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युद्ध का नया 'नॉर्मल': मिसाइलों के साये में मून मिशन की उड़ान, क्या बारूद की गंध के साथ जीना सीख गया इंसान?

कितनी मामूली हसरतें होती है एक साधारण आदमी की। मेहनत के पसीने से बरक्कत की दो रोटियां, गुजारे लायक छत, बच्चों को तालीम मिल जाए और सोते हुए खिड़कियों के कांच का टूट जाने का अंदेशा ना हो। डर न लगे घर से बाहर निकलते हुए कि जमीन और जन्नत के नाम पर उपजी दीवार चकनाचूड़ ना कर दे आदमी होने का भ्रम। युद्ध की क्या परिभाषा हो सकती है? इंसान को इंसान से बेपनाह नफरत सिखाने की पाठशाला। मानवता को दुत्कारने का खुला निरंकुश मंच या एक जादुई मशीन जिसमें एक तरफ से मनुष्य डालों तो दूसरी तरफ से कसाई निकलता है। भारत बुद्ध की विरासत वाली धरती है जो युद्ध नहीं शांति की नीति पर चलता है। पीएम मोदी विभिन्न मंचों से साफ कर चुके हैं कि ये युद्ध का युग नहीं है। लेकिन दुनिया के ग्लोब पर नजर डालेंग तो नजर आएगा कि रूस यूक्रेन के साथ पांच सालों से युद्ध में उलझा है। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ये वॉर इतना लंबा खिंच जाएगा। वहीं एक मोर्च पर उलझी दुनिया में 7 अक्तूबर 2023 के बाद इजरायल की तरफ से गाजा में युद्ध का एक अलग मोर्चा खोल दिया गया। इसके भी अब तीन बरस होने को हैं। वहीं हिजबुल्ला, हूती, हमास जैसे प्रॉक्सी को कमजोर करने के बाद इजरायल के निशाने पर ईरान आया। अमेरिका का साथ और अस्तित्व की बात पर शुरू हुई जंग कितने दिनों या सालों तक चलेगी इसका जवाब तो शायद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास भी न हो। वहीं भारत में आतंक का निर्यात करने वाला पड़ोसी देश पाकिस्तान जो कुछ दिनों पहले तक ईरान जंग खत्म करवाने में मिडिल मैन की भूमिका निभाने की कोशिश में लगा था। वो खुद तालिबान से पिटकर इस तरह फंसा है कि खबर तो ये भी आई कि कभी नाटो जैसा समझौता करने वाले अपने मित्र देश सऊदी अरब को बचाने के लिए सेना भेजने में असमर्थता तक जता दी। कहा जा सकता है कि दुनिया का हर देश ही किसी न किसी रूप में युद्ध या सशस्त्र संघर्ष में उलझ ही चुका है। कुल मिलाकर वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो  ऐसा लगता है कि कई बड़े संघर्ष एक साथ चल रहे हैं, लेकिन दुनिया की रोज़मर्रा की ज़िंदगी कहां थमने वाली थी भला! लोगों को मानो ऐसा महसूस होने लगा है कि युद्ध अब सामान्य स्थिति बन गई है। 

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एक तरफ मिसाइलें, दूसरी तरफ मून मिशन

आज की दुनिया एक गहरे विरोधाभास से गुजर रही है, जहाँ एक ओर मध्य-पूर्व (ईरान-अमेरिका तनाव) और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी सैन्य झड़पों ने वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल दिया है। इन संघर्षों के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर संकट मंडरा रहा है, जिससे कच्चा तेल महंगा हो रहा है और इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और देश की जीडीपी पर पड़ रहा है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान-तालिबान संघर्ष जैसी क्षेत्रीय अस्थिरता ने सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना दिया है, जिससे यह साफ है कि भू-राजनीतिक स्वार्थ आज भी मानवीय विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। दूसरी ओर, इसी अशांति के बीच मानवता ने अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीकी प्रगति में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। चंद्र मिशन और स्पेस एक्सप्लोरेशन जैसी उपलब्धियां यह दर्शाती हैं कि भविष्य की दुनिया केवल ज़मीन के टुकड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संसाधनों और शक्ति का नया केंद्र अंतरिक्ष होगा। जहाँ एक तरफ मिसाइलें सीमाओं को बाँट रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सैटेलाइट और एआई जैसी तकनीकें पूरी दुनिया को एक डिजिटल सूत्र में पिरो रही हैं।

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क्या हमने युद्ध के साथ जीना सीख लिया है

युद्ध हमेशा असाधारण, खतरनाक और दुखद स्थिति होती है। इसमें जान-माल का नुकसान, डर, आर्थिक संकट और मानवीय पीड़ा शामिल होती है। कोई भी समाज वास्तव में युद्ध को पसंद नहीं करता। लेकिन आज के समय में ऐसा क्यों लगता है कि लोग जल्दी एडजस्ट कर लेते हैं? आज 24×7 न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया, मोबाइल नोटिफिकेशन हर समय नई खबरें दिखाते रहते हैं। एक युद्ध की खबर आती है, फिर तुरंत दूसरी बड़ी खबर आ जाती है। बड़े देशों के अपने रणनीतिक और आर्थिक हित होते हैं, इसलिए संघर्ष खत्म होने में समय लगता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी जुड़ी हुई है कि पूरी दुनिया रुक नहीं सकती, इसलिए जीवन चलता रहता है।

सद्दाम की मौत को एक युग का अंत कहा गया, खामनेई की मौत के 24 घंटे बाद सब नॉर्मल

सद्दाम हुसैन का दौर (2006) वह समय था जब खबरें आज की तरह फोन पर नहीं, बल्कि सुबह के अखबार और रात के टीवी न्यूज़ से मिलती थीं। उस वक्त जब सद्दाम की गिरफ्तारी या फांसी जैसी बड़ी घटना हुई, तो वह हफ्तों तक लोगों के दिमाग पर छाई रही। चूंकि जानकारी पाने के साधन सीमित थे। इसलिए जो न्यूज़ चैनल दिखाते थे, लोग उसी पर यकीन करते थे और उसी के बारे में बात करते थे। वह दौर ऐसा था जहाँ चुनिंदा मीडिया घराने ही तय करते थे कि दुनिया को क्या देखना है और क्या सोचना है। सद्दाम को उस समय का एक 'महानायक' या 'महाखलनायक' माना जाता था, इसलिए उनके जाने को एक पूरे युग का अंत कहा गया। इसके उलट वर्तमान दौर में 24x7 खबरों के साथ ही सोशल मीडिया का बोलबाला है। आज अगर सद्दाम जैसी कोई घटना होती, तो वह बमुश्किल 48 घंटे तक ट्रेंड करती और फिर किसी नए विवाद या मीम के नीचे दब कर रह जाती। सूचना इतनी तेज़ी से हम तक पहुँच रही है कि लोग ज्यादा समय तक किसी बात को याद नहीं रखते हैं। हर मिनट एक नई 'ब्रेकिंग न्यूज़' पुरानी बड़ी घटना को ओल्ड स्टोरी में तब्दील कर देती है। यही वजह है कि आज के दौर में बड़ी से बड़ी घटनाएं 'इतिहास' बनने के बजाय सिर्फ इंटरनेट का 'कंटेंट' बनकर रह गई हैं, जो आती हैं और गायब हो जाती हैं।

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Iran-US Talks पर 'विफलता' की खबरों से बौखलाया Pakistan, कहा- सब मनगढ़ंत और झूठा

पाकिस्तान ने शनिवार को उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता को सुगम बनाने की उसकी पहल प्रारंभिक प्रस्तावों के आदान-प्रदान के बाद बाधाओं में फंस गई है। इन खबरों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत कहानी बताते हुए विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इन्हें सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हमने मीडिया में और सोशल मीडिया पर भी, कई खबरें देखी हैं जिनमें तथाकथित सरकारी सूत्रों का हवाला देते हुए क्षेत्र में चल रहे संघर्ष और पाकिस्तान द्वारा शांति और संवाद को बढ़ावा देने के प्रयासों के बारे में बताया गया है। उन्होंने आगे कहा कि हम इन झूठे आरोपों को, जो कथित सरकारी सूत्रों के हवाले से लगाए गए हैं, पूरी तरह से बेबुनियाद और मनगढ़ंत कहानी मानते हुए खारिज करते हैं। इस संबंध में किसी भी तरह के सरकारी सूत्रों का हवाला देना गलत है। 

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इस्लामाबाद के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दी गई बंद कमरे की ब्रीफिंग के बाद बढ़ती अटकलों के बीच यह स्पष्टीकरण आया। अंद्राबी ने कहा कि विवाद शुक्रवार को विदेश मंत्रालय में आयोजित पृष्ठभूमि ब्रीफिंग की गलत व्याख्या से उत्पन्न हुआ। उन्होंने क्षेत्र में बढ़ते तनाव के समय इस बातचीत की रिपोर्टिंग के तरीके पर चिंता व्यक्त की। इसलिए हम सभी मीडिया प्लेटफॉर्मों से आग्रह करते हैं कि वे उचित सावधानी बरतें, अटकलों से बचें और सटीक एवं समयोचित जानकारी के लिए केवल आधिकारिक रूप से जारी बयानों और मीडिया विज्ञप्तियों पर ही भरोसा करें।

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रिपोर्टों में क्या कहा गया

पाकिस्तान स्थित डॉन और अमेरिका स्थित वॉल स्ट्रीट जर्नल सहित अन्य रिपोर्टों में कहा गया है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान सहित कुछ प्रगति हुई है, लेकिन ईरानी पक्ष की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया न मिलने के कारण गति धीमी हो गई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने इस्लामाबाद में किसी भी अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया है। डॉन की एक अन्य रिपोर्ट में, बातचीत से परिचित एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है, यह आश्चर्यजनक है कि नौसेना, वायु सेना और अन्य सैन्य एवं नागरिक बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण विनाश के बावजूद, ईरान ने बातचीत के आह्वान पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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