सिर्फ एआई न बनाएं, इसे किफायती भी बनाएं : ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के अधिकारी
नई दिल्ली, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी के संयुक्त निदेशक रवि शंकर प्रजापति ने गुरुवार को कहा कि भारत का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) रोडमैप किफायत और सुलभता के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।
वह यहां द डायलॉग के सहयोग से चिंतन रिसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक पॉलिसी राउंडटेबल में मुख्य भाषण दे रहे थे, जिसका शीर्षक भारत में एआई और सस्टेनेबिलिटी के लिए रोडमैप था।
प्रजापति ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की एआई महत्वाकांक्षाएं एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रही हैं, और देश अपनी विशाल डेटा उत्पादन क्षमताओं के कारण एक अद्वितीय स्थिति में है।
हालांकि, उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि भारत में एआई का भविष्य केवल एल्गोरिदम या एप्लिकेशन द्वारा ही नहीं, बल्कि उस इंफ्रास्ट्रक्चर द्वारा भी तय होगा जो बड़े पैमाने पर कंप्यूटेशन को शक्ति प्रदान करता है, जिसमें यह भी शामिल है कि इसे कैसे डिजाइन किया गया है, कहां स्थित है और इसे कैसे बनाए रखा जाता है।
इस चर्चा में नीति-निर्माता, विशेषज्ञ और उद्योग के हितधारक एक साथ आए, ताकि एआई के विकास को सस्टेनेबिलिटी के लक्ष्यों के साथ जोड़ने पर विचार-विमर्श किया जा सके। अपने शुरुआती संबोधन में, सीआरएफ में सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड एनर्जी ट्रांजिशन के सेंटर हेड डॉ. देबजीत पालित ने ऊर्जा और एआई के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा, भारत को एक ऐसा सद्गुण चक्र बनाना चाहिए, जहां एआई ऊर्जा दक्षता का समर्थन करे और बदले में, ऊर्जा प्रणालियां एआई के विस्तार का स्थायी रूप से समर्थन करें।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अंतर्गत इंडियाएआई में पॉलिसी की डीजीएम, श्रीप्रिया गोपालकृष्णन ने इस बात पर जोर दिया कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को एक आपस में जुड़े हुए इकोसिस्टम के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इसमें हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, डेटा, ऊर्जा और संस्थागत ढांचे शामिल हैं; इसलिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जो एआई की महत्वाकांक्षाओं को वास्तविक दुनिया के संसाधनों की सीमाओं से जोड़ सके।
राउंडटेबल में शामिल प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि डेटा सेंटर और एआई-तैयार कंप्यूटिंग क्षमता को केवल परिधीय डिजिटल संपत्ति के बजाय रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में माना जाना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर के ऊर्जा प्रणालियों, क्षेत्रीय विकास, डिजिटल संप्रभुता और दीर्घकालिक आर्थिक विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं।
साथ ही, विशेषज्ञों ने कई संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी इशारा किया, जो भारत की एआई यात्रा को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें कुछ ही महानगरों में डेटा सेंटरों का जमावड़ा, सीमित ग्रिड क्षमता, पानी की कमी, जलवायु संबंधी जोखिम और बढ़ती ऊर्जा मांग शामिल हैं। पूरे देश में एआई का स्थायी रूप से विस्तार करने के लिए इन बाधाओं को दूर करना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
--आईएएनएस
एससीएच
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
ईरान-अमेरिका वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका हकीकत से ज्यादा पीआर संदेश: रिपोर्ट
स्टॉकहोम, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। ईरान-अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत में पाकिस्तान ने एक मुख्य शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाई, असल में यह भू-राजनीतिक सच्चाई से ज्यादा एक पब्लिक रिलेशन संदेश था। ऐसा गुरुवाार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया।
इटली के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (आईएसपीआई) में लिखते हुए स्टॉकहोम सेंटर फॉर साउथ एशियन एंड इंडो-पैसिफिक अफेयर्स (एससीएसए-आईपीए) के प्रमुख जगन्नाथ पांडा ने कहा कि पाकिस्तान ने भले ही संदेश पहुंचाने या बातचीत को आसान बनाने में मदद की हो, लेकिन उसने इस प्रक्रिया के नतीजे को तय नहीं किया।
उन्होंने लिखा, “इस्लामाबाद की असली चुनौती अभी भी बनी हुई है: कोई भी देश तब तक टिकाऊ तरीके से खुद को शांति का गारंटर नहीं बता सकता जब तक उसके अंदर आतंकवाद, सुरक्षा नीति में दोहरे मापदंड और लगातार घरेलू अस्थिरता जैसी समस्याएं मौजूद हैं। जब तक ये बुनियादी समस्याएं हल नहीं होतीं, पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलताएं इतिहास से ज्यादा सुर्खियों में ही बड़ी लगेंगी।”
उन्होंने बताया कि असल में, ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच मौजूदा संघर्ष-विराम को अंततः हार्ड पावर (सैन्य शक्ति) की गणनाओं, प्रतिरोध की सीमाओं, ऊर्जा से जुड़े जोखिमों और बड़ी ताकतों के संदेशों ने ही आकार दिया है।
उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ने रास्ते जरूर खोले, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वही इस सीजफायर का मुख्य निर्माता बन गया। असल में बड़ी शक्तियां जहां भी संभव हो, संपर्क के रास्ते ढूंढ रही थीं, और पाकिस्तान उनमें से सिर्फ एक माध्यम था।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पाकिस्तान के शांति मध्यस्थ बनने पर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि उसका आतंकवाद और शांति से जुड़ा भरोसे का पुराना मुद्दा है।
पांडा ने लिखा, “कई दशकों से पाकिस्तान पर आरोप लगते रहे हैं कि वह रणनीतिक फायदे के हिसाब से आतंकवादी समूहों को ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ में बांटता है। भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ काम करने वाले आतंकी नेटवर्क ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को लगातार नुकसान पहुंचाया है। और जब खुद पाकिस्तान आतंकवाद से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ, तब भी बाहरी देश उसके चयनात्मक रवैये को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुए।”
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते भी हमेशा स्थिर नहीं रहे हैं। सीमा तनाव, बलूच क्षेत्रों में उग्रवाद, सांप्रदायिक मुद्दे और क्षेत्रीय गठबंधनों की प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों के संबंधों को कई बार तनावपूर्ण बनाया है। इसलिए ईरान अपने मूल सुरक्षा हितों के मामले में सिर्फ पाकिस्तान के भरोसे नहीं रह सकता।
पांडा ने कहा कि इस पूरे सीजफायर मामले में पाकिस्तान की भूमिका को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक अस्थायी और उपयोगी संपर्क माध्यम के रूप में समझना चाहिए।
उन्होंने लिखा, “इस्लामाबाद इसलिए इस प्रक्रिया में शामिल हो पाया क्योंकि उसके ईरान से संपर्क थे, खाड़ी देशों से कामचलाऊ रिश्ते थे, और अमेरिका व चीन दोनों के लिए उसकी कुछ अहमियत बनी हुई थी। लेकिन केवल एक ‘रास्ता’ होना, ‘मुख्य मध्यस्थ’ होने के बराबर नहीं है। असली मध्यस्थ वही होता है जिस पर भरोसा हो और जिसे तटस्थ माना जाए। पाकिस्तान इस मामले में सिर्फ एक सुविधाजनक माध्यम था, न कि ऐसा पक्ष जिसने नतीजा तय किया हो।”
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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