केप टाउन, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। दक्षिण अफ्रीका के विपक्षी नेता जूलियस मालेमा को गुरुवार को हथियार से जुड़े मामलों में पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई।
मालेमा जो वामपंथी पार्टी इकनॉमिक फ्रीडम फाइटर्स (ईएफएफ) के संस्थापक हैं, दक्षिण अफ्रीका के सबसे चर्चित नेताओं में से एक माने जाते हैं।
मालेमा को सजा गुरुवार सुबह ईस्टर्न केप प्रांत के कुगोम्पो सिटी (पहले ईस्ट लंदन) की मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनाई गई। कोर्ट के बाहर बड़ी स्क्रीन लगाई गई थीं, जहां सैकड़ों ईएफएफ समर्थक अपने नेता का फैसला सुनने के लिए इकट्ठा हुए थे।
यह मामला 28 जुलाई 2018 का है, जब मालेमा ने ईस्टर्न केप के एक रिहायशी इलाके मदंतसाने में ईएफएफ की एक रैली के दौरान एक सेमी-ऑटोमैटिक राइफल से हवा में फायरिंग की थी।
ईएफएफ ने इसे “जश्न का हिस्सा” बताया था, जो पार्टी की पांचवीं सालगिरह के मौके पर भीड़ को खुश करने के लिए किया गया था। इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ था।
मालेमा को पिछले साल अक्टूबर में पांच आरोपों में दोषी ठहराया गया था, जिनमें गैरकानूनी तरीके से हथियार रखना और सार्वजनिक जगह पर गोली चलाना शामिल है।
गुरुवार को उन्हें बाकी तीन मामलों में हर एक के लिए 20,000 रैंड का जुर्माना भी लगाया गया, यानी कुल 60,000 रैंड। अगर वे जुर्माना नहीं भरते, तो हर मामले में छह महीने की जेल भी काटनी होगी।
ईएफएफ ने कहा है कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी। अगर सभी अपील के बाद यह सजा बरकरार रहती है, तो मालेमा सांसद के तौर पर काम नहीं कर पाएंगे। मालेमा 2008 से 2012 तक अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) की यूथ लीग के अध्यक्ष रह चुके हैं।
2012 में पार्टी से निकाले जाने के बाद उन्होंने 2013 में ईएफएफ बनाई और 2014 में संसद के लिए चुने गए। 2024 के आम चुनाव के बाद ईएफएफ संसद की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन उसने सरकार में शामिल होने का फैसला नहीं किया।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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भारत का परमाणु सपना आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। दशकों की प्रतीक्षा, संघर्ष और वैज्ञानिक जिद के बाद कलपक्कम में तैयार प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा और सामरिक स्वतंत्रता का उद्घोष बन गया है। यह वह क्षण है जब भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को नई दिशा दे रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति भी मजबूत कर रहा है।
कलपक्कम में स्थापित यह रिएक्टर देश के तीन चरण वाले परमाणु कार्यक्रम का सबसे अहम पड़ाव है। भारत के पास यूरेनियम की सीमित उपलब्धता है, लेकिन थोरियम के विशाल भंडार मौजूद हैं। यही वजह है कि इस रिएक्टर का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह केवल बिजली पैदा नहीं करता, बल्कि प्लूटोनियम और भविष्य के लिए जरूरी ईंधन भी तैयार करता है। यही इसे साधारण रिएक्टर से अलग और रणनीतिक रूप से बेहद ताकतवर बनाता है।
इस रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी ब्रीडिंग क्षमता है, यानी यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक ईंधन पैदा करता है। इसमें मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का इस्तेमाल होता है और सोडियम कूलिंग प्रणाली इसे तेज और प्रभावी बनाती है। यह तकनीक भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जिनके पास उन्नत परमाणु क्षमता है।
लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा। यह परियोजना लंबे समय तक देरी, लागत वृद्धि और तकनीकी चुनौतियों से जूझती रही। शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक खर्च हुआ और समय सीमा भी कई बार आगे बढ़ी। फिर भी भारत ने हार नहीं मानी। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की लगातार मेहनत ने इस परियोजना को आखिरकार सफलता के करीब पहुंचा दिया।
यहां सबसे अहम सवाल यह है कि इस उपलब्धि का सामरिक महत्व क्या है। इसका जवाब सीधा है, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता। आज दुनिया ऊर्जा संकट, तेल और गैस की राजनीति और वैश्विक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत का यह कदम उसे बाहरी निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।
परमाणु ऊर्जा केवल बिजली का स्रोत नहीं है, यह शक्ति संतुलन का आधार भी है। जिन देशों के पास उन्नत परमाणु तकनीक होती है, वह वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। यह रिएक्टर भारत को उसी श्रेणी में पहुंचाने का माध्यम है। इससे न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि भारत की रक्षा और तकनीकी क्षमता भी मजबूत होगी।
रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह परियोजना भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। थोरियम आधारित कार्यक्रम भारत को आने वाले दशकों तक स्थायी ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है। इससे न केवल उद्योगों को बल मिलेगा, बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम भी सशक्त होंगे।
इसके अलावा, यह परियोजना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का भी प्रमाण है। यह संदेश साफ है कि भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक का निर्माता भी है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक ठोस कदम है, जो देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाएगा। हालांकि चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। सुरक्षा, अपशिष्ट प्रबंधन और लागत नियंत्रण जैसे मुद्दे अब भी अहम हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद यह उपलब्धि भारत के लिए ऐतिहासिक है।
देखा जाये तो यह रिएक्टर केवल एक मशीन नहीं, बल्कि एक विचार है, एक विजन है। यह उस भारत की तस्वीर पेश करता है जो अपने संसाधनों का सही उपयोग करके दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहा है। अगर यह परियोजना सफलतापूर्वक संचालित होती है, तो भारत आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेता बन सकता है। यह न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि उसे निर्यातक देश के रूप में भी स्थापित कर सकता है।
बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि कलपक्कम का यह रिएक्टर भारत के परमाणु सपने का वह पड़ाव है, जहां से भविष्य की दिशा तय होगी। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक रणनीतिक क्रांति है जो भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।
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