भले कावेरी सूखी हो लेकिन विधानसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु में धन वर्षा जमकर हुई। आज मतदान से पहले तक राज्य भर से जिस तरह नकद और अन्य प्रलोभनों के वितरण की खबरें सामने आईं, उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के पश्चिमी और दक्षिणी जिलों, विशेष रूप से कोयंबटूर, तिरुपुर और नीलगिरि क्षेत्रों से यह खबरें आईं कि मतदाताओं को एक हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक प्रति वोट दिए जा रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में यह राशि छह हजार रुपये तक पहुंचने की भी बात कही गई। नकद के साथ-साथ कूपन और अन्य प्रकार के प्रलोभन भी बांटे गए। यह वितरण प्रायः देर रात या भोर के समय किया गया ताकि निगरानी से बचा जा सके।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, स्थानीय लोगों ने खुलकर बताया कि चुनाव उनके लिए अतिरिक्त आय का अवसर बन गया है। एक व्यक्ति ने बताया कि उसके परिवार के पांच सदस्यों को एक दल द्वारा प्रति वोट पंद्रह सौ रुपये दिए गए, जिससे कुल सात हजार पांच सौ रुपये मिले। कई लोग तो अपने कार्यस्थल से अपने गांव केवल इस उद्देश्य से लौटे कि उन्हें यह राशि मिल सके। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि महंगाई और आर्थिक दबाव के बीच मतदाता इस तरह के प्रलोभनों को स्वीकार करने के लिए मजबूर या तैयार हैं।
हालांकि प्रशासन ने बड़े पैमाने पर जांच अभियान चलाया और नकद, सोना, शराब तथा नशीले पदार्थों सहित कुल बारह सौ बासठ करोड़ रुपये से अधिक की जब्ती की, फिर भी इस अवैध वितरण को पूरी तरह रोकना संभव नहीं हो सका। केवल नकद के रूप में ही पांच सौ तैंतालीस करोड़ रुपये जब्त किए गए। इसके अलावा विभिन्न उल्लंघनों के संबंध में 163 मामले दर्ज किए गए और सोशल मीडिया मंचों पर दो हजार एक सौ अस्सी से अधिक सामग्री हटाई गईं।
इन सबके बावजूद पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर खुलेआम धन वितरण के प्रमाण जुटाए। एक गैर सरकारी संगठन ने तो चुनाव आयोग को पत्र लिखकर अलंगुलम, मायलापुर और तिरुमंगलम में चुनाव स्थगित करने की मांग तक कर दी। संगठन का कहना था कि स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद आयोग की ओर से पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई।
यही नहीं, मतदान के दिन एक और गंभीर समस्या सामने आई, जब हजारों मतदाता अपने गृह नगर तक नहीं पहुंच सके। बस अड्डों पर भारी भीड़ रही और परिवहन व्यवस्था चरमरा गई। इसका मुख्य कारण यह रहा कि चुनाव ड्यूटी के लिए बड़ी संख्या में बसों और वाहनों को अधिग्रहित कर लिया गया, जिससे सामान्य सेवाएं प्रभावित हुईं। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की और मतदान समय बढ़ाने की मांग भी उठी, लेकिन इस पर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
साथ ही मतदाता सूची से नाम गायब होने की समस्या ने भी कई लोगों को मतदान से वंचित कर दिया। कई मतदाताओं ने समय पर आवेदन करने और सत्यापन होने के बावजूद मतदान केंद्र पर पहुंचने पर अपना नाम सूची में नहीं पाया। कुछ मामलों में परिवार के एक सदस्य का नाम सूची में था, जबकि दूसरे का नहीं।
कुल मिलाकर, तमिलनाडु का यह चुनाव कई विरोधाभासों से भरा नजर आता है। एक ओर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए व्यापक तैयारियां और सख्ती दिखाई गई, तो दूसरी ओर नकद वितरण, परिवहन अव्यवस्था और मतदाता सूची की खामियों ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन मुद्दों पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचा जा सकेगा।
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