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SECL Grade C Various Post Online Form 2026 – Start

SECL Grade C Various Post Recruitment 2026 Author: Sarkari Exam Team Tag: 10th Pass Job Short Information : South Eastern Coalfield Limited (SECL) has released the notification for the post of Mining Sirdar, Surveyor & Assistant Foreman Grade C. This recruitment has been issued for 1055 posts. Online applying process for SECL Grade C Various Post ...

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युद्ध के माहौल में ऊर्जा की मांग को पूरा करना बड़ी चुनौती!

देश व दुनिया के नीति-निर्माता यह अच्छे से जानते हैं कि किसी भी देश की ऊर्जा प्रणाली उस देश के विकास की नींव होती है, लेकिन पिछले एक माह से भी अधिक समय से चल रहे ईरान अमेरिका व इज़रायल के भीषण युद्ध ने इस नींव को जबरदस्त ढंग से हिलाने का कार्य कर दिया है। अमेरिका-इज़रायल व ईरान के इस युद्ध ने पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा कटु सबक दे दिया है, इस युद्ध ने बता दिया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में किसी भी दूसरे देश पर बहुत ज्यादा ही निर्भर रहना आज के जबरदस्त प्रतियोगिता व व्यावसायिक दौर में ख़तरे से खाली नहीं है। इस युद्ध ने दिखा दिया है कि ऊर्जा के लिए किसी भी अन्य देश पर बहुत अधिक निर्भर रहना राष्ट्र के विकास से बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न कर सकता है। आज के युग में विकास के पहिए को अनवरत चलाने के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में विविधता अवश्य होनी चाहिए, देश को किसी भी एक तरह की ऊर्जा प्रणाली पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं होना चाहिए, ऊर्जा के क्षेत्र में हर समय विकल्प अवश्य उपलब्ध होने चाहिए। वैसे भी देखा जाएं तो ऊर्जा क्षेत्र में विविधता जोखिम को अवश्य कम करने का कार्य करती है।

इसलिए यह आवश्यक है कि युद्ध व किसी भी अन्य आपदा जैसी विषम परिस्थितियों में जीवन को सुचारू रूप है चलाने के लिए अपने प्यारे देश भारत में ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में तेज़ी से विविधता लाने की आवश्यकता है। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों की बात करें तो हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने 'ऊर्जा सांख्यिकी भारत 2026' से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किये हैं, जिसमें भारत के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हुए ऊर्जा संसाधनों के भंडार, उत्पादन, खपत और व्यापार के आंकड़े शामिल हैं। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (टीपीईएस) वित्त वर्ष 2024-25 में 2.95% बढ़कर 9,32,816 किलो टन तेल समतुल्य (केटीओई) तक पहुंच गई। रिपोर्ट देश में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में हो रही तीव्र वृद्धि को दर्शाती है, जोकि 31 मार्च, 2025 तक 47,04,043 मेगावाट तक पहुंच गई, जिसमें सौर ऊर्जा का कुल क्षमता का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा है, फिर पवन ऊर्जा और जलविद्युत परियोजनाएं हैं। इस रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता में भी जबरदस्त वृद्धि देखी गई है, जो 2016 में 90,134 मेगावाट से बढ़कर 2025 में 2,29,346 मेगावाट हो गई है, नवीकरणीय स्रोतों से बिजली उत्पादन वित्त वर्ष 2015-16 में 1,89,314 गीगावाट घंटे से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 4,16,823 गीगावाट घंटे तक हो गया है।

हालांकि इस रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश में कोयला आज भी ऊर्जा प्रदान का सबसे अहम स्रोत बना हुआ है, जिसके चलते ही कोयला की आपूर्ति वित्त वर्ष 2015-16 में 3,87,761 किलोटाइम ई.ई. से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 5,52,315 किलोटाइम ई.ई. हो गई है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा के अन्य स्रोतों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। देश में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जोकि वित्त वर्ष 2015-16 में 15,296 मेगाजूल प्रति व्यक्ति से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 18,096 मेगाजूल हो गई है। वहीं सभी क्षेत्रों में ऊर्जा की कुल अंतिम खपत (टीएफसी) में 30% से अधिक की वृद्धि हो गयी है, जोकि वित्त वर्ष 2024-25 में 6,08,578 केटीओई तक पहुंच गई, जोकि देश में औद्योगिक मांग और उपभोक्ता मांग में विस्तार का संकेत देती है। वैसे भी विकास की तेज गति के चलते भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा खपत करने वाला देश पहले से ही बन गया है और ऊर्जा जरूरतों में हर वर्ष 6.5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थिति में युद्ध के इस माहौल में जब ईरान के द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को बंद करके दुनिया की गैस व कच्चे तेल की सप्लाई को बड़े पैमाने पर बाधित किया गया है, उस दौर में ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू रूप से निरंतर बनायें रखने के भारत की नरेन्द्र मोदी की सरकार के कूटनीतिक प्रयास काबिले-तारीफ हैं।

इसे भी पढ़ें: गाजा और ईरान युद्ध के बाद अरब देशों का भरोसा अमेरिका से उठा, चीन-रूस पर बढ़ा

अमेरिका-इज़रायल व ईरान के इस युद्ध ने हमारे प्यारे देश के नीति-निर्माताओं को यह सबक दे दिया है कि ऊर्जा क्षेत्र में अब विविधता बेहद ही आवश्यक है, क्योंकि देश को फिर कभी युद्ध के दौर में होर्मुज जलडमरूमध्य संकट जैसे हालातों से गुजरना ना पड़े। देश को तेल व गैस के रिजर्व के साथ-साथ रणनीतिक भंडार बढ़ानें और विभिन्न प्रकार के स्रोतों से प्राप्त होने वाली बिजली के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत है। जिससे कि देश में फिर कभी भी युद्ध या किसी भी अन्य तरह की आपदा जैसे हालात में ऊर्जा संकट के बादल ना मंडराएं। वैसे भी हमें यह समझना होगा कि युद्ध या युद्ध जैसी उत्पन्न स्थितियां अब पूरी दुनिया में ऊर्जा की आपूर्ति और अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को तुरंत प्रभावित करने का कार्य करती हैं, युद्ध के प्रभाव से मंहगाई का विस्फोट होना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। जिस तरह से पिछले एक माह से अधिक समय से ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को बंद करके बैठा हुआ है, उससे पूरी दुनिया में लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल व गैस आदि का गंभीर संकट पैदा हो गया है, जिस वज़ह कुछ देशों  में लॉकडाउन तक लगने लग गया है।

वैसे भी अगर हम युद्ध के समय के हालातों पर ध्यान दें तो हमें यह बिल्कुल स्पष्ट नज़र आता है युद्ध के समय में ऊर्जा स्रोतों को निशाना बनाना दुश्मन देश का सबसे अहम लक्ष्य होता ही है, जिसके चलते ही तेल, गैस व बिजली आदि के बाधित होने का जबरदस्त खतरा बना रहता है, जिससे विभिन्न प्रकार की ऊर्जा के दामों में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाती है। दुनिया को वर्ष 1970 के दशक में भी युद्ध के चलते इस तरह के गंभीर ऊर्जा संकट से रूबरू होना पड़ा था। इसलिए हमारे नीति-निर्माताओं ने जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की तेज़ी से शुरुआत करते हुए विभिन्न घरेलू ऊर्जा स्रोतों का विकास तेज़ी से करना शुरू किया था। उन्होंने भारत में एथेनॉल, कोयला, जल, परमाणु, सौर व पवन ऊर्जा आदि की विविधता वाली एक बृहद ऊर्जा व्यवस्था को विकसित किया था। क्योंकि वह अच्छे से जानते हैं कि राष्ट्र के तेज़ गति से विकास के लिए एक ऐसी सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता है जोकि युद्ध या किसी भी अन्य प्रकार की आपदा जैसी बेहद विषम परिस्थितियों में भी ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने का कार्य निर्बाध रूप से करती रहे। 

इसी के चलते ही युद्ध के समय में कोयला व अन्य ऊर्जा स्रोतों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन परिवहन व्यवस्था में रुकावट होने के चलते कोयला, गैस व तेल आदि को उपभोक्ता के पास तक समय पर पहुंचाना बेहद ही चुनौतीपूर्ण व जोखिम भरा कार्य होता है, हर पल यह दुश्मन के निशाने पर बने रहते हैं। ऐसी स्थिति में परमाणु, जल, सौर व पवन ऊर्जा की अहमियत लोगों को समझ आती है। आज फिर युद्ध के चलते भारत सरकार के सामने देश की ऊर्जा प्रणाली को औद्योगिक क्षेत्र व लोगों की मांग के अनुरूप चलाने की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। क्योंकि भारत में अभी भी ऊर्जा पैदा करने के क्षेत्र में बहुत ज्यादा कार्य करने की आवश्यकता है। भारत अब भी ऊर्जा क्षेत्र की मांग को पूरा करने के लिए काफी हद तक दूसरे देशों से आयात पर निर्भर है। युद्ध के चलते भारत में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, वहीं खाड़ी देशों में युद्ध के चलते कच्चे तेल व गैस के उत्पादन में भारी कमी होने से वैश्विक स्तर पर तेल व गैस की कीमतें अब रोज़ाना बढ़ रही हैं।

भारत सरकार चाहे लाख दावे करें की कच्चा तेल व गैस की देश में विभिन्न देशों से आपूर्ति निर्बाध रूप से आपूर्ति जारी है, लेकिन कटु सत्य यह भी है कि मांग के अनुरूप तेल व गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ता जा रहा है। हालांकि नरेन्द्र मोदी सरकार विपरीत से विपरीत परिस्थितियों के बाद भी वैश्विक घटनाक्रमों से उत्पन्न कच्चे तेल व गैस की इस किल्लत की स्थिति को निरंतर संभालने के लिए धरातल पर लगातार ठोस प्रयास कर रही है। जिसके परिणामस्वरूप ही आज भारत के झंडे लगे हुए जहाज ईरान के शासकों के द्वारा दुनिया के अधिकांश देशों के लिए बंद किये गये होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग से कच्चा तेल व गैस लेकर के निकल रहे है़। भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार भी विभिन्न देशों से तेल व गैस खरीदकर के इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास लगातार कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप ही आज भी भारत के अधिकांश हिस्सों में ऊर्जा आपूर्ति धरातल पर निर्बाध रूप से चल रही है। लेकिन सरकार को अब देश में जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को तैयार करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। नवीकरणीय और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा साधन विकसित करने चाहिए, जिससे कि उपभोक्ता जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा प्रणाली के मुख्य स्रोतों सौर, पवन, जलविद्युत, भूतापीय और बायोमास आदि ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करें। वैसे भी यह देश व दुनिया में प्रचुर मात्रा के साथ-साथ, टिकाऊ और शून्य कार्बन उत्सर्जन करने वाली ऊर्जा प्रणाली होती है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति अनवरत चलती रहती है वहीं पर्यावरण अनुकूल प्रणाली होने के चलते ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में सहायक हैं। 

- दीपक कुमार त्यागी
अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

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