अपना देश किस तरह से अलग-अलग सेक्टर्स में ऐसे काम कर रहा है जिसकी जानकारी आप तक कम आ पाती है। लेकिन दुनिया भर में उन सेक्टर्स में भारत का दबदबा साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। भारत इस मामले में अमेरिका, चाइना, यूरोप हर जगह अपना दम दिखा रहा है और जबरदस्त लाभ कमा रहा है और उस उद्योग का उस सेक्टर का विस्तार कर रहा है। आज भारत के सी फूड सेक्टर की जहां भारत ने इस फाइनेंसियल ईयर में जबरदस्त दबदबा दिखाने का काम किया है। ये जो रिकॉर्ड तोड़ सफलता मिली है। वैश्विक चुनौतियों का सामना जिस तरह से भारत ने किया है। इसको जरा समझाते हैं आपको। वित्त वर्ष जो है एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ है। समुद्री उत्पाद निकास निर्यात विकास प्राधिकरण ने हालिया आंकड़ों में यह स्पष्ट किया है कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और व्यापारिक बाधाओं के बावजूद भारतीय समुद्री भोजन यानी कि सी फूड दुनिया भर में अपनी दम दिखा रहा है। भारत ने साल में 72325.82 करोड़ यानी कि 8.28 अरब डॉलर का रिकॉर्ड निर्यात कर अपनी ताकत दिखाई है।
बीते 5 वर्षों में लगातार भारत इसमें बढ़ने की दिशा में है। कोविड काल ने कैसे हिट किया था पूरी दुनिया को। 2020-21 के दौरान जो है वैश्विक लॉकडाउन लगा। लॉजिस्टिक की समस्याएं आई तो निर्यात में थोड़ी सुस्ती आई और उस समय यह निर्यात तकरीबन ₹43,000 करोड़ का रहा। तेजी से वापसी होती है 21-22 में। 22-23 में वैश्विक बाजार खुल जाते हैं। भारत ने जबरदस्त वापसी की। 22-23 में भारत ने पहली बार 8 अरब डॉलर के करीब पहुंचने का प्रयास किया और बीते 5 वर्षों में भारत ने पारंपरिक मछली पकड़ने के बजाय एक्वाकल्चर यानी कि झिंगा पालन पर ध्यान केंद्रित किया है। आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सके। 2020 में जहां निर्यात करीब 12 से 13 लाख मेट्रिक टन था वो आज बढ़कर तकरीबन 20 लाख मेट्रिक टन है। यानी कि मात्रा के हिसाब से देखा जाए तो तकरीबन तकरीबन 50% का ग्रोथ दिखाई पड़ता है। एक तो अमेरिकी टेरिफ भी लगा। तमाम तरह के दबाव बने। लेकिन उसके बावजूद भी भारत रुका नहीं और भारत ने जो है अमेरिका जो है भारत के झींगे का सबसे बड़ा खरीदार रहा है।
इस साल के आंकड़े और टेरिफ का असर जो है वो दिख रहा है थोड़ा लेकिन उसके बावजूद भी जो है अमेरिका के बाजार में भारत के निर्यात की मात्रा जो है अह 19.8% रही और मूल्य 14.5% का जो है इसमें गिरावट आया। भारतीय वित्तीय निर्यातकों के लिए टेरिफ के कारण एक थोड़ा ये झटका रहा क्योंकि अमेरिका जो है भारत के कुल निर्यात का एक बड़ा सेक्टर है लेकिन भारत ने इसके बावजूद भी अपनी ग्रोथ बनाए रखी। मार्केट का डायवर्सिफिकेशन जिस तरीके से भारत ने किया उसने भारत को एक बड़ी सफलता दिलाई। इसके आंकड़े अगर हम आपको बताएं तो देखिए अमेरिका के अलावा भारत ने चीन और यूरोप पर बड़ा जोर दिया। अमेरिका की गिरावट को भारत ने अन्य क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन करके तब्दील कर लिया। कैसे? तो चाइना में इसकी भारतीय उत्पाद समुद्री उत्पाद की मांग जो है वो जबरदस्त उछाल देखने को मिली। 22.7% की वृद्धि हुई। चीन अब अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा ठिकाना बना।
यूरोपीय संघ की अगर बात करें तो भारतीय गुणवत्ता मानकों पर भरोसा इन्होंने जताया है। वहां के निर्यात में 37.9% भारी बढ़त हुई है भारत की तरफ से। वहीं वियतना, थाईलैंड जैसे देश जो हैं वो भारत देशों को भी भारत ने 36.1% अधिक माल बेचा है। और सबसे बड़ी बात है कि भारत की इस सफलता का जो असली हीरो है वो फ्रोजन झिंगा रहा है। कुल 72335 325 करोड़ की कमाई में 47973 करोड़ सिर्फ झीगा से आए हैं। जो आंकड़े हैं। भारत का वन्नामाई झीगा अपनी गुणवत्ता के लिए दुनिया दुनिया भर में जाना जाता है और अब भारत जो है फ्रोजन मछली स्क्विड और कटल फिश के क्षेत्र में भी अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। वैश्विक रैंकिंग और कंपटीशन देखें तो समुद्री खाद्य निर्यात में भारत दुनिया के टॉप पांच देशों में बड़ी मजबूती से खड़ा है। भारत जो है झिंगा निर्यात में दुनिया में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहता है क्योंकि इसके ऊपर इक्वाडोर और वियतनाम से उसे कड़ी टक्कर मिलती है।
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आसमान से आने वाले खतरे चाहे वो फाइटर जेट हो, मिसाइल हो या स्टिल्ट तकनीक से लैस दुश्मन के हथियार। इन सबका जवाब अब भारत ने अपने ही घर में तैयार कर लिया है और दिलचस्प बात यह है कि यह सिस्टम ना सिर्फ ताकतवर है बल्कि लागत के मामले में भी चौंकाने वाला है। जिस सिस्टम को दुनिया S400 एयर डिफेंस सिस्टम के नाम से जानती है उसी के मुकाबले भारत ने अब अपना स्वदेशी विकल्प तैयार कर लिया है जिसका नाम है प्रोजेक्ट कुश। दावा है कि यह सिस्टम लगभग आधी लागत में तैयार हुआ है और कई मामलों में ज्यादा लचीला और प्रभावी भी है। सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय वायुसेना ने इस पर भरोसा जताते हुए एक साथ पांच स्क्वाडन का आर्डर दे दिया है। इस पूरे ऑर्डर की कीमत करीब ₹21,700 करोड़ है। अगर तुलना करें तो S400 के पांच स्क्वाडन के लिए भारत को करीब ₹45,000 करोड़ खर्च करने पड़े थे। यानी कीमत आधी लेकिन क्षमता में कोई समझौता नहीं।
प्रोजेक्ट कुछ आखिर है क्या?
यह एक मल्टीलेयर एयर डिफेंस सिस्टम है। यानी अलग-अलग दूरी पर आने वाले खतरों को रोकने के लिए इसमें तीन तरह की मिसाइलें शामिल है। M1, M2 और M3। M1 इंटरसेप्टर करीब 150 कि.मी. तक और M2 इंटरसेप्टर करीब 250 कि.मी. तक। M3 इंटरसेप्टर 350 से 400 कि.मी. तक यानी दुश्मन चाहे दूर हो या नजदीक हो। यह हर दूरी पर उसे रोकने की तैयारी कर लेता है। इन मिसाइलों की कीमत में भी एक बड़ा फैक्टर है। जहां S400 की एक मिसाइल करीब ₹100 करोड़ तक की पड़ती है, तो वहीं प्रोजेक्ट कुश की मिसाइलें लगभग 40 से ₹50 करोड़ के बीच है। लेकिन असली ताकत सिर्फ लागत में नहीं बल्कि नियंत्रण में है। इसका मिशन एल्गोरिदम भारत के पास है। कोर सॉफ्टवेयर भी भारत के पास है और बाहरी किल स्विच का खतरा नहीं है। यानी अगर कभी हालात बदलते हैं तो भारत को किसी दूसरे देश की तरफ देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी और यही वो अंतर है जो इसे S400 से थोड़ा अलग बनाता है। S400 जैसे सिस्टम में सोर्स कोड पूरी तरह सप्लायर देश के पास रहता है।
यह इतना खास क्यों माना जा रहा है?
अपडेट मेंटेनेंस और बदलाव सबके लिए उसी पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन प्रोजेक्ट कुछ में पूरा नियंत्रण भारत के पास है और यही आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। इसमें स्मार्ट अपडेट सिस्टम है। यानी सिस्टम समय के साथ खुद को अपडेट कर सकता है। अब बात करते हैं इसके नेटवर्क और इंटीग्रेशन की। प्रोजेक्ट कुश को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि यह भारतीय वायुसेना के मौजूदा और भविष्य के सिस्टम के साथ आसानी से काम कर सके। अगर इसके नेटवर्क इंटीग्रेशन इंटीग्रेटेड एयर कमांड कंट्रोल की बात करें तो मेने अबक भविष्य के अबवॉक प्लेटफार्म Tejas MK2 ग्राउंड रडार नेटवर्क यानी पूरा सिस्टम एक नेटवर्क से जुड़ा होगा।
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