सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF) के अधिकारियों के लिए अपनी तरह का पहला लीडरशिप कॉन्फ्रेंस देश की राजधानी में होने जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्रों की अध्यक्षता करने की उम्मीद है। मई में होने वाली इस उच्च-स्तरीय बैठक का मकसद भारत की तेज़ी से बदलती होमलैंड सिक्योरिटी स्थिति के संदर्भ में आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियों से निपटना है। न्यूज़ एजेंसी ANI ने इस योजना से जुड़े अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी है।
इस दो-दिवसीय कार्यक्रम का उद्देश्य CAPF के वरिष्ठ नेतृत्व को एक साथ लाना है, ताकि गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले इन बलों के बीच एकजुट योजना और तालमेल की ज़रूरत को पूरा किया जा सके। अधिकारियों ने बताया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) इस कार्यक्रम के लॉजिस्टिक्स का जिम्मा संभाल रहा है और हो सकता है कि वह इस बैठक को एक सालाना कार्यक्रम का रूप दे दे, ठीक वैसे ही जैसे पुलिस महानिदेशकों और पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक होती है। जानकारी के अनुसार, भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के साथ-साथ CAPF कैडर के शीर्ष अधिकारियों के भी इसमें शामिल होने की उम्मीद है। अंतिम एजेंडा अभी भी तैयार किया जा रहा है, और चर्चाओं का मुख्य विषय नीति का क्रियान्वयन, परिचालन संबंधी चुनौतियाँ और उभरते आंतरिक सुरक्षा खतरों से निपटने की रणनीतियाँ होने की संभावना है।
उच्च-स्तरीय उपस्थिति की उम्मीद
प्रधानमंत्री के अलावा, इस कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और प्रमुख खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों के शामिल होने की उम्मीद है। अधिकारियों ने बताया कि इसका उद्देश्य एक ऐसा एकीकृत मंच तैयार करना है, जो CAPF के प्रयासों को राज्य पुलिस बलों और अन्य सुरक्षा निकायों के साथ तालमेल बिठाने में मदद करे, जिससे वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया दे सकें।
पांच बल, एक मंच
भारत के पांच प्रमुख CAPF में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) शामिल हैं; ये सभी मिलकर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में लगभग 10 लाख कर्मियों का योगदान देते हैं। इनकी जिम्मेदारियों में सीमा सुरक्षा, VIP सुरक्षा, उग्रवाद-रोधी अभियान, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और राज्यों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहायता करना शामिल है।
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि ‘इंडी’ गठबंधन के सदस्यों ने अगर, मगर, किंतु, परंतु का उपयोग करके महिला आरक्षण का विरोध किया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि विपक्ष विधेयक के क्रियान्वयन के तरीके का नहीं, महिला आरक्षण का विरोध कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जो परिसीमन का विरोध कर रहे हैं वे एससी-एसटी सीटों में बढ़ोतरी का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन तीन बिलों का उद्देश्य है...पहला: महिला सशक्तिकरण करने वाले संविधान सुधार को समयबद्ध तरीके से लागू कर 2029 का चुनाव महिला आरक्षण के साथ कराया जाए। दूसरा: एक व्यक्ति — एक वोट — एक मूल्य... यह सिद्धांत जो हमारे संविधान के मूल में है, जिसे संविधान सभा ने तय किया था, उस संविधान की स्पिरिट को लागू किया जाए।
शाह ने कहा कि कई सारे सदस्यों ने अनेक प्रकार की आशंकाएं व्यक्त कीं कि परिसीमन अभी क्यों लाया जाए? तो मैं बता दूं कि जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम आया है, उसमें जिक्र है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के बाद जो परिसीमन होगा, उसमें महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। अब ये कहते हैं कि बिल लाते समय ऐसा जिक्र क्यों किया गया? यह हमने नहीं किया। 1971 में इंदिरा जी की सरकार थी, तब वह ऐसा निर्धारित करके गई थीं, जिसके कारण हमें इसका जिक्र करना पड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में समय-समय पर परिसीमन का प्रावधान किया गया है। परिसीमन से ही SC और ST जिसकी संख्या बढ़ती है, उसकी सीटें बढ़ने का भी प्रावधान है। एक प्रकार से जो परिसीमन का विरोध कर रहे हैं, वह SC और ST सीटों की बढ़ोतरी का भी विरोध कर रहे हैं।
शाह ने कहा कि कई सारे सदस्यों ने अनेक प्रकार की आशंकाएं व्यक्त कीं कि परिसीमन अभी क्यों लाया जाए? तो मैं बता दूं कि जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम आया है, उसमें जिक्र है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के बाद जो परिसीमन होगा, उसमें महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। अब ये कहते हैं कि बिल लाते समय ऐसा जिक्र क्यों किया गया? यह हमने नहीं किया। 1971 में इंदिरा गांधी की सरकार थी, तब वे इसे फ्रीज करके गई थी, वह फ्रीज की गई सीटों की संख्या उठाते हैं तभी नारी शक्ति वंदन अधिनियम का क्रियान्वयन होता है इसलिए हम इसे लेकर आए।
उन्होंने कहा कि सबसे पहले 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की सरकार ने परिसीमन विधेयक लाकर सीटों को 525 से बढ़ाकर 545 किया और फिर इसे फ्रीज कर दिया गया। 1976 में सत्ता बचाने के लिए आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन द्वारा परिसीमन पर रोक लगा दी गई। इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं, उन्होंने कानून लाकर परिसीमन पर रोक लगाई, लेकिन आज ये कितने शक्तिशाली हैं कि विपक्ष में बैठकर परिसीमन पर रोक लगाना चाह रहे हैं। उस वक्त भी कांग्रेस ने ही परिसीमन से देश की जनता को वंचित रखा था और आज भी कांग्रेस ही परिसीमन से देश की जनता को वंचित कर रही है। 1976 में इस देश की आबादी 56.79 करोड़ थी, और आज 140 करोड़ है। 56.79 करोड़ की आबादी में जितने सांसद थे, उतने ही 140 करोड़ की आबादी में भी रखना, ये इनका (विपक्ष) मानना है।
गृह मंत्री ने कहा कि कुछ सदस्यों ने सवाल उठाया कि जनगणना समय पर क्यों नहीं हुई। सबको मालूम है कि 2021 में जनगणना होनी थी और 2021 में ही इस सदी की सबसे बड़ी महामारी, कोविड का संकट आया, जिसके कारण जनगणना संभव नहीं हो पाई। कोविड संकट समाप्त होने के बाद देश को इससे उभरने में काफी समय लगा। जब 2024 में जनगणना की शुरुआत हुई, तब कुछ दलों ने उचित ही मांग की कि जाति के आधार पर जनगणना करनी चाहिए। सरकार ने अनेक दलों, जाति समूहों, राज्य सरकारों और कई सामाजिक समूहों के साथ चर्चा की और निर्णय किया कि हम जाति जनगणना कराएंगे। और इस निर्णय के बाद अब जनगणना हो रही है।
उन्होंने कहा कि मैं 140 करोड़ जनता को स्पष्ट करना चाहता हूं कि नरेन्द्र मोदी जी की कैबिनेट ने जाति जनगणना कराने का जो निर्णय लिया है, वह कैबिनेट प्रस्ताव में 2026 की जनगणना को जाति के साथ कराने का निर्णय है। जब से यह बिल आया है, तब से विपक्ष ने कुछ भ्रांतियां फैलाना शुरू किया है कि जाति जनगणना को टालने के लिए सरकार संविधान संशोधन लेकर आई है। मैं बताना चाहता हूं कि तीन माह पहले ही हम जाति जनगणना का पूरा टाइम टेबल घोषित कर चुके हैं, टालने का सवाल ही नहीं है। जाति जनगणना शुरू हो चुकी है, उसका पहला चरण चल रहा है। दूसरा: दक्षिण के साथ अन्याय हो जाएगा। कल मुझे थोड़ा थय लगा कि दक्षिण बनाम उत्तर का नैरेटिव नहीं होना चाहिए। मैं स्पष्ट कर देता हूं कि दक्षिण के राज्यों का इस सदन पर उतना ही अधिकार है, जितना उत्तर के राज्यों का है। इस देश को उत्तर-दक्षिण के नैरेटिव से अलग नहीं करना चाहिए।
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