आदमखोर शेरों के लिए गुजरात में बनेगा 100 हेक्टेयर का खास बाड़ा, प्राकृतिक माहौल में रहेंगे शेर
विश्व शेर दिवस की पूर्व संध्या पर गुजरात सरकार ने एशियाई शेरों के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. गुजरात वन विभाग ने इंसानों पर हमला करने वाले शेरों के लिए अमरेली जिले के धारी स्थित अंबार्डी सफारी पार्क में 100 हेक्टेयर क्षेत्र में विशेष बाड़ा तैयार करने का फैसला किया है.
वन विभाग के अनुसार, इस विशेष बाड़े में ऐसे शेरों को प्राकृतिक वातावरण में रखा जाएगा, जो मानवों पर हमला करने की घटनाओं में शामिल रहे हैं. इसके लिए काम भी शुरू कर दिया गया है. सरकार का उद्देश्य शेरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ ग्रामीण और आबादी वाले क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है.
गुजरात सरकार के नेतृत्व में शेर संरक्षण के लिए कई योजनाएं और परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं. वन विभाग समय-समय पर वैज्ञानिक तरीके से वन्यजीवों का सुरक्षित स्थानांतरण भी करता है. आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने वाले शेरों और तेंदुओं को सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू कर उपयुक्त वन क्षेत्र में छोड़ा जाता है. घायल या बीमार जानवरों के इलाज और वन्यजीवों के लिए उपयुक्त आवास उपलब्ध कराने के लिए भी स्थानांतरण किया जाता है.
अंबार्डी सफारी पार्क क्यों है खास?
अमरेली के धारी के पास स्थित अंबार्डी सफारी पार्क करीब 365 हेक्टेयर में फैला है और गिर के प्राकृतिक वातावरण का अनुभव कराने वाला प्रमुख वन्य पर्यटन केंद्र है. यहां एशियाई शेरों के अलावा तेंदुए, चीतल, नीलगाय, चिंकारा, मोर और कई पक्षी प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है.
वर्ष 2017 में स्थापित इस पार्क का उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण के साथ लोगों में प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. सफारी और प्राकृतिक वातावरण के कारण यह अमरेली में इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है.
विश्व शेर दिवस हर साल 10 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य शेरों के संरक्षण और उनकी सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना है. गुजरात सरकार का यह नया कदम शेर संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.
संडे प्रोफाइल : मोहम्मद बिन सलमान:सुधारों, कूटनीति से सल्तनत का चेहरा बदलते एमबीएस
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इन दिनों सक्रिय कूटनीति को लेकर चर्चा में हैं। जुलाई में अमेरिका से परमाणु समझौते और 7 अगस्त को सऊदी, पाकिस्तान व तुर्किये के रक्षा करार में उनकी सक्रियता दिखी है। राजनेता को कई चेहरे लगाकर राजकाज चलाना पड़ता है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) इसका उदाहरण हैं। एक तरफ वे सऊदी समाज में बदलाव और आधुनिकता लाने की कोशिश करते हैं तो दूसरी तरफ सत्ता पर पकड़ मजबूत रखने के लिए सख्त फैसलों को लेकर चर्चा में रहते हैं। जनवरी 2015 में किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सऊद के सत्ता संभालने के बाद एमबीएस को अहम जिम्मेदारियां मिलीं। इसके बाद वे तेजी से सत्ता के केंद्र में पहुंचे। आज 41 साल की उम्र में वे देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। हाल के दिनों में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते और पाकिस्तान-तुर्किये के साथ रक्षा गठजोड़ ने उनकी सक्रिय कूटनीति को फिर चर्चा में ला दिया है। इन कदमों के जरिए वे एक तरफ ईरान जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी का मुकाबला करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ चीन, रूस और अमेरिका के बीच संतुलन साधते नजर आते हैं। एमबीएस ने सत्ता में आने के बाद सामाजिक बदलावों पर भी जोर दिया। धार्मिक पुलिस के अधिकार सीमित किए गए। महिलाओं को लेकर कई पुरानी पाबंदियां हटाई गईं। स्कूलों में लड़कियों के खेलने पर लगी रोक खत्म हुई और करीब 40 साल बाद 2018 में देश में सिनेमा फिर शुरू हुआ। 2019 में महिलाओं को पुरुष अभिभावक के बिना यात्रा और काम करने की ज्यादा स्वतंत्रता मिली। विश्व बैंक के अनुसार 2025 में सऊदी अरब की लेबर फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 35% थी। आर्थिक मोर्चे पर एमबीएस ने तेल पर निर्भरता घटाने के लिए महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू कीं। निओम का हाईटेक शहर, लाल सागर के पर्यटन प्रोजेक्ट और खेलों को बढ़ावा देना इसी रणनीति का हिस्सा हैं। रियाद में 2024 में ई-स्पोर्ट्स वर्ल्ड कप हुआ। सऊदी अरब 2030 में एक्सपो और 2034 में फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी की तैयारी भी कर रहा है। हालांकि एमबीएस का दूसरा चेहरा विवादों से जुड़ा है। सत्ता मजबूत करने के दौरान उनके कई रिश्तेदारों और विरोधियों पर कार्रवाई हुई। पत्रकार जमाल खाशोगी की 2018 में हत्या के मामले में भी उन पर गंभीर आरोप लगे। मानवाधिकार संगठनों ने सऊदी सरकार की आलोचना की है। एमबीएस की निजी छवि भी पारंपरिक सऊदी शासकों से अलग है। उन्हें वीडियो गेम, फॉर्मूला-1 और मोटरसाइकिलों में दिलचस्पी है। वे आम लोगों के साथ सेल्फी लेते भी नजर आते हैं। हालांकि, एक दशक से अधिक समय से सत्ता के केंद्र में रहने के बावजूद सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था अब भी तेल पर काफी निर्भर है। यही उनकी महत्वाकांक्षी योजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
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