भारतीय नौसेना के शीर्ष कमांडरों ने समुद्री सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने के साथ-साथ पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों पर गंभीर विचार विमर्श किया है। मंगलवार से आरंभ हुए कमांडरों के सम्मेलन में नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी ने अपने संबोधन में वर्तमान वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों को अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा का वातावरण एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां अनेक कारक एक साथ सक्रिय हो रहे हैं। इनमें समानांतर संघर्ष, विरोधी ताकतों की बढ़ती क्षमता, वैश्विक संस्थाओं का कमजोर होना और गैर राज्य तत्वों के लिए हथियार तथा संसाधन जुटाने की लागत में कमी जैसे तत्व शामिल हैं। इन सभी कारणों ने मिलकर समुद्री क्षेत्र को अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और संवेदनशील बना दिया है, जिससे भारतीय नौसेना को प्रतिदिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
एडमिरल त्रिपाठी ने विशेष रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां उत्पन्न अस्थिरता का सीधा प्रभाव समुद्री यातायात पर पड़ रहा है। उन्होंने इसे इस बात का स्पष्ट संकेत बताया कि सुरक्षा अब सीमाओं से बंधी नहीं रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र में उत्पन्न संघर्ष के परिणाम दूर दराज के देशों तक महसूस किए जा सकते हैं। एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि संघर्ष से दूरी का अर्थ यह नहीं है कि उसके प्रभावों से भी दूरी बनी रहेगी।
उन्होंने वैश्विक शक्ति संतुलन में आए परिवर्तन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में विश्व व्यवस्था प्रतिस्पर्धा के चरण से आगे बढ़कर सीधे संघर्ष की स्थिति में प्रवेश कर चुकी है। यह बदलाव केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि विचारों और कथाओं के माध्यम से भी लड़ा जा रहा है, जिसे उन्होंने कथा युद्ध का नाम दिया।
सम्मेलन के दौरान कमांडरों ने कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की। इनमें विभिन्न सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल, युद्ध क्षमता में वृद्धि, जहाजों और उपकरणों के रखरखाव तथा मरम्मत, बहु आयामी सुरक्षा उपाय, प्रशिक्षण व्यवस्था, विदेशी सहयोग, मानव संसाधन प्रबंधन और स्वदेशीकरण जैसे मुद्दे शामिल थे। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नौसेना की कार्य क्षमता को और मजबूत बनाने की दिशा में योजनाएं तैयार की गईं।
सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नौसेना की तैनाती पर भी विशेष ध्यान दिया गया। हम आपको बता दें कि भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से आता है, इसलिए इन मार्गों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में भारतीय नौसेना ने फारस की खाड़ी से निकलने वाले व्यापारी जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नौसेना की उपस्थिति ने न केवल जहाजों की सुरक्षा को मजबूत किया है, बल्कि भारतीय नाविकों के मनोबल को भी बढ़ाया है। युद्धपोतों की सक्रिय तैनाती से यह संदेश गया है कि भारत अपने नागरिकों और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सम्मेलन में एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी बताया कि पिछले पांच से दस वर्षों में नौसेना के संचालन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। समुद्र की सतह, जल के नीचे और आकाश तीनों क्षेत्रों में युद्ध क्षमता को निरंतर मजबूत किया गया है। इसके लिए आधुनिक उपकरणों का समावेश, आधारभूत ढांचे का विकास, प्रभावी रखरखाव प्रणाली और स्वदेशी तकनीकी विकास जैसे कदम उठाए गए हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आत्मनिर्भरता की दिशा में किए जा रहे प्रयास नौसेना की दीर्घकालिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। स्वदेशी तकनीक और उपकरणों के उपयोग से न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया देने की क्षमता भी बढ़ती है।
देखा जाये तो यह स्पष्ट है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतीय नौसेना को सतर्क, सक्षम और समन्वित रहना होगा। समुद्री सुरक्षा अब केवल रक्षा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय हितों से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है। इसलिए माना जा रहा है कि नौसेना की रणनीतिक तैयारी और दूरदर्शिता आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
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पूरी दुनिया में आतंकिस्तान के नाम से जाना जाने वाला पाकिस्तान अब इस हालत में पहुंच चुका है कि एक देश का कर्ज चुकाने के लिए दूसरे देश से कर्ज लेना उसकी मजबूरी बन गई है। इसके चलते वह दुनिया भर में मजाक का विषय बनता जा रहा है। व्यंग्यकारों का तो यहां तक कहना है कि किसी देश की आर्थिक हालत पर यदि व्यंग्य लिखना हो तो शायद पाकिस्तान से बेहतर उदाहरण आज दुनिया में मिलना मुश्किल है।
हम आपको बता दें कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर की नई आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है, साथ ही पहले से दिए गए पांच अरब डॉलर के कर्ज को चुकाने की अवधि भी बढ़ा दी है। यह मदद ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पर यूएई से कर्ज चुकाने का भारी दबाव बना हुआ है और उसके विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कमजोर हो रहे हैं। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बैठकों के दौरान सऊदी अरब से मिली इस सहायता की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह नई राशि जल्द ही जारी की जाएगी और इससे पाकिस्तान की भुगतान संतुलन स्थिति को संभालने में मदद मिलेगी।
हम आपको बता दें कि पाकिस्तान को जल्द ही संयुक्त अरब अमीरात का अरबों डॉलर का कर्ज चुकाना है। ऐसे में सऊदी अरब की यह सहायता उसके लिए राहत की सांस जैसी है। लेकिन यह राहत स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि एक अस्थायी सहारा है, जिससे पाकिस्तान थोड़े समय के लिए अपने आर्थिक संकट को टाल सकेगा। पाकिस्तान सरकार का दावा है कि इस मदद से उसके विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होंगे और वह वित्त वर्ष के अंत तक लगभग 18 अरब डॉलर का भंडार जुटाने का लक्ष्य रखता है, जो करीब तीन महीने के आयात बिल के बराबर होगा। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि पाकिस्तान अपने सभी बाहरी दायित्व समय पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और हाल ही में एक अरब चालीस करोड़ डॉलर के यूरो बांड का भुगतान बिना किसी परेशानी के कर दिया गया।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। यदि कोई पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय का एक्स अकाउंट देखे तो साफ नजर आता है कि वहां के मंत्री और अधिकारी दुनिया भर में घूम घूमकर कर्ज और आर्थिक मदद जुटाने में लगे हुए हैं। कभी सऊदी अरब, कभी चीन, कभी अंतरराष्ट्रीय संस्थान, तो कभी अन्य खाड़ी देश, हर जगह पाकिस्तान की झोली फैली हुई नजर आती है। यह स्थिति किसी मजबूत अर्थव्यवस्था की नहीं, बल्कि गहरे संकट में फंसे देश की पहचान होती है।
हम आपको यह भी बता दें कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंध भी इस आर्थिक सहायता के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण हैं। दोनों देशों ने हाल के दिनों में आपसी सहयोग को मजबूत किया है, जिसमें रक्षा समझौता भी शामिल है। पाकिस्तान ने आर्थिक मदद के लिए सऊदी नेतृत्व, विशेष रूप से मोहम्मद बिन सलमान के प्रति आभार जताया है और इसे दोनों देशों के बीच गहरे तालमेल का परिणाम बताया है।
देखा जाये तो आज पाकिस्तान की आम जनता के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक उनका देश इस तरह एक से कर्ज लेकर दूसरे का कर्ज चुकाता रहेगा। यह चक्र कब टूटेगा, इसका जवाब पाकिस्तान के आला अधिकारियों के पास शायद नहीं है। देखा जाये तो बार बार उधार लेकर अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश एक ऐसे मरीज की तरह है जिसे बार बार दर्द निवारक दवा दी जा रही हो, लेकिन बीमारी का इलाज नहीं किया जा रहा हो।
बहरहाल, सऊदी अरब की यह नई सहायता पाकिस्तान को थोड़ी राहत जरूर देगी, लेकिन यह उसकी मूल समस्याओं का समाधान नहीं है। जब तक पाकिस्तान आतंकवाद की राह नहीं छोड़ेगा और सेना की बजाय वहां की सरकार देश को नहीं चलाएगी तब तक वह इसी तरह कर्ज के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को घसीटता रहेगा और दुनिया में अपनी छवि सुधारने की बजाय और अधिक हास्य का पात्र बनता जाएगा।
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