वॉशिंगटन, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्तता में इस्लामाबाद में हुई समझौता वार्ता के विफल होने के बाद डेमोक्रेटिक सीनेटर मार्क वॉर्नर ने रविवार को चेतावनी दी कि अमेरिका का ईरान के साथ संघर्ष लंबा और अनिश्चित हो सकता है।
सीएनएस को दिए इंटरव्यू में वॉर्नर ने कहा कि बातचीत के फेल होने के बाद वॉशिंगटन में आगे की रणनीति को लेकर मतभेद और बढ़ गए हैं।
वॉर्नर ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि इस युद्ध के 40 से ज्यादा दिन बाद हम पहले से ज्यादा सुरक्षित हैं।” उन्होंने सरकार के दावों पर सवाल उठाए और साफ रणनीति की मांग की।
सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के वाइस चेयरमैन वॉर्नर ने ईरान के समृद्ध यूरेनियम को सुरक्षित करने की योजना पर भी शक जताया। उनका कहना था कि इसके लिए करीब 10,000 सैनिकों को जमीन पर तैनात करना पड़ेगा और साथ में विशेष बलों की भी जरूरत होगी।
उन्होंने युद्ध की बढ़ती लागत पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि अमेरिकी सेना सस्ते ईरानी ड्रोन को गिराने के लिए महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल कर रही है, जबकि बड़े खतरे अब भी बने हुए हैं।
हॉर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक करने के प्रस्ताव पर भी वॉर्नर ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मुझे समझ नहीं आता कि इसे बंद करने से ईरान इसे खोलने के लिए कैसे मजबूर होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे दुनिया भर के तेल बाजार पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ रिपब्लिकन नेताओं की राय अलग है। एबीसी न्यूज पर बोलते हुए सीनेटर रॉन जॉनसन ने कहा कि अमेरिका को हर हाल में यह सुनिश्चित करना होगा कि ईरान कभी परमाणु हथियार न बना सके। उन्होंने कहा कि काम पूरा करना जरूरी है, भले ही इसमें लंबा समय लगे। सैन्य अधिकारियों का रुख थोड़ा संतुलित रहा। उन्होंने कुछ सैन्य सफलताओं का जिक्र किया, लेकिन ज्यादा उम्मीदें न बांधने की सलाह दी।
एबीसी न्यूज पर यूएस सेंट्रल कमांड के प्रमुख रह चुके रिटायर्ड जनरल जोसेफ वोटेल ने कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान की युद्ध क्षमता को काफी हद तक कमजोर किया है, लेकिन अंतिम नतीजा राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयासों पर निर्भर करेगा।
उन्होंने कहा कि युद्ध सिर्फ लड़ाई नहीं होता, यह एक राजनीतिक स्थिति भी होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से काम नहीं चलेगा, बल्कि एक पूरी रणनीति की जरूरत है।
वोटेल ने यह भी कहा कि ईरान के परमाणु सामग्री को कब्जे में लेना एक बहुत बड़ा ऑपरेशन होगा, जिसमें कई दिनों तक सैनिक, एयर सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की जरूरत पड़ेगी।
हॉर्मुज स्ट्रेट इस पूरे संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। अमेरिकी नौसेना वहां से माइंस हटाने का काम कर रही है ताकि जहाजों की आवाजाही फिर शुरू हो सके, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि व्यापारिक जहाजों का भरोसा वापस आने में समय लगेगा।
यह युद्ध अब सातवें हफ्ते में पहुंच चुका है। इससे पहले ही वैश्विक ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ रही है।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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भारत का परमाणु सपना आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। दशकों की प्रतीक्षा, संघर्ष और वैज्ञानिक जिद के बाद कलपक्कम में तैयार प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा और सामरिक स्वतंत्रता का उद्घोष बन गया है। यह वह क्षण है जब भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को नई दिशा दे रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति भी मजबूत कर रहा है।
कलपक्कम में स्थापित यह रिएक्टर देश के तीन चरण वाले परमाणु कार्यक्रम का सबसे अहम पड़ाव है। भारत के पास यूरेनियम की सीमित उपलब्धता है, लेकिन थोरियम के विशाल भंडार मौजूद हैं। यही वजह है कि इस रिएक्टर का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह केवल बिजली पैदा नहीं करता, बल्कि प्लूटोनियम और भविष्य के लिए जरूरी ईंधन भी तैयार करता है। यही इसे साधारण रिएक्टर से अलग और रणनीतिक रूप से बेहद ताकतवर बनाता है।
इस रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी ब्रीडिंग क्षमता है, यानी यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक ईंधन पैदा करता है। इसमें मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का इस्तेमाल होता है और सोडियम कूलिंग प्रणाली इसे तेज और प्रभावी बनाती है। यह तकनीक भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जिनके पास उन्नत परमाणु क्षमता है।
लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा। यह परियोजना लंबे समय तक देरी, लागत वृद्धि और तकनीकी चुनौतियों से जूझती रही। शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक खर्च हुआ और समय सीमा भी कई बार आगे बढ़ी। फिर भी भारत ने हार नहीं मानी। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की लगातार मेहनत ने इस परियोजना को आखिरकार सफलता के करीब पहुंचा दिया।
यहां सबसे अहम सवाल यह है कि इस उपलब्धि का सामरिक महत्व क्या है। इसका जवाब सीधा है, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता। आज दुनिया ऊर्जा संकट, तेल और गैस की राजनीति और वैश्विक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत का यह कदम उसे बाहरी निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।
परमाणु ऊर्जा केवल बिजली का स्रोत नहीं है, यह शक्ति संतुलन का आधार भी है। जिन देशों के पास उन्नत परमाणु तकनीक होती है, वह वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। यह रिएक्टर भारत को उसी श्रेणी में पहुंचाने का माध्यम है। इससे न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि भारत की रक्षा और तकनीकी क्षमता भी मजबूत होगी।
रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह परियोजना भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। थोरियम आधारित कार्यक्रम भारत को आने वाले दशकों तक स्थायी ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है। इससे न केवल उद्योगों को बल मिलेगा, बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम भी सशक्त होंगे।
इसके अलावा, यह परियोजना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का भी प्रमाण है। यह संदेश साफ है कि भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक का निर्माता भी है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक ठोस कदम है, जो देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाएगा। हालांकि चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। सुरक्षा, अपशिष्ट प्रबंधन और लागत नियंत्रण जैसे मुद्दे अब भी अहम हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद यह उपलब्धि भारत के लिए ऐतिहासिक है।
देखा जाये तो यह रिएक्टर केवल एक मशीन नहीं, बल्कि एक विचार है, एक विजन है। यह उस भारत की तस्वीर पेश करता है जो अपने संसाधनों का सही उपयोग करके दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहा है। अगर यह परियोजना सफलतापूर्वक संचालित होती है, तो भारत आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेता बन सकता है। यह न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि उसे निर्यातक देश के रूप में भी स्थापित कर सकता है।
बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि कलपक्कम का यह रिएक्टर भारत के परमाणु सपने का वह पड़ाव है, जहां से भविष्य की दिशा तय होगी। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक रणनीतिक क्रांति है जो भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।
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