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रात रात भर बमबारी से परेशान हुए ईरानी, जान बचाने के लिए सरहदें पार करने की होड़, सीमाओं पर बिठाया गया सख्त पहरा

ईरान की सरहदें अब केवल नक्शे पर खिंची रेखाएं नहीं रहीं, बल्कि वह इंसानी दर्द, डर और बिखरती उम्मीदों की सबसे मार्मित कहानी बन चुकी हैं। अप्रैल की शुरुआत तक हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर सीमा चौकी पर मार्मिक कहानियां दिखाई दे रही हैं। युद्ध, आर्थिक तबाही और संचार ठप होने की स्थिति ने पूरे ईरान को भीतर से झकझोर दिया है जिससे बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं।

तुर्की की कपिकोय सीमा पर खड़े लोगों ने पलायन का कारण पूछे जाने पर बताया कि हर रात बम गिरते हैं और हर सुबह खुद को जिंदा पाकर हम खुश होते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। उन्होंने बताया कि राजधानी तेहरान से लेकर औद्योगिक इलाकों तक धमाकों की आवाज अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।

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इंटरनेट बंद है, कारोबार ठप है और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है। ऐसे में लोग केवल जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ने के लिए भी देश छोड़ रहे हैं। यह पलायन अब रोटी या नौकरी का नहीं, बल्कि अस्तित्व और संवाद का संकट बन गया है। कुछ लोग तो सिर्फ इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए पहाड़ों के रास्ते तुर्की की सीमा पार कर रहे हैं।

हम आपको बता दें कि ईरान से निकलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि देश के भीतर भी लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। तुर्की सबसे बड़ा रास्ता बनकर उभरा है, क्योंकि वहां वीजा मुक्त प्रवेश की सुविधा है। इसके अलावा अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर भी लोगों का रुख बढ़ा है। लेकिन इन रास्तों पर अब पहले जैसा खुलापन नहीं है। तुर्की ने अपनी सीमा को लगभग किले में बदल दिया है। सैंकड़ों किलोमीटर लंबी दीवार, रडार, थर्मल कैमरे और ड्रोन निगरानी, सब कुछ तैनात है। इसके साथ ही सीमा के भीतर बफर जोन और टेंट शहर बनाने की तैयारी की गई है ताकि शरण लेने वालों को शहरों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाए। यहां एक अजीब विडंबना दिखाई देती है। एक तरफ इंसान मदद के लिए दरवाजे खटखटा रहा है, दूसरी तरफ वही दरवाजे सुरक्षा के नाम पर बंद किए जा रहे हैं।

अफगानिस्तान सीमा पर हालात और भी ज्यादा तनावपूर्ण हैं। तालिबान और ईरानी सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हो चुकी हैं। हजारों अफगान जो कभी ईरान में रह रहे थे, अब वापस लौट रहे हैं, जबकि कुछ ईरानी उसी दिशा में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं। यह उल्टा बहाव बताता है कि हालात कितने जटिल हो चुके हैं।

पाकिस्तान ने भी अपनी सीमा पर सख्ती बढ़ा दी है। हर आने जाने वाले की कड़ी जांच हो रही है। वहीं अजरबैजान ने अपनी जमीन पूरी तरह बंद कर दी है। वहां प्रवेश अब केवल विशेष अनुमति से ही संभव है।

इन सबके बीच आर्मेनिया की नोरदुज सीमा एक उम्मीद की तरह सामने आई है। यह फिलहाल उन लोगों के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है जो किसी भी तरह इस संकट से बाहर निकलना चाहते हैं। लेकिन यह रास्ता भी कब तक खुला रहेगा, यह कोई नहीं जानता।

युद्ध का सबसे गहरा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कारोबार बंद हो रहे हैं, मुद्रा लगातार गिर रही है और लोगों की बचत खत्म होती जा रही है। एक कारोबारी को अपना पूरा व्यापार बंद करना पड़ा और अपने कर्मचारियों को यह कहकर घर भेजना पड़ा कि अब आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता।

सबसे डरावनी बात यह है कि लोग अब इस डर के साथ जीना सीख रहे हैं। शुरुआत में जो धमाके दिल दहला देते थे, अब वे सामान्य लगने लगे हैं। लेकिन इस सामान्यता के पीछे छिपा है गहरा मानसिक आघात। एक महिला बताती है कि उसकी मां की मौत किसी हमले से नहीं, बल्कि लगातार तनाव के कारण हुई। देखा जाये तो युद्ध केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन को भी तोड़ देता है।

हालांकि हर ईरानी इस पलायन का हिस्सा नहीं है। कुछ लोग अब भी अपने देश के साथ खड़े हैं। वह मानते हैं कि मुश्किल समय है, लेकिन देश छोड़ना समाधान नहीं है। यह सोच दिखाती है कि ईरान के भीतर भी एक गहरी मानसिक और भावनात्मक लड़ाई चल रही है।

दिलचस्प बात यह भी है कि जहां एक तरफ लोग देश छोड़ रहे हैं, वहीं कई लोग वापस भी लौट रहे हैं। कुछ अपने परिवार के पास रहने के लिए, तो कुछ मजबूरी में। यह स्थिति बताती है कि यह संकट केवल भागने या बचने का नहीं, बल्कि रिश्तों और जिम्मेदारियों के बीच फंसी जिंदगी का भी है।

देखा जाये तो आज ईरान की सीमाएं दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट का केंद्र बन चुकी हैं। एक तरफ युद्ध और आर्थिक तबाही से जूझती जनता, दूसरी तरफ पड़ोसी देशों की सख्त सुरक्षा नीतियां, इन दोनों के बीच इंसान पिस रहा है। यह केवल सीमाओं का संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। अगर हालात जल्द नहीं बदले, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।

-नीरज कुमार दुबे

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नौकरी के लिए न्यूनतम अंक भी प्राप्त नहीं होना अध्ययन गुणवत्ता पर उठाते सवाल

अभी मेडिकल पीजी में 0 पर्सेंटाइल पर प्रवेश का मुद्दा पुराना भी नहीं हुआ है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम ने देश की शिक्षा के हालातों के पोल खोलकर ही रख दी है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को पढ़ाने के लिए लेक्चरर के पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में पोलिटिकल साइंस के लेक्चरर के पद के लिए हजारों युवाओं ने परीक्षा दी और 225 पद होने के बावजूद केवल 6 परीक्षार्थी चयन के योग्य पाये गये। मजे की बात है कि परीक्षा देने वाले हजारों युवाओं में मात्र 219 युवा भी न्यूनतम प्राप्तांक 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पायें। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिजिकल एजुकेशन के 37 पदों के लिए एक भी नहीं और होमसाइंस जैसे विषय के लेक्चरर के पद के लिए केवल एक परीक्षार्थी ही सफल हो सका। अब एक और देश में प्रतिपक्ष बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से उठा रहे हैं तो दूसरी और भर्ती वाले पदों के लिए न्यूनतम अर्हता अंक प्राप्त करने में भी आज के युवा सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह कोई राजस्थान की ही बात नहीं है अपितु यह समूचे देश की शिक्षा के स्तर की बानगी है। क्योंकि निश्चित रुप से राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य प्रदेशों के युवा भी परीक्षार्थी रहे होंगे। बेरोजगारी की समस्या अपनी जगह पर है पर दूसरी और स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के ज्ञान के स्तर को इससे आंका जा सकता है।

यही कारण है कि आज मल्टी टास्क सर्विस जिसे परपंरागत शब्दों में कहा जाए तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद या शहरी निकायों में सफाई कर्मचारी के कुछ पदों के लिए ही हजारों लाखों युवा आवेदन करने लगे हैं और तस्वीर का एक पहलू यह है कि इन युवाओं में उच्च और तकनीकी शिक्षा यहां तक की इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए तक आवेदन कर रहे हैं। यह हमारे शैक्षणिक संस्थानों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं होना चाहिए। अब पोलिटिकल साइंस के स्कूल लेक्चरर के लिए परीक्षा देने वाले युवा निश्चित रुप से पोलिटिकल साइंस से स्नातक या स्नातकोत्तर और हो सकता है कि पीएच डी तक हो पर उनके द्वारा केवल और केवल न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं करना कहीं ना कहीं शिक्षा की स्थिति को स्पष्ट करती है। वैसे देखा जाएं तो 40 प्रतिशत अंक प्राप्त कर चयनित होने वाले स्कूल लेक्चरर से आप बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की अपेक्षा करेंगे तो बेमानी होगी। हालात वास्तव में गंभीर है और यही कारण है कि नौकरी के लिए आयोजित परीक्षाओं में नकल, गलत प्रयोग और पेपर आउट व डमी केंडिडेट द्वारा परीक्षाएं देने के माफियायों की बन पड़ी है। 

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जहां तक मेडिकल पीजी में जीरो पर्सेंटाइल पर प्रवेश के निर्णय पर यह अवश्य संतोष की बात है कि फैडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के इस निर्णय की खिलाफत करने की हिम्मत दिखाई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देष में षिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा कर सबके लिए शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो सकी। अब तो डीम्ड यूनिवर्सिटी सहित यूनिवर्सिटी नित नई खुलती जा रही है। इसे अच्छा भी माना जा सकता है पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के माध्यम ही बन कर रह गए हैं। 

पोलिटिकल साइंस स्कूल लेक्चरर या अन्य पदों के लिए न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने वाली युवाओं की पीढ़ी तैयार हो रही है तो इसके लिए सबसे अधिक शर्म की बात इन शिक्षण संस्थानों के लिए होनी चाहिए। पोलिटिकल साइंस तो उदाहरण मात्र है, सवाल यह है कि परीक्षा देने वाले हजारों प्रतियोगी किसी एक संस्थान से तो डिग्री प्राप्त नहीं होंगे। मजे और शर्म की बात यह है कि इन हजारों प्रतियोगी छात्रों में से कई युवा तो स्तरीयता का दावा करने वाले संस्थान के शिक्षार्थी रहे होंगे, उसके बाद नौकरी के लिए परीक्षा में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इससे अधिक बुरी बात क्या होगी? आखिर हम जा कहां रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की स्तरीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह से कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरियों की बाढ़ आई हुई है उसके परिणाम भी इन परिणामों में कहीं दूर दूर तक लक्षित नहीं हो रहे। 

सरकार और तकनीकी शिक्षण संस्थानों को कम से कम अपने स्तर का तो ध्यान रखना ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी अध्ययन की वैश्विक पहचान बनाना सरकार और अध्ययन केन्द्रों की पहली और अंतिम प्राथमिकता होनी चाहिए, पर यहां तो स्थानीय स्तर पर ही खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि जीरो पर्सेंटाइल वालों को विशेषज्ञ बनाकर ईलाज का लाइसेंस देंगे तो यह आमनागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ और शिक्षा पद्धति को मजाक बनाना ही है। सरकार और आयोग को समय रहते शिक्षा के स्तर को बनाए रखने की पहल करनी होगी। इसी से देश की शिक्षा की गुणवत्ता देश दुनिया में बनी रह सकेगी। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को खासतौर से आगे आना होगा। हालात शिक्षण संस्थानों को शर्मिंदा करने के लिए काफी होने चाहिए। परिणाम एक बार युवाओं को तैयार कर रही इन संस्थानों के लिए भी आत्मचिंतन के होने चाहिए। परिणाम साफतौर पर इन संस्थानों को चेहरा दिखाते नजर आ रहे हैं।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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