राजनीति में कदम रखने के बाद विरोध, नारे, सवाल और कभी-कभी विरोधियों के तंज झेलना शायद लोकतांत्रिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, लेकिन अगर विरोध का हथियार ‘अंडा’ बन जाए और उससे बचने के लिए सांसद पुलिस के सामने वर्चुअल पेशी की गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाएं, तो अदालत का चुटीला सवाल आना तय है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसा ही हुआ। अदालत ने उनकी उस मांग में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया, जिसमें उन्होंने कथित आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़े मामले में पुलिस के सामने ऑनलाइन माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी थी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने साफ संकेत दिया कि वह कलकत्ता हाई कोर्ट के उस निर्देश में दखल देने के पक्ष में नहीं है, जिसके तहत कृष्णानगर की सांसद को जांच में शामिल होने और पुलिस के सामने पेश होने को कहा गया था। सुनवाई के दौरान महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि सांसद को जांच अधिकारी के सामने वर्चुअल तरीके से पेश होने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका तर्क था कि पुलिस ने उन्हें अपने ही निर्वाचन क्षेत्र के थाने में उपस्थित होने को कहा है और पिछली बार वहां जाने पर उन्हें विरोध और धमकियों का सामना करना पड़ा था।
वकील ने अदालत को बताया कि पहले उन्हें धमकी दी गई कि उन पर अंडे फेंके जाएंगे और बाद में वास्तव में अंडे भी फेंके गए। यानी मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विरोध का ‘प्रोटीन पैकेज’ भी जमीन पर पहुंच गया। इसी दलील के जवाब में पीठ ने वह टिप्पणी की, जिसने पूरे मामले को कानूनी सुनवाई से निकालकर राजनीतिक बहस का विषय बना दिया।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि राजनीति में उतरने के बाद सांसद अंडों से क्यों डर रही हैं? अदालत ने स्वतंत्रता सेनानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाईं। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की अर्जी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचनी ही नहीं चाहिए थी। अदालत की इस टिप्पणी ने साफ कर दिया कि राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक विरोध के जोखिम और आपराधिक जांच में कानून के मुताबिक सहयोग, दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर देखा जाना चाहिए।
उधर, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद महुआ मोइत्रा के वकील ने याचिका वापस ले ली। इसके बाद अदालत ने इसे ‘वापस ली गई’ याचिका के रूप में खारिज कर दिया। यानी सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल आरोपों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया, बल्कि वर्चुअल पेशी की मांग पर राहत देने से इंकार किया।
हम आपको बता दें कि यह पूरा विवाद कलकत्ता हाई कोर्ट के 21 जुलाई के आदेश से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने महुआ मोइत्रा को फिलहाल coercive action यानी पुलिस की ओर से कठोर कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन साथ ही जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया था। न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की पीठ ने उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पूछताछ के लिए उपस्थित होने को कहा है। हाई कोर्ट ने यह सुरक्षा 5 अक्टूबर तक दी है, बशर्ते सांसद जांच में सहयोग करती रहें। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को निर्धारित है।
हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया था कि महुआ मोइत्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें अधिकतम सजा सात वर्ष से कम है। इसी आधार पर उन्हें फिलहाल गिरफ्तारी जैसी कठोर कार्रवाई से सुरक्षा दी गई है। लेकिन सुरक्षा का मतलब जांच से छुट्टी नहीं है और यही बात सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी केंद्रीय रूप से उभरकर सामने आई।
हम आपको बता दें कि मामला पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के हगोलबेरिया थाने में दर्ज केस से संबंधित है। महुआ मोइत्रा ने आरोपों को मनगढ़ंत बताते हुए मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने और पुलिस की कठोर कार्रवाई से संरक्षण की मांग की थी। यह विवाद एक कथित भड़काऊ पोस्ट से जुड़ा है, जिसे लेकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यही है कि जिस सांसद की पहचान संसद में तीखे सवालों, आक्रामक तेवर और बेबाक बयानों के लिए होती है, वही अब अंडे फेंके जाने की आशंका को लेकर पुलिस स्टेशन जाने से बचने की कोशिश करती नजर आईं। हालांकि कानूनी रूप से अंडे फेंका जाना कोई मामूली बात नहीं है और किसी भी व्यक्ति को हिंसक या अपमानजनक विरोध से सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को जांच में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने की जिम्मेदारी से बचने का पर्याप्त आधार नहीं माना।
बहरहाल, अदालत की टिप्पणी ने एक राजनीतिक व्यंग्य जरूर छोड़ दिया है कि सियासत की राह में फूलों की उम्मीद लेकर उतरने वालों को कभी-कभी अंडों की बारिश भी झेलनी पड़ती है। महुआ मोइत्रा के लिए फिलहाल संदेश स्पष्ट है। हाई कोर्ट ने जांच में सहयोग का रास्ता दिखाया है और सुप्रीम कोर्ट ने उस रास्ते पर वर्चुअल शॉर्टकट देने से इंकार कर दिया है। अब गेंद फिर उसी पाले में है जहां से मामला शुरू हुआ था यानि पुलिस की जांच और अदालत की अगली सुनवाई।
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भारत की सीमाओं की सुरक्षा को पुख्ता करने और उसे घुसपैठिया मुक्त बनाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत कर रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा फैसला किया है। सीमावर्ती इलाकों में तेजी से बढ़ती अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अब राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नियंत्रण रेखा (एलओसी), वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कड़े नियम तय कर दिए हैं। इन नए दिशानिर्देशों का मकसद एक ओर देश की हरित ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली परियोजनाओं को सुरक्षा के दायरे में लाना है, तो दूसरी ओर सीमावर्ती क्षेत्रों में विदेशी नागरिकों, कंपनियों और संवेदनशील बुनियादी ढांचे से पैदा होने वाले संभावित सुरक्षा जोखिमों को समय रहते रोकना है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 50 किलोमीटर तक के क्षेत्र को संवेदनशील मानते हुए सुरक्षा मंजूरी, रक्षा मंत्रालय की एनओसी और व्यापक निगरानी व्यवस्था को अनिवार्य बनाया है।
हम आपको बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिशानिर्देश जारी कर नियंत्रण रेखा, वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से एक किलोमीटर के दायरे में सौर, पवन और हाइब्रिड अक्षय ऊर्जा की किसी भी नयी परियोजना पर रोक लगा दी है। मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा प्रभाग की ओर से जारी दिशानिर्देशों में परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों, विशेष रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के इंजीनियरों, कर्मचारियों एवं श्रमिकों को केंद्र सरकार की अनुमति के बिना नियुक्त करने पर भी रोक लगाई गई है। दिशानिर्देशों के तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी), वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) या अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे वाले क्षेत्रों को ‘‘संवेदनशील क्षेत्र’’ घोषित किया गया है। इसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा से 20 किलोमीटर तक का क्षेत्र भी शामिल है, जहां परियोजना के लिए रक्षा मंत्रालय से अलग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेना होगा। इन दिशानिर्देशों के तहत जिन परियोजनाओं के लिए दोबारा आवेदन करना होगा, उन पर भी ये प्रावधान लागू होंगे।
राष्ट्रीय सुरक्षा मंजूरी से संबंधित दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘50 किलोमीटर के दायरे में सभी सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं के लिए गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेना जरूरी होगा। एक किलोमीटर के दायरे में कड़ी पाबंदी रहेगी और वहां परियोजना से जुड़ी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।’’ दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘एक से 50 किलोमीटर के दायरे में प्रस्तावित परियोजनाओं को सुरक्षा मंजूरी देने या एक से 20 किलोमीटर के दायरे में अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने पर गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय प्रत्येक मामले के आधार पर फैसला करेंगे।’’ दिशानिर्देशों के अनुसार, आवेदक गृह मंत्रालय की सुरक्षा मंजूरी समेत केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना किसी विदेशी कंपनी को जमीन हस्तांतरित नहीं कर सकेगा।
हम आपको बता दें कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विभिन्न सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करने की उपयुक्तता से संबंधित आवेदनों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर ये दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। मंत्रालय ने कहा कि ऐसी परियोजनाओं के ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव’’ पड़ने की आशंका हो सकती है। मंत्रालय ने इस संबंध में पांच जून को एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया था और हाल में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। गृह मंत्रालय ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सौर, पवन और हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए ये ‘‘एकसमान और पारदर्शी दिशानिर्देश’’ राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं के साथ-साथ कारोबार सुगमता को ध्यान में रखते हुए सभी हितधारकों से परामर्श और सहमति के बाद जारी किए गए हैं।
मंत्रालय ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट किया जाता है कि जिन परियोजनाओं को इन दिशानिर्देशों के जारी होने से पहले ही गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी मिल चुकी है, उन्हें दोबारा आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी।’’ उसने कहा, ‘‘इसी तरह जिन आवेदकों को अपनी परियोजनाओं के लिए रक्षा मंत्रालय से पहले ही अनापत्ति प्रमाणपत्र मिल चुका है, उन्हें भी इन दिशानिर्देशों के तहत दोबारा आवेदन नहीं करना होगा।’’ बयान में कहा गया है कि ऐसी सभी परियोजनाओं के लिए आवेदन केवल नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को दिया जाएगा। मंत्रालय परियोजना के लिए भूमि आवंटन की राज्य सरकार की सैद्धांतिक मंजूरी के साथ प्रस्ताव को गृह मंत्रालय के पास सुरक्षा मंजूरी और रक्षा मंत्रालय के पास अनापत्ति प्रमाणपत्र के लिए भेजेगा। प्रस्ताव में भूमि के अक्षांश और देशांतर का विवरण भी देना होगा।
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि इन परियोजनाओं में व्यापक सुरक्षा इंतजाम करना भी अनिवार्य होगा, जिनमें ड्रोन-रोधी प्रणाली जैसे उपकरण शामिल हैं। इन उपकरणों का संचालन केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) या राज्य पुलिस करेगी और इनका खर्च परियोजना प्रस्तावक को वहन करना होगा। मंत्रालय ने कहा, ‘‘यदि प्रस्तावित परियोजना में विदेशी निवेश शामिल है तो भारत सरकार की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के तहत उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) को अलग से आवेदन करना होगा।’’
मंत्रालय ने कहा, ‘‘नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी और रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही परियोजना के प्रस्तावक को अंतिम निर्णय से अवगत कराएगा।’’ साथ ही सभी परियोजनाओं के लिए एक अलग पुलिस चौकी की व्यवस्था करनी होगी, जो निर्माण कार्यों की जांच और निगरानी करेगी। क्षेत्र में आने वाले विदेशी नागरिकों की गतिविधियों पर भी नजर रखी जाएगी। मंत्रालय ने कहा कि परियोजना के कर्मचारियों का कार्यस्थल पर जाने से पहले सत्यापन करना होगा और उन्हें स्थानीय पुलिस तथा अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के निर्देशों का पालन करना होगा।
दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘प्रस्तावित परियोजना को लागू करते समय पर्याप्त चौड़ी सड़कों का प्रावधान किया जाना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर सीमा सुरक्षा बलों या सशस्त्र बलों द्वारा भी आपात स्थिति में उनका इस्तेमाल किया जा सके।’’ इनमें कहा गया है कि ऐसे क्षेत्र में आवास, कैफेटेरिया या ऐसी आवासीय सुविधाओं की अनुमति नहीं होगी जहां भीड़ जुट सकती हो और सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ने की आशंका हो। आवास और होटल सीमा से कम से कम पांच किलोमीटर दूर होने चाहिए, जबकि कैफेटेरिया संयंत्र परिसर के भीतर होना चाहिए। इसके अलावा, दिशानिर्देशों में संवेदनशील क्षेत्रों में रखरखाव और संचालन से जुड़े ढांचों की अधिकतम ऊंचाई भी तय की गई है। सीमा से एक से आठ किलोमीटर के दायरे में इनकी ऊंचाई तीन मीटर, आठ से 20 किलोमीटर के दायरे में पांच मीटर और 20 से 50 किलोमीटर के दायरे में 15 मीटर से अधिक नहीं हो सकेगी।
बहरहाल, केंद्र सरकार के इन दिशानिर्देशों ने साफ कर दिया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास और अक्षय ऊर्जा विस्तार जरूरी है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। परियोजनाओं में विदेशी कर्मचारियों और निवेश से लेकर जमीन के हस्तांतरण, ड्रोन-रोधी व्यवस्था, पुलिस चौकी, कर्मचारियों के सत्यापन, विदेशी नागरिकों की निगरानी और आपात स्थिति में सुरक्षा बलों के इस्तेमाल योग्य सड़कों तक, हर पहलू को सुरक्षा के नजरिये से देखा जाएगा। एक किलोमीटर के दायरे में पूरी पाबंदी और 50 किलोमीटर तक सुरक्षा मंजूरी की व्यवस्था के जरिए सरकार ने सीमाओं के आसपास किसी भी संभावित संवेदनशील गतिविधि पर पहले से निगरानी का तंत्र तैयार किया है। ऐसे में ये दिशानिर्देश न सिर्फ सीमावर्ती क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नए सुरक्षा मानक तय करते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश देते हैं कि भारत की सीमाओं की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ किसी भी स्तर पर जोखिम स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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