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नौकरी के लिए न्यूनतम अंक भी प्राप्त नहीं होना अध्ययन गुणवत्ता पर उठाते सवाल

अभी मेडिकल पीजी में 0 पर्सेंटाइल पर प्रवेश का मुद्दा पुराना भी नहीं हुआ है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम ने देश की शिक्षा के हालातों के पोल खोलकर ही रख दी है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को पढ़ाने के लिए लेक्चरर के पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में पोलिटिकल साइंस के लेक्चरर के पद के लिए हजारों युवाओं ने परीक्षा दी और 225 पद होने के बावजूद केवल 6 परीक्षार्थी चयन के योग्य पाये गये। मजे की बात है कि परीक्षा देने वाले हजारों युवाओं में मात्र 219 युवा भी न्यूनतम प्राप्तांक 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पायें। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिजिकल एजुकेशन के 37 पदों के लिए एक भी नहीं और होमसाइंस जैसे विषय के लेक्चरर के पद के लिए केवल एक परीक्षार्थी ही सफल हो सका। अब एक और देश में प्रतिपक्ष बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से उठा रहे हैं तो दूसरी और भर्ती वाले पदों के लिए न्यूनतम अर्हता अंक प्राप्त करने में भी आज के युवा सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह कोई राजस्थान की ही बात नहीं है अपितु यह समूचे देश की शिक्षा के स्तर की बानगी है। क्योंकि निश्चित रुप से राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य प्रदेशों के युवा भी परीक्षार्थी रहे होंगे। बेरोजगारी की समस्या अपनी जगह पर है पर दूसरी और स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के ज्ञान के स्तर को इससे आंका जा सकता है।

यही कारण है कि आज मल्टी टास्क सर्विस जिसे परपंरागत शब्दों में कहा जाए तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद या शहरी निकायों में सफाई कर्मचारी के कुछ पदों के लिए ही हजारों लाखों युवा आवेदन करने लगे हैं और तस्वीर का एक पहलू यह है कि इन युवाओं में उच्च और तकनीकी शिक्षा यहां तक की इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए तक आवेदन कर रहे हैं। यह हमारे शैक्षणिक संस्थानों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं होना चाहिए। अब पोलिटिकल साइंस के स्कूल लेक्चरर के लिए परीक्षा देने वाले युवा निश्चित रुप से पोलिटिकल साइंस से स्नातक या स्नातकोत्तर और हो सकता है कि पीएच डी तक हो पर उनके द्वारा केवल और केवल न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं करना कहीं ना कहीं शिक्षा की स्थिति को स्पष्ट करती है। वैसे देखा जाएं तो 40 प्रतिशत अंक प्राप्त कर चयनित होने वाले स्कूल लेक्चरर से आप बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की अपेक्षा करेंगे तो बेमानी होगी। हालात वास्तव में गंभीर है और यही कारण है कि नौकरी के लिए आयोजित परीक्षाओं में नकल, गलत प्रयोग और पेपर आउट व डमी केंडिडेट द्वारा परीक्षाएं देने के माफियायों की बन पड़ी है। 

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जहां तक मेडिकल पीजी में जीरो पर्सेंटाइल पर प्रवेश के निर्णय पर यह अवश्य संतोष की बात है कि फैडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के इस निर्णय की खिलाफत करने की हिम्मत दिखाई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देष में षिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा कर सबके लिए शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो सकी। अब तो डीम्ड यूनिवर्सिटी सहित यूनिवर्सिटी नित नई खुलती जा रही है। इसे अच्छा भी माना जा सकता है पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के माध्यम ही बन कर रह गए हैं। 

पोलिटिकल साइंस स्कूल लेक्चरर या अन्य पदों के लिए न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने वाली युवाओं की पीढ़ी तैयार हो रही है तो इसके लिए सबसे अधिक शर्म की बात इन शिक्षण संस्थानों के लिए होनी चाहिए। पोलिटिकल साइंस तो उदाहरण मात्र है, सवाल यह है कि परीक्षा देने वाले हजारों प्रतियोगी किसी एक संस्थान से तो डिग्री प्राप्त नहीं होंगे। मजे और शर्म की बात यह है कि इन हजारों प्रतियोगी छात्रों में से कई युवा तो स्तरीयता का दावा करने वाले संस्थान के शिक्षार्थी रहे होंगे, उसके बाद नौकरी के लिए परीक्षा में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इससे अधिक बुरी बात क्या होगी? आखिर हम जा कहां रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की स्तरीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह से कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरियों की बाढ़ आई हुई है उसके परिणाम भी इन परिणामों में कहीं दूर दूर तक लक्षित नहीं हो रहे। 

सरकार और तकनीकी शिक्षण संस्थानों को कम से कम अपने स्तर का तो ध्यान रखना ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी अध्ययन की वैश्विक पहचान बनाना सरकार और अध्ययन केन्द्रों की पहली और अंतिम प्राथमिकता होनी चाहिए, पर यहां तो स्थानीय स्तर पर ही खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि जीरो पर्सेंटाइल वालों को विशेषज्ञ बनाकर ईलाज का लाइसेंस देंगे तो यह आमनागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ और शिक्षा पद्धति को मजाक बनाना ही है। सरकार और आयोग को समय रहते शिक्षा के स्तर को बनाए रखने की पहल करनी होगी। इसी से देश की शिक्षा की गुणवत्ता देश दुनिया में बनी रह सकेगी। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को खासतौर से आगे आना होगा। हालात शिक्षण संस्थानों को शर्मिंदा करने के लिए काफी होने चाहिए। परिणाम एक बार युवाओं को तैयार कर रही इन संस्थानों के लिए भी आत्मचिंतन के होने चाहिए। परिणाम साफतौर पर इन संस्थानों को चेहरा दिखाते नजर आ रहे हैं।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा के बाद भी बहुत कुछ करना होगा

काफी पहले केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की अवधि से एक दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की। नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने कहा कि देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है। आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार  नकसल प्रभावित क्षेत्र में तेजी से विकास करा रही है। शिक्षा के लिए स्कूल और उपचार के लिए वहां अस्पताल खुल रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें खत्म हो रही हैं और आदिवासियों की आवाज अब संसद तक पहुंची है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने समस्या को बढ़ने दिया। मोदी सरकार के फैसलों से हालात बदले हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विचारधारा आदिवासियों को गुमराह करती है और अब देश नक्सलवाद मुक्त बनने की ओर बढ़ रहा है।

उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत नहीं, बल्कि उन्हें खत्म कर विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जो हथियार उठाएगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों का पूरा केंद्रीय नेतृत्व, पोलित ब्यूरो और कमेटी अब खत्म हो चुकी है। काफी मारे गए, बहुतों ने सरेंडर किया। कुछ अभी फरार हैं।

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शाह ने कहा कि देश अब नक्सलमुक्त होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि कई बड़े ऑपरेशन जैसे बुढ़ा, थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट चलाए गए। इनमें भारी मात्रा में हथियार, आईईडी फैक्ट्री और अनाज बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को उन्होंने अहम बताया।

केंद्रीय गृहमंत्री ने बताया कि आजादी के समय देश संसाधनों की कमी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था। कई दूर-दराज के इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं थी, सड़कों और सुविधाओं का अभाव था। ऐसे हालात में कुछ संगठनों ने इन कमजोरियों का फायदा उठाया। जहां राज्य की पकड़ कम थी, उन्हीं इलाकों को रेड कॉरिडोर बनाया गया। भोले-भाले आदिवासियों को भेदभाव और शोषण के नाम पर भड़काया गया और उनके हाथों में हथियार थमा दिए गए। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध भेदभाव नहीं, बल्कि विकास की कमी थी, जिसका इस्तेमाल कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया।

शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऑल एजेंसी अप्रोच अपनाई। इसमें सीएपीएफ, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और स्पोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गई। इसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनाई, इससे नक्सलवाद कमजोर हुआ।

उन्होंने दावा किया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं, मोबाइल टावर लगाए गए, बैंक, एटीएम और डाकघर खोले गए। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल, आईटीआई और कौशल केंद्र बनाए गए। उन्होंने कहा कि विकास ही नक्सलवाद खत्म करने का सबसे बड़ा कारण बना।

शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं, बल्कि विचारधारा से पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती और बंदूक के जरिए सत्ता चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार दिए गए और विकास को रोका गया।

गृह मंत्री ने कहा कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने आदिवासी समाज को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक से नहीं, संविधान से चलेगा और यही असली जीत है। गृह मंत्री के अनुसार, जिस "रेड कॉरिडोर" का विस्तार कभी पशुपति से तिरुपति तक माना जाता था, वह अब सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है। 2014 में जहाँ 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र एक अंक में रह गई है। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था। अब वह सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है और वहां विकास की किरणें पहुँच रही हैं।

सरकार के इन दावों की पुष्टि जमीनी आंकड़ों से भी होती है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। "ऑपरेशन कगार" और "ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट" जैसे लक्षित अभियानों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने नक्सली नेतृत्व की कमर तोड़ दी है। 2025 के दौरान ही 300 से अधिक नक्सली मारे गए। इनमें कई शीर्ष कमांडर शामिल थे। इसके साथ ही, हजारों की संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है,। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि अब इस विचारधारा का आकर्षण खत्म हो रहा है। इतना सब होने के बावजूद, इन सफलताओं के बावजूद नक्सलवाद की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता है। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे घने वन क्षेत्र आज भी सुरक्षा बलों के लिए कठिन परीक्षा बने हुए हैं। नक्सलियों ने अपने पैर पीछे जरूर खींचे हैं, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। वे अक्सर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का लाभ उठाकर छापामार हमले करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा, "अर्बन नक्सलिज्म" या वैचारिक उग्रवाद एक नई चुनौती बनकर उभरा है। शहरों में बैठे कुछ बौद्धिक समूह नक्सलियों को वैचारिक और रसद सहायता प्रदान करते हैं। इससे इस समस्या की जड़ें गहरी बनी रहती हैं। जब तक इन वैचारिक और वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक उग्रवाद के पुनर्जीवित होने का खतरा बना रहेगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय आदिवासियों के बीच विश्वास की बहाली है। दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे होने के कारण, कई क्षेत्रों में ग्रामीण अब भी सुरक्षा बलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। नक्सली अक्सर इस अविश्वास का फायदा उठाते हैं और ग्रामीणों को ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के बीच के इस "गवर्नेंस वैक्यूम" को भरना एक लंबी प्रक्रिया है। केवल सड़कों या मोबाइल टावरों का निर्माण पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह महसूस कराना होगा कि सरकार उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षक है। इसके साथ ही, पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय की कमी भी कई बार बाधा बनती है, क्योंकि नक्सली एक राज्य में दबाव बढ़ने पर दूसरे राज्य की सीमा में शरण ले लेते हैं।

विकास के मोर्चे पर, सरकार को "नियत नेल्लानार" (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं को और विस्तार देना चाहिए, जो अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने पर केंद्रित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण सबसे प्रभावी हथियार है। जब आदिवासियों के बच्चों के पास स्कूल होंगे और उनके युवाओं के पास रोजगार के अवसर होंगे, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी। कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना नक्सली विचारधारा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। साथ ही, वन अधिकारों (फोरेस्ट राइट एक्ट) का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा ताकि आदिवासियों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक का अहसास हो और वे उग्रवाद के बहकावे में न आएं।

मान्यता है कि नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन केवल बंदूकों के दम पर संभव नहीं है। वास्तव में ऐसा भी नहीं हैं। कभी श्रीलंका में लिट्टे बहुत मजबूत संगठन था। उसके लड़ाके बेमिसाल थे। श्रीलंका के साथ भारतवर्ष को भी वह प्रभावित कर रहा था। इस पर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1991), श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे (1993) सहित कई लोगों की हत्या का आरोप है। श्रीलंका सरकार से इस संगठन को खत्म करने का निर्णय लिया। एक झटके में 2009 में लिट्टे पूरी तरह खत्म हो गया। न श्रीलंका सरकार ने उसके लड़ाकों को फुसलाया। न समर्पण के लिए कहा। बंदूक के बल पर लिट्टे को खत्म कर दिया। 

भारत सरकार तो नक्सलवाद को खत्म करने के लिए इन्हें समझाने और आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित कर रही है। सरकार को अपनी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को और अधिक उदार और प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि भटक चुके युवा बिना किसी डर के मुख्यधारा में लौट सकें। 

इस सबके लिए तकनीकी और खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके नक्सली गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें समय रहते रोकना संभव है। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि नक्सलवाद कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत होती है। मजबूत इच्छा शक्ति की भी आवश्यक्ता है।

- अशोक मधुप
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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