भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रदोषकाल के समय हुआ था। पौरागिक ग्रंथों में बताया गया है कि पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पांचवें पुत्र का नाम 'राम' ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र 'परशु' प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अवतार होने के साथ ही ब्राह्मण जाति के कुल गुरु भी हैं इसलिए इनकी जयंती देशभर में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।
भगवान परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे, पिता की आज्ञा से इन्होंने अपनी माता का सिर काट डाला था, लेकिन पुनः पिता के आशीर्वाद से इनकी माता की स्थिति यथावत हो गई। दरअसल कथाओं के अनुसार हुआ यह था कि एक बार माता रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं, संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी आसक्त हो गईं, किंतु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशित होकर अपने पांचों पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किंतु परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के बंधकर वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया।
क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया, वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे– पहला, अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा, अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा। तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो।
श्रीजमदग्नि जी के आश्रम में एक कामधेनु गौ थी, जिसकी अलौकिक ऐश्वर्य शक्ति को देखकर कार्तवीर्यार्जुन उसे प्राप्त करने के लिए दुराग्रह करने लगा था। अंत में उसने गौ को हासिल करने के लिए बल का प्रयोग किया और उसे माहिष्मती ले आया। किंतु जब परशुराम जी को यह बात विदित हुई तो उन्होंने कार्तवीर्यार्जुन तथा उसकी सारी सेना का विनाश कर डाला। जिस पर पिता ने परशुराम जी के इस चक्रवर्ती सम्राट के वध को ब्रह्म हत्या के समान बताते हुए उन्हें तीर्थ सेवन की आज्ञा दी। वे तीर्थ यात्रा पर चले गये, वापस आने पर माता−पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
दूसरी ओर सहस्त्रार्जुन के वध से उसके पुत्रों के मन में प्रतिशोध की आग जल रही थी। एक दिन अवसर पाकर उन्होंने छद्म वेष में आश्रम आकर जमदग्नि का सिर काट डाला और उसे लेकर भाग निकले। जब परशुराम जी को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वे अत्यन्त क्रोधावेश में आग बबूला हो उठे और पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर देने की प्रतिज्ञा कर ली तथा 21 बार घूम−घूमकर पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया। फिर पिता के सिर को धड़ से जोड़कर कुरुक्षेत्र में अन्त्येष्टि संस्कार किया। पितृगणों ने इन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हीं की आज्ञा से इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी प्रजापति कश्यपजी को दान में दे दी और महेन्द्राचल पर तपस्या करने चले गये।
सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव−धनुष भंग किये जाने पर वह महेन्द्राचल से शीघ्रतापूर्वक जनकपुर पहुंचे, किंतु इनका तेज श्रीराम में प्रविष्ट हो गया और ये अपना वैष्णव धनु उन्हें देकर पुनः तपस्या के लिए महेन्द्राचल वापस लौट गये। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम के क्रोध का सामना गणेश जी को भी करना पड़ा था। दरअसल उन्होंने परशुराम जी को शिव दर्शन से रोक दिया था। क्रोधित परशुराम जी ने उन पर परशु से प्रहार किया तो उनका एक दांत नष्ट हो गया। इसी के बाद से गणेश जी एकदंत कहलाये।
भगवान परशुराम चिरजीवी हैं। ये अपने साधकों−उपासकों तथा अधिकारी महापुरुषों को दर्शन देते हैं। इनकी साधना−उपासना से भक्तों का कल्याण होता है। पौराणिक मान्यता है कि वे आज भी मन्दराचल पर्वत पर तपस्यारत हैं। ऋषि संतान परशुराम ने अपनी प्रभुता व श्रेष्ठवीरता की आर्य संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी। शैव दर्शन में उनका अद्भुत उल्लेख है जो सभी शैव सम्प्रदाय के साधकों में स्तुत्य व परम स्मरणीय है। देश में अनेक स्थानों पर भगवान जमदग्नि जी के तपस्या स्थल एवं आश्रम हैं, माता रेणुका जी के अनेक क्षत्र हैं, प्रायः रेणुका माता के मंदिर में अथवा स्वतंत्र रूप से परशुराम जी के अनेक मंदिर भारत भर में हैं, जहां उनकी शांत, मनोरम तथा उग्र रूप मूर्ति के दर्शन होते हैं।
परशुराम दरअसल 'राम' के रूप में सत्य के संस्करण हैं, इसलिए नैतिक-युक्ति का अवतरण हैं। भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन के लिए अपने ही नियम बना रखे थे। परशुराम जयंती के शुभ दिन उनके चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरु हैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरुष हैं। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवं रक्षा की है।
शुभा दुबे
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अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। कहा जाता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी आदि कार्य किए जा सकते हैं।
इस दिन पितरों को किया गया तर्पण या किसी भी प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करने वाला है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि यदि इस दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सद्गुण प्रदान करते हैं।
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित की जाती है। इसके बाद फल, फूल, बरतन तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान के रूप में दिये जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।
यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खडाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस तिथि का कितना महत्व है यह इस बात से भी पता चलता है कि सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।
यह माना जाता है कि इस दिन ख़रीदा गया सोना कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह दिन सौभाग्य और सफलता का सूचक है।
अक्षय तृतीया व्रत कथा
अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, 'राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−
प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई। जैसा कि भगवान श्री विष्णु ने कहा था, मथुरा जाकर राजा ने बड़ी ही श्रद्धा के साथ वैसा ही किया और इस व्रत के प्रभाव से वह शीघ्र ही अपने पैरों को प्राप्त कर सका।
- शुभा दुबे
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