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Vishwakhabram: Giorgia Meloni पर इतना क्यों भड़के हुए हैं Trump? कौन है वो जिसने डाली है इस दोस्ती में दरार?

छह महीने पहले शर्म अल शेख के मंच पर खड़ी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस राजनीतिक रिश्ते को वह अपनी सबसे बड़ी ताकत समझ रही हैं, वही उनके लिए सबसे बड़ा बोझ बन जाएगा। उस मंच पर डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी तारीफों के पुल बांधे, उन्हें सुंदर बताया, लेकिन वही ट्रंप आज उनके साहस पर सवाल उठा रहे हैं। यह कहानी सिर्फ दो नेताओं के टकराव की नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति, युद्ध की भयावहता और जनता की बेचैनी की कहानी है।

हम आपको बता दें कि ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता शुरुआत से ही विचारधारा पर टिका था। दोनों राष्ट्रवादी राजनीति के चेहरे रहे, दोनों ने सख्त प्रवासन नीतियों का समर्थन किया और दोनों खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश करते रहे। मेलोनी ने तो ट्रंप के करीब आने के लिए हर संभव प्रयास किया। वह उनके फ्लोरिडा स्थित आवास तक गईं और यूरोप की इकलौती नेता बनीं जो उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। लेकिन राजनीति में रिश्ते उतनी ही तेजी से टूटते हैं जितनी तेजी से बनते हैं।

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ईरान युद्ध ने इस रिश्ते की असलियत सामने ला दी। ट्रंप चाहते थे कि इटली अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध में खुले तौर पर शामिल हो, लेकिन मेलोनी ने साफ इंकार कर दिया। यही वह मोड़ था जहां से ट्रंप का रवैया बदल गया। उन्होंने मेलोनी को कायर तक कह दिया और आरोप लगाया कि वह ईरान के परमाणु खतरे को गंभीरता से नहीं ले रहीं। यह हमला सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत भी था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब ट्रंप ने पोप लियो पर हमला किया और उन्हें कमजोर बताया, तब मेलोनी ने इसे अस्वीकार्य कहा। यह बयान भले ही दबाव में दिया गया हो, लेकिन इसका असर गहरा था। इटली एक ऐसा देश है जहां पोप का सम्मान बेहद गहरा है और जनता युद्ध के खिलाफ खड़ी रहती है। ऐसे में मेलोनी ने पहली बार खुलकर ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाई।

विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव मेलोनी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हाल ही में हुए जनमत संग्रह में उनकी सरकार को करारी हार मिली थी। जनता में असंतोष बढ़ रहा था और ईरान युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। ऐसे समय में ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। इसीलिए मेलोनी ने धीरे धीरे अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। उन्होंने ईरान युद्ध में भागीदारी से इंकार किया, सिसिली के सैन्य अड्डे के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी और इजराइल के साथ रक्षा समझौते को भी रोक दिया। यह सब संकेत हैं कि वह अब खुद को एक संतुलित और स्वतंत्र नेता के रूप में पेश करना चाहती हैं।

लेकिन यह बदलाव आसान नहीं है। मेलोनी अभी भी एक पतली रस्सी पर चल रही हैं। एक तरफ उन्हें अमेरिका के साथ अपने पुराने रिश्ते को पूरी तरह तोड़ना नहीं है, दूसरी तरफ उन्हें घरेलू राजनीति में अपनी छवि सुधारनी है। यही वजह है कि उनके बयान कई बार संतुलित और अस्पष्ट नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है हंगरी के नेता विक्टर ओर्बान की हार। ओर्बान ट्रंप के करीबी सहयोगी माने जाते थे। उनकी हार ने मेलोनी को यह संकेत दिया कि ट्रंप के साथ खड़े रहना अब राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। देखा जाये तो इटली की जनता की प्राथमिकताएं साफ हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा अपने घरेलू मुद्दों की चिंता है। बढ़ती गैस की कीमतें, महंगाई और आर्थिक दबाव उनके लिए असली मुद्दे हैं। ऐसे में अगर मेलोनी सिर्फ वैश्विक मंच पर बयान देती रहें और घरेलू समस्याओं का समाधान न कर पाएं, तो उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
 
हालांकि अभी भी उनकी पार्टी और उनका नेतृत्व चुनावी सर्वेक्षणों में आगे है, लेकिन यह बढ़त स्थायी नहीं है। इटली में विपक्ष भले ही बिखरा हुआ हो, लेकिन अगर उसने एक मजबूत विकल्प पेश कर दिया तो समीकरण बदल सकते हैं।

देखा जाये तो यह साफ है कि मेलोनी एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर खड़ी हैं। ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए एक रणनीतिक कदम है, लेकिन असली चुनौती घरेलू मोर्चे पर है। अगर वह जनता की आर्थिक परेशानियों को दूर नहीं कर पाईं, तो कोई भी चाल उनकी राजनीति को बचा नहीं पाएगी। बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम एक कड़वा सच उजागर करता है। वैश्विक राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं। और जब हित टकराते हैं, तो सबसे मजबूत रिश्ते भी टूट जाते हैं। मेलोनी और ट्रंप की कहानी इसका ताजा उदाहरण है।

-नीरज कुमार दुबे

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