चिकनगुनिया और डेंगू में है फर्क: जानिए लक्षण, रोकथाम और घरेलू उपाय
नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। चिकनगुनिया और डेंगू दोनों ही मच्छर से फैलने वाली बीमारियां हैं, लेकिन अक्सर लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं। असल में ये दोनों अलग-अलग वायरस से होने वाली बीमारियां हैं और इनके लक्षण भी थोड़े अलग होते हैं। अगर सही समय पर पहचान कर ली जाए तो इलाज आसान हो जाता है और मरीज जल्दी ठीक हो सकता है।
डेंगू एक वायरल बीमारी है। इसमें अचानक तेज बुखार आता है, जो 102 से 104 डिग्री तक जा सकता है। इसके साथ सिर में तेज दर्द, आंखों के पीछे दर्द, शरीर में बहुत ज्यादा दर्द और कमजोरी महसूस होती है। कई लोगों के शरीर पर लाल चकत्ते भी दिखने लगते हैं। कुछ मामलों में उल्टी, जी मिचलाना और भूख न लगना भी होता है। डेंगू की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें प्लेटलेट्स कम होने लगते हैं, जिससे शरीर कमजोर हो सकता है और गंभीर स्थिति में खून बहने का खतरा भी रहता है।
वहीं, चिकनगुनिया में भी अचानक तेज बुखार आता है, लेकिन इसमें जोड़ों में तेज दर्द रहता है। यह दर्द इतना ज्यादा हो सकता है कि मरीज को चलने-फिरने में भी परेशानी हो जाती है। हाथ, पैर, घुटने और टखनों में सूजन और अकड़न हो सकती है। कई लोगों को थकान, सिर दर्द, उल्टी और हल्के दाने भी हो जाते हैं। चिकनगुनिया में बुखार ठीक होने के बाद भी जोड़ों का दर्द हफ्तों या महीनों तक रह सकता है, जो इसे डेंगू से अलग बनाता है।
दोनों बीमारियों से बचाव का तरीका लगभग एक जैसा है। सबसे जरूरी है मच्छरों से बचना। घर के आसपास पानी जमा न होने दें, क्योंकि वहीं मच्छर पैदा होते हैं। कूलर, गमले, टायर और बाल्टी में पानी न रुकने दें। सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और दिन में भी शरीर को ढककर रखें, क्योंकि ये मच्छर दिन में ज्यादा काटते हैं। मच्छर भगाने वाली क्रीम या स्प्रे का इस्तेमाल भी मदद करता है।
घरेलू उपायों की बात करें तो शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी है। ज्यादा से ज्यादा पानी, नारियल पानी और ओआरएस लें ताकि शरीर में कमजोरी न आए। डेंगू में पपीते के पत्तों का रस और हल्का खाना अक्सर लोग इस्तेमाल करते हैं, जबकि चिकनगुनिया में हल्दी वाला दूध और गर्म सिकाई जोड़ों के दर्द में राहत देती है। आराम करना दोनों ही बीमारियों में सबसे जरूरी है।
अगर बुखार लगातार 2-3 दिन से ज्यादा रहे, शरीर में बहुत ज्यादा दर्द हो, उल्टी बार-बार हो या खून निकलने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। खुद से दवा लेना या बीमारी को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है।
--आईएएनएस
पीआईएम/वीसी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
चांद का चक्कर लगाकर अपने साथ 7 हजार से ज्यादा तस्वीरें लेकर 'कपोला' से उतरे एस्ट्रोनॉट्स, जानें क्या है ये मॉड्यूल
नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिकी स्पेस एजेंसी के आर्टेमिस II मिशन के क्रू ने कुल 6,94,481 मील की दूरी तय कर पृथ्वी से 2,52,756 मील दूर तक पहुंचकर 1970 के अपोलो 13 मिशन का रिकॉर्ड तोड़ दिया। लगभग 10 दिनों की इस यात्रा के बाद चारों एस्ट्रोनॉट्स शुक्रवार को प्रशांत महासागर के सैन डिएगो तट के पास ओरियन से सुरक्षित उतर गए।
उतरने के बाद नासा और अमेरिकी सेना की संयुक्त टीम ने उनका स्वागत किया। टीम ने उन्हें ओरियन स्पेसक्राफ्ट से बाहर निकालकर हेलीकॉप्टर से यूएसएस जॉन पी. मुर्था जहाज पर पहुंचाया। प्रारंभिक चिकित्सा जांच के बाद चालक दल के सदस्य ह्यूस्टन के जॉनसन स्पेस सेंटर लौटेंगे। यह मिशन चंद्रमा पर भविष्य में मानव लैंडिंग की तैयारी के लिए एक बड़ा कदम है। कपोला मॉड्यूल ने अंतरिक्ष यात्रियों को अद्भुत दृश्य प्रदान करके मिशन को और यादगार बना दिया।
स्पेस से संबंधित मिशन में कपोला का अहम योगदान होता है। कपोला इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लगा एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मॉड्यूल है। इसे स्टेशन के बाहर होने वाली गतिविधियों को देखने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है। आर्टेमिस II मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री इसी कपोला से चंद्रमा और पृथ्वी के शानदार दृश्य देख रहे थे।
कपोला मॉड्यूल में कुल सात खिड़कियां होती हैं- छह किनारों पर और एक सीधे नीचे की ओर देखने वाली। इन खिड़कियों से पृथ्वी और खगोलीय पिंडों के दृश्य दिखाई देते हैं। खिड़कियों पर शटर लगे होते हैं, जो उन्हें गंदगी, ऑर्बिटल मलबे या छोटे उल्कापिंडों से बचाते हैं। कपोला में एक रोबोटिक वर्कस्टेशन भी है, जिससे अंतरिक्ष यात्री रोबोटिक आर्म को नियंत्रित कर सकते हैं। इसकी मदद से वे अंतरिक्ष यानों को पकड़ने, जोड़ने और स्टेशन पर विभिन्न काम करने में सहायता लेते हैं।
कपोला का मुख्य उपयोग पृथ्वी का अवलोकन, स्पेसवॉक देखना और अंतरिक्ष यानों के आगमन-प्रस्थान को मॉनिटर करने के लिए भी होता है। यहां से चालक दल के सदस्य अक्सर अपने कैमरे से पृथ्वी के विभिन्न स्थानों की तस्वीरें लेते हैं। यह मॉड्यूल स्टेशन का सबसे पसंदीदा हिस्सा माना जाता है क्योंकि यहां से पृथ्वी एक बड़े पैनल की तरह दिखती है।
आर्टेमिस II मिशन में नासा के रीड वाइजमैन (कमांडर), विक्टर ग्लोवर (पायलट), क्रिस्टीना कोच और कनाडाई स्पेस एजेंसी के जेरेमी हैनसेन शामिल थे। यह मिशन 1 अप्रैल को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से नासा के एसएलएस रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था। लॉन्च के समय रॉकेट ने 8.8 मिलियन पाउंड का थ्रस्ट दिया और ओरियन अंतरिक्ष यान को सटीक कक्षा में स्थापित किया। मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा के पास से गुजरते हुए उसकी सतह की 7,000 से अधिक तस्वीरें लीं।
उन्होंने सूर्य ग्रहण का भी अद्भुत नजारा देखा, जिसमें चंद्रमा ने सूर्य को ढक लिया था। इन तस्वीरों में अर्थराइज-अर्थसेट, चंद्रमा पर उल्कापिंडों के गड्ढे, प्राचीन लावा प्रवाह, मिल्की वे गैलेक्सी और चंद्रमा की सतह पर दरारें व रंगों की भिन्नताएं साफ दिखाई दीं।
--आईएएनएस
एमटी/एएस
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