों की तलाश और बड़े मुद्दों पर सहमति का रास्ता बनाना उसकी राजनीति की खासियत बनती जा रही है। शरद पवार से संवाद हो या DMK की चिंताओं को साधने की कोशिश, सरकार हर मोर्चे पर ऐसा राजनीतिक रास्ता तलाश रही है जिससे विपक्ष की एकजुटता कमजोर हो और उसके लिए बड़े फैसलों की राह आसान बने। परिसीमन पर यदि यह रणनीति सफल होती है, तो मोदी सरकार आने वाले वर्षों के चुनावी समीकरणों पर भी अपनी मजबूत राजनीतिक छाप छोड़ सकती है।

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Fact Check: सीआरपीएफ के जवान को पीटने का कांवड़ियों का वीडियो पुराना, वायरल दावा भ्रामक

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। कांवड़ यात्रा 2026 के बीच ‘केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल’ (सीआरपीएफ) के एक जवान को पीटते हुए कुछ लोगों का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो को हाल की घटना का बताते हुए दावा किया जा रहा है कि कुछ कांवड़ियों […]

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  Sports

England Test Captain Joe Root ने खिलाड़ियों पर से हटाया 'Night Curfew', कहा- अपनी Responsibility खुद समझें Team Members

इंग्लैंड की टेस्ट टीम में कप्तानी बदलने के साथ ही खिलाड़ियों के लिए नियमों में भी बड़ा बदलाव हुआ है। नए टेस्ट कप्तान जो रूट ने टीम पर लागू रात का कर्फ्यू हटाने का फैसला किया है। पाकिस्तान के खिलाफ इस महीने शुरू होने वाली टेस्ट श्रृंखला से खिलाड़ियों पर यह पाबंदी लागू नहीं होगी। रूट का कहना है कि इंग्लैंड के खिलाड़ी वयस्क हैं और उन्हें अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद समझनी चाहिए।

मौजूद जानकारी के अनुसार, कर्फ्यू की व्यवस्था न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के पिछले दौरों में शराब से जुड़े विवादों के बाद लागू की गई थी। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों को देर रात तक बाहर रहने और ऐसी गतिविधियों से रोकना था, जिनका असर अगले दिन के मुकाबले पर पड़ सकता है। हालांकि, रूट अब मानते हैं कि केवल समय की पाबंदी लगाना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

रूट ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कर्फ्यू लगाने से खिलाड़ियों की आदतों में जरूरी बदलाव आता है। उनका मानना है कि अगर खिलाड़ियों से मैदान पर जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है तो उन्हें मैदान के बाहर भी खुद सही और मजबूत फैसले लेने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि टीम को अपने स्तर पर इस व्यवस्था को संभालना और एक-दूसरे पर नजर रखना होगा।

गौरतलब है कि हाल की न्यूजीलैंड श्रृंखला के दौरान पूर्व कप्तान बेन स्टोक्स और गस एटकिंसन कर्फ्यू के नियम का उल्लंघन कर चुके थे। इसके बाद टीम में कई बदलाव देखने को मिले। स्टोक्स दूसरे टेस्ट में नहीं खेल पाए थे और तीसरे टेस्ट में वापसी कर कप्तानी की थी। इसी मुकाबले के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा भी की थी।

इसके बाद इंग्लैंड ने टेस्ट टीम के मुख्य प्रशिक्षक ब्रेंडन मैकुलम को पद से हटा दिया और उनकी जगह स्टीफन फ्लेमिंग को जिम्मेदारी दी गई। फ्लेमिंग के आने के साथ टेस्ट टीम की कप्तानी दोबारा जो रूट को सौंपी गई है। यह रूट का इंग्लैंड की टेस्ट टीम के कप्तान के रूप में दूसरा कार्यकाल है।

बता दें कि रूट के पहले कप्तानी कार्यकाल में भी इंग्लैंड की टीम पर कर्फ्यू लागू था। 2017-18 की एशेज श्रृंखला के दौरान शराब से जुड़े विवाद के बाद 2017 से 2022 के बीच खिलाड़ियों के लिए ऐसी पाबंदियां रखी गई थीं। अब दूसरी बार कप्तानी संभालने के साथ रूट ने इस व्यवस्था को खत्म कर नई सोच के साथ टीम आगे बढ़ाने का संकेत दिया है।

रूट ने खिलाड़ियों से कहा है कि उन्हें याद रखना होगा कि वे इंग्लैंड के लिए खेल रहे हैं और मैदान के बाहर उनके व्यवहार का असर पूरी टीम की छवि पर पड़ता है। उनका कहना है कि टीम की पहचान उसके क्रिकेट और मैदान पर प्रदर्शन से होनी चाहिए, न कि मैदान के बाहर होने वाली घटनाओं से।

मौजूद जानकारी के अनुसार, कर्फ्यू हटाने का फैसला केवल टेस्ट टीम तक सीमित नहीं रहने वाला है। इंग्लैंड की सीमित ओवरों की टीम के लिए भी इसे हटाए जाने की खबर है। उस टीम की जिम्मेदारी अभी ब्रेंडन मैकुलम के पास है और हैरी ब्रूक कप्तान हैं।

रूट ने खिलाड़ियों से यह भी कहा कि जीत के बाद जश्न मनाना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि कब जश्न मनाना है और कब आराम करना जरूरी है। उन्होंने खिलाड़ियों से एक-दूसरे का ध्यान रखने और टीम के भीतर मजबूत माहौल बनाने की अपील की है। पाकिस्तान के खिलाफ आगामी श्रृंखला से इंग्लैंड की नई व्यवस्था और रूट की नेतृत्व शैली की असली परीक्षा शुरू होने वाली हैं।
Wed, 12 Aug 2026 21:53:16 +0530

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