भारत की सीमाओं की सुरक्षा को पुख्ता करने और उसे घुसपैठिया मुक्त बनाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत कर रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा फैसला किया है। सीमावर्ती इलाकों में तेजी से बढ़ती अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अब राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नियंत्रण रेखा (एलओसी), वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कड़े नियम तय कर दिए हैं। इन नए दिशानिर्देशों का मकसद एक ओर देश की हरित ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली परियोजनाओं को सुरक्षा के दायरे में लाना है, तो दूसरी ओर सीमावर्ती क्षेत्रों में विदेशी नागरिकों, कंपनियों और संवेदनशील बुनियादी ढांचे से पैदा होने वाले संभावित सुरक्षा जोखिमों को समय रहते रोकना है। इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 50 किलोमीटर तक के क्षेत्र को संवेदनशील मानते हुए सुरक्षा मंजूरी, रक्षा मंत्रालय की एनओसी और व्यापक निगरानी व्यवस्था को अनिवार्य बनाया है।
हम आपको बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिशानिर्देश जारी कर नियंत्रण रेखा, वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से एक किलोमीटर के दायरे में सौर, पवन और हाइब्रिड अक्षय ऊर्जा की किसी भी नयी परियोजना पर रोक लगा दी है। मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा प्रभाग की ओर से जारी दिशानिर्देशों में परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों, विशेष रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के इंजीनियरों, कर्मचारियों एवं श्रमिकों को केंद्र सरकार की अनुमति के बिना नियुक्त करने पर भी रोक लगाई गई है। दिशानिर्देशों के तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी), वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) या अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे वाले क्षेत्रों को ‘‘संवेदनशील क्षेत्र’’ घोषित किया गया है। इसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा से 20 किलोमीटर तक का क्षेत्र भी शामिल है, जहां परियोजना के लिए रक्षा मंत्रालय से अलग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेना होगा। इन दिशानिर्देशों के तहत जिन परियोजनाओं के लिए दोबारा आवेदन करना होगा, उन पर भी ये प्रावधान लागू होंगे।
राष्ट्रीय सुरक्षा मंजूरी से संबंधित दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘50 किलोमीटर के दायरे में सभी सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं के लिए गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेना जरूरी होगा। एक किलोमीटर के दायरे में कड़ी पाबंदी रहेगी और वहां परियोजना से जुड़ी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।’’ दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘एक से 50 किलोमीटर के दायरे में प्रस्तावित परियोजनाओं को सुरक्षा मंजूरी देने या एक से 20 किलोमीटर के दायरे में अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने पर गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय प्रत्येक मामले के आधार पर फैसला करेंगे।’’ दिशानिर्देशों के अनुसार, आवेदक गृह मंत्रालय की सुरक्षा मंजूरी समेत केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना किसी विदेशी कंपनी को जमीन हस्तांतरित नहीं कर सकेगा।
हम आपको बता दें कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विभिन्न सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करने की उपयुक्तता से संबंधित आवेदनों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर ये दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। मंत्रालय ने कहा कि ऐसी परियोजनाओं के ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव’’ पड़ने की आशंका हो सकती है। मंत्रालय ने इस संबंध में पांच जून को एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया था और हाल में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। गृह मंत्रालय ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सौर, पवन और हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए ये ‘‘एकसमान और पारदर्शी दिशानिर्देश’’ राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं के साथ-साथ कारोबार सुगमता को ध्यान में रखते हुए सभी हितधारकों से परामर्श और सहमति के बाद जारी किए गए हैं।
मंत्रालय ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट किया जाता है कि जिन परियोजनाओं को इन दिशानिर्देशों के जारी होने से पहले ही गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी मिल चुकी है, उन्हें दोबारा आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी।’’ उसने कहा, ‘‘इसी तरह जिन आवेदकों को अपनी परियोजनाओं के लिए रक्षा मंत्रालय से पहले ही अनापत्ति प्रमाणपत्र मिल चुका है, उन्हें भी इन दिशानिर्देशों के तहत दोबारा आवेदन नहीं करना होगा।’’ बयान में कहा गया है कि ऐसी सभी परियोजनाओं के लिए आवेदन केवल नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय को दिया जाएगा। मंत्रालय परियोजना के लिए भूमि आवंटन की राज्य सरकार की सैद्धांतिक मंजूरी के साथ प्रस्ताव को गृह मंत्रालय के पास सुरक्षा मंजूरी और रक्षा मंत्रालय के पास अनापत्ति प्रमाणपत्र के लिए भेजेगा। प्रस्ताव में भूमि के अक्षांश और देशांतर का विवरण भी देना होगा।
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि इन परियोजनाओं में व्यापक सुरक्षा इंतजाम करना भी अनिवार्य होगा, जिनमें ड्रोन-रोधी प्रणाली जैसे उपकरण शामिल हैं। इन उपकरणों का संचालन केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) या राज्य पुलिस करेगी और इनका खर्च परियोजना प्रस्तावक को वहन करना होगा। मंत्रालय ने कहा, ‘‘यदि प्रस्तावित परियोजना में विदेशी निवेश शामिल है तो भारत सरकार की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के तहत उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) को अलग से आवेदन करना होगा।’’
मंत्रालय ने कहा, ‘‘नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी और रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही परियोजना के प्रस्तावक को अंतिम निर्णय से अवगत कराएगा।’’ साथ ही सभी परियोजनाओं के लिए एक अलग पुलिस चौकी की व्यवस्था करनी होगी, जो निर्माण कार्यों की जांच और निगरानी करेगी। क्षेत्र में आने वाले विदेशी नागरिकों की गतिविधियों पर भी नजर रखी जाएगी। मंत्रालय ने कहा कि परियोजना के कर्मचारियों का कार्यस्थल पर जाने से पहले सत्यापन करना होगा और उन्हें स्थानीय पुलिस तथा अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के निर्देशों का पालन करना होगा।
दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘‘प्रस्तावित परियोजना को लागू करते समय पर्याप्त चौड़ी सड़कों का प्रावधान किया जाना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर सीमा सुरक्षा बलों या सशस्त्र बलों द्वारा भी आपात स्थिति में उनका इस्तेमाल किया जा सके।’’ इनमें कहा गया है कि ऐसे क्षेत्र में आवास, कैफेटेरिया या ऐसी आवासीय सुविधाओं की अनुमति नहीं होगी जहां भीड़ जुट सकती हो और सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ने की आशंका हो। आवास और होटल सीमा से कम से कम पांच किलोमीटर दूर होने चाहिए, जबकि कैफेटेरिया संयंत्र परिसर के भीतर होना चाहिए। इसके अलावा, दिशानिर्देशों में संवेदनशील क्षेत्रों में रखरखाव और संचालन से जुड़े ढांचों की अधिकतम ऊंचाई भी तय की गई है। सीमा से एक से आठ किलोमीटर के दायरे में इनकी ऊंचाई तीन मीटर, आठ से 20 किलोमीटर के दायरे में पांच मीटर और 20 से 50 किलोमीटर के दायरे में 15 मीटर से अधिक नहीं हो सकेगी।
बहरहाल, केंद्र सरकार के इन दिशानिर्देशों ने साफ कर दिया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास और अक्षय ऊर्जा विस्तार जरूरी है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। परियोजनाओं में विदेशी कर्मचारियों और निवेश से लेकर जमीन के हस्तांतरण, ड्रोन-रोधी व्यवस्था, पुलिस चौकी, कर्मचारियों के सत्यापन, विदेशी नागरिकों की निगरानी और आपात स्थिति में सुरक्षा बलों के इस्तेमाल योग्य सड़कों तक, हर पहलू को सुरक्षा के नजरिये से देखा जाएगा। एक किलोमीटर के दायरे में पूरी पाबंदी और 50 किलोमीटर तक सुरक्षा मंजूरी की व्यवस्था के जरिए सरकार ने सीमाओं के आसपास किसी भी संभावित संवेदनशील गतिविधि पर पहले से निगरानी का तंत्र तैयार किया है। ऐसे में ये दिशानिर्देश न सिर्फ सीमावर्ती क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नए सुरक्षा मानक तय करते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश देते हैं कि भारत की सीमाओं की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ किसी भी स्तर पर जोखिम स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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इस साल कांवड़ यात्रा कैंपों का मेन्यू परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाता दिख रहा है, क्योंकि यहाँ शाही पनीर और पुलाव से लेकर पास्ता, पिज़्ज़ा और मोमो तक परोसे जा रहे हैं – और ये सभी बिना प्याज़-लहसुन के तैयार किए गए हैं, जिसमें पारंपरिक और नई चीज़ों का मेल है। कुछ कैंप बड़ी मात्रा में सब्ज़ियाँ काटने के लिए रोटी-मेकर और मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कुछ ने श्रद्धालुओं को साफ़-सुथरा माहौल देने के लिए खुद को प्लास्टिक-फ़्री घोषित कर दिया है। शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी बताया कि ज़िला प्रशासन खाने की क्वालिटी, साफ़-सफ़ाई के मानकों और कुल मिलाकर सभी इंतज़ामों पर नज़र रखने के लिए प्राइवेट कैंपों का लगातार निरीक्षण कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांवड़ियों के लिए पूरे दिन के खाने का इंतज़ाम किया गया है।
कांवड़ कैंप में रोज़ाना का मेन्यू
सुबह के नाश्ते में चाय, बिस्किट, पोहा और जलेबी शामिल हैं। नाश्ते में समोसे, कचौड़ी, ब्रेड पकौड़े, वेज हक्का नूडल्स और हनी चिली पोटैटो भी परोसे जाते हैं। दोपहर के खाने में शाही पनीर, कड़ाही पनीर, पनीर लबाबदार, दाल मखनी और मिक्स वेज जैसी डिशेज़ होती हैं, जिन्हें चूर-चूर नान, बटर नान, जीरा राइस और रोटी के साथ परोसा जाता है। खाने के बाद मीठे में रबड़ी-जलेबी, रसमलाई, रसगुल्ला और गुलाब जामुन जैसे व्यंजन भी मिलते हैं।
शाम के नाश्ते में तीर्थयात्रियों को स्प्रिंग रोल, चिली पनीर, मंचूरियन, व्हाइट और रेड सॉस पास्ता, वेज पिज़्ज़ा, मोमोज़, मैकरोनी, सूप और बर्गर परोसे जाते हैं। रात के खाने में छोले-पूरी, मटर पनीर, पुलाव, दाल और रोटी के साथ-साथ खीर, हलवा, फ्रूट कस्टर्ड और गुलाब जामुन भी होते हैं। बयान में कहा गया है कि कैंप में लस्सी, छाछ, जूस, चाय, कॉफी और ठंडा पीने का पानी भी लगातार मिलता रहता है।
कांवड़ कैंप की रसोई में तकनीकी सुधार
कांवड़ यात्रा की एक और खास बात कंकरखेड़ा व्यापार संघ कैंप में लगी मशीन है, जो एक बार में 20 किलो आटा गूंथ सकती है, और साथ ही एक ऑटोमैटिक रोटी बनाने वाली मशीन भी है। नीरज मित्तल और ऑपरेशन्स मैनेजर राजेश खन्ना के अनुसार, यह मशीन हर मिनट लगभग 16 और हर घंटे करीब 900 रोटियां बनाती है, जिससे रोज़ाना 6,000 से 7,000 रोटियां तैयार होती हैं। बड़ी मात्रा में खाना तैयार करने में मदद के लिए सब्ज़ियाँ काटने और मसाले तैयार करने जैसे कामों के लिए मशीनें लगाई गई हैं। आयोजन टीम के सदस्य सुधीर रस्तोगी के अनुसार, मोदीपुरम कैंप में व्रत के दौरान खाए जाने वाले खास खाने ('फलाहार') का इंतज़ाम किया गया है। यहाँ कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बनी चीज़ें, आलू की सब्ज़ी, मौसम के फल और व्रत में खाए जाने वाले दूसरे खाद्य पदार्थ दिए जा रहे हैं।
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