AAP MPs Defection to BJP: आप सांसदों का भाजपा में दल बदल, राज्यसभा गणित और पंजाब पर असर
हाल ही में सात आम आदमी पार्टी (आप) राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है.
AAP में बगावत: क्या अब भी बाजी पलट सकते हैं केजरीवाल? समझिए 7 सांसदों के दलबदल और कानूनी पेंच का पूरा गणित
आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है, जिसे तकनीकी रूप से 'विलय' का नाम दिया गया है। भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) विधायक या सांसद एक साथ टूटकर दूसरी पार्टी में जाते हैं या नई पार्टी बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती।
'आप' के मामले में 10 में से 7 सांसद जो कि 70% है, एक साथ गए हैं, जो कानूनन दो-तिहाई की सीमा को पार करता है। ऐसे में राघव चड्ढा और उनके साथियों ने बहुत सोच-समझकर यह संख्या बल जुटाया है ताकि उनकी कुर्सी सुरक्षित रहे।
हालांकि 7 सांसदों के भाजपा में शामिल होने की बात कही जा रही है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा है कि इनमें से 3 सांसदों को लेकर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इन असंतुष्ट सांसदों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहा है।
यदि 'आप' इनमें से केवल एक भी सांसद को वापस लाने में कामयाब हो जाती है, तो बागियों की संख्या 6 रह जाएगी। ऐसी स्थिति में यह संख्या दो-तिहाई (6.66 यानी 7 सांसद) से कम हो जाएगी और सभी 6 सांसदों पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने का खतरा मंडराने लगेगा। यही वह बारीक कानूनी पेंच है जहाँ केजरीवाल बाजी पलटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
इस पूरी बगावत की धुरी राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे दिग्गज नेता हैं। राघव चड्ढा को उप-नेता पद से हटाए जाने के बाद पैदा हुई नाराजगी ने इस विद्रोह को हवा दी। संदीप पाठक, जो पार्टी के मुख्य रणनीतिकार थे, उनका जाना 'आप' के लिए संगठनात्मक रूप से सबसे बड़ी चोट है।
वहीं अशोक मित्तल, जिन्हें हाल ही में उप-नेता बनाया गया था, उनका भाजपा में जाना यह दर्शाता है कि असंतोष की जड़ें कितनी गहरी थीं। इन नेताओं ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से ठोस आश्वासन मिलने के बाद ही यह कदम उठाया है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यह मामला राज्यसभा सभापति के सामने 'सत्यापन' के लिए जाएगा।
अब पूरी गेंद राज्यसभा सभापति के पाले में है। 'आप' नेतृत्व इन सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की याचिका दायर करने की तैयारी कर रहा है। यदि सभापति यह पाते हैं कि सांसदों का यह समूह वास्तव में दो-तिहाई का आंकड़ा पूरा करता है, तो भाजपा में उनका विलय मान्य हो जाएगा।
लेकिन अगर हस्ताक्षर या संख्या बल में कोई भी गड़बड़ी पाई गई, तो बागी सांसदों की सदस्यता जा सकती है और उन्हें दोबारा चुनाव लड़ना पड़ सकता है। 'आप' के लिए चुनौती यह है कि वह अपने बचे हुए 3 सांसदों को एकजुट रखे और बागियों में से किसी एक को 'घर वापसी' के लिए मनाए, ताकि इस पूरे विलय को अवैध घोषित कराया जा सके।
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