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चीन-श्रीलंका संबंधों को नई मजबूती देने पर जोर

बीजिंग, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की केंद्रीय समिति के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क विभाग के मंत्री ल्यू हाईशिंग ने मंगलवार को देश की राजधानी पेइचिंग में श्रीलंका की जनता विमुक्ति पेरमुना (जेवीपी) के केंद्रीय समिति सदस्य तथा व्यापार, वाणिज्य, खाद्य सुरक्षा एवं सहकारिता विकास मंत्री वसंथ समरसिंघे के नेतृत्व वाले एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की।

बैठक में दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई सहमति को लागू करने, राजनीतिक दलों के बीच संपर्क को और मजबूत करने तथा चीन-श्रीलंका संबंधों के समग्र विकास पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया।

ल्यू हाईशिंग ने कहा कि पिछले वर्ष जनवरी में दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच हुई सफल बैठक ने द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए स्पष्ट रणनीतिक दिशा प्रदान की थी। उन्होंने यह भी कहा कि सीपीसी और जेवीपी दोनों मार्क्सवादी शासक पार्टियां हैं, जिन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ल्यू ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संघर्षपूर्ण इतिहास और नए युग में हासिल की गई विकास उपलब्धियों को भी साझा किया।

उधर, वसंथ समरसिंघे ने कहा कि चीन हमेशा से श्रीलंका का एक विश्वसनीय साझेदार और मित्र रहा है। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में जेवीपी और सीपीसी के बीच संबंध लगातार सुदृढ़ हुए हैं। पिछले वर्ष दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में हस्ताक्षरित ज्ञापन ने दोनों पार्टियों के संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ा है।

समरसिंघे ने आगे कहा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चीनी जनता द्वारा प्राप्त विकास उपलब्धियां समाजवादी व्यवस्था की सशक्त जीवंतता को दर्शाती हैं। जेवीपी दोनों पार्टियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को अत्यंत महत्व देता है और चीन के शासन तथा विकास के अनुभवों से सीखने के लिए प्रतिबद्ध है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

--आईएएनएस

एबीएम/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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Uncovered with Manoj Gairola: क्या मिसाइलों की किल्लत ने महाशक्ति को घुटने टेकने पर कर दिया मजबूर?

क्या ईरान युद्ध का फैसला हो चुका है? क्या अमेरिका वाकई इस युद्ध को हार चुका है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक महीने से ज्यादा का वक्त बीतने के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को छोड़कर भागने की बात कह रहे हैं. ट्रंप ने कहा है कि अगले दो तीन हफ्तों में अमेरिकी फौज युद्ध के मैदान को छोड़ देगी. आखिरकार जिस जोर शोर के साथ ईरान युद्ध शुरू किया गया था, उसे ट्रंप बीच में क्यों छोड़ना चाहते हैं? आखिर ट्रंप की क्या मजबूरी है? आज हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे कि कैसे एक महाशक्ति मिसाइलों की कमी के सामने बेबस नजर आ रही है.

युद्ध के अधूरे मकसद और ट्रंप की मजबूरी

जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर ताबड़तोड़ हमले शुरू किए थे, तब इस युद्ध के तीन बड़े मकसद बताए गए थे. पहला मकसद था ईरान में रिजीम चेंज यानी सरकार बदलना, दूसरा ईरान की परमाणु ताकत को पूरी तरह खत्म करना और तीसरा ईरान की मिसाइल पावर को सीमित करना. आज एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इनमें से एक भी मकसद पूरा नहीं हुआ है. इसके बावजूद ट्रंप युद्ध छोड़ने की बात कर रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिका की खुद की मिसाइल पावर अब बेहद कमजोर हो गई है और उसके पास स्टॉक खत्म होने की कगार पर है.

टॉमहॉक मिसाइलों का खाली होता जखीरा

द वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले चार हफ्तों में ही अमेरिका ने ईरान पर 850 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें दाग दी हैं. टॉमहॉक मिसाइल अमेरिका के हथियारों के जखीरे का सबसे खास हिस्सा मानी जाती है. इस मिसाइल की मारक क्षमता 1500 से 2000 किलोमीटर तक की है. मॉडर्न नेविगेशन सिस्टम से लैस यह मिसाइल सटीक निशाने के साथ हमला करती है. इसकी स्पीड करीब 900 किलोमीटर प्रति घंटे की है और यह अपने साथ 450 किलोग्राम तक बारूद ले जा सकती है. लेकिन दिक्कत यह है कि अमेरिका के पास इसका स्टॉक बहुत लिमिटेड है. एक मिसाइल को बनाने की लागत करीब 34 करोड़ रुपए आती है और इसे तैयार करने में दो साल का समय लगता है. पिछले साल अमेरिका ने केवल 57 मिसाइलें ही अपने जखीरे में शामिल की थीं, जबकि युद्ध शुरू होने से पहले उसके पास सिर्फ 3000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं.

डिफेंस सिस्टम भी पड़ने लगा है कमजोर

अमेरिका सिर्फ हमला ही नहीं कर रहा, बल्कि ईरान के हमलों को रोकने के लिए भी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. ईरान की मिसाइलों और ड्रोन्स को रोकने के लिए अमेरिका, इजरायल और उनके मित्र देश अब तक 2400 पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुके हैं. हैरानी की बात यह है कि एक साल में ऐसी केवल 650 पैट्रियट मिसाइलों का ही प्रोडक्शन होता है. यानी जितनी मिसाइल अभी तक दागी जा चुकी हैं, उनको दोबारा बनाने में अमेरिका को कम से कम साढ़े तीन साल का समय लगेगा. नौबत यहां तक आ गई है कि अमेरिका ने अपने नाटो सहयोगी देश पोलैंड से पैट्रियट मिसाइलों को खाड़ी में शिफ्ट करने के लिए कहा, लेकिन पोलैंड ने अपनी सुरक्षा का हवाला देकर साफ इनकार कर दिया है.

थाड सिस्टम और चीन का बड़ा खेल

पैट्रियट के अलावा ईरान के हमलों को रोकने के लिए थाड एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल भी हो रहा है. इस युद्ध में अब तक 40 परसेंट थाड सिस्टम की मिसाइलें खत्म हो गईं हैं. एक साल में केवल 100 थाड इंटरसेप्टर बनाए जा सकते हैं. अभी तक जितनी मिसाइलें खर्च हो चुकी हैं, उतना स्टॉक पूरा करने में अमेरिका को कम से कम 5 साल लगेंगे. लेकिन यह प्रोडक्शन भी आसान नहीं है, क्योंकि यहां पर चीन का एंगल जुड़ जाता है. दरअसल, हर इंटरसेप्टर मिसाइल में जो मैग्नेट लगता है, पूरी दुनिया में उसकी 90 परसेंट सप्लाई केवल चीन करता है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर चीन चाहे तो अमेरिका के मिसाइल प्रोडक्शन को कभी भी ठप कर सकता है.

गठबंधन देशों की भी सांसें फूलीं

मिसाइलों की यह कमी सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है. खाड़ी में मौजूद उसके मित्र देशों के लिए भी खतरे की घंटी बज गई है. यूएई और कुवैत जैसे देश अपनी पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों का 75 परसेंट हिस्सा खर्च कर चुके हैं. वहीं बहरीन का 87 परसेंट और कतर का 40 परसेंट जखीरा खाली हो चुका है. इजरायल के हालात भी बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते. युद्ध के पहले दो हफ्तों में इजरायल ने ईरान की 97 परसेंट मिसाइलें रोक दी थीं, लेकिन अगले दो हफ्तों में 27 परसेंट मिसाइलें इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में कामयाब रहीं. इसकी वजह यह है कि इजरायल के पास इंटरसेप्टर मिसाइलें कम होने लगी हैं और अब वह हर मिसाइल को गिराने के लिए इंटरसेप्टर नहीं दाग रहा है.

चुनाव का डर और आगे का रास्ता

इन सारे हालातों के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा है कि स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को खुलवाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है. वहीं पूरी दुनिया समेत अमेरिका में भी पेट्रोल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ऐसे में ट्रंप की पार्टी को डर है कि वह नवंबर में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन हार सकती है. ट्रंप गुरुवार सुबह अमेरिका को संबोधित करने वाले हैं. वैसे तो ट्रंप के बयान बहुत अनप्रेडिक्टेबल होते हैं, लेकिन इन हालातों को देखते हुए कयास यही लगाए जा रहे हैं कि ट्रंप ईरान में अपनी सो कॉल्ड विक्ट्री का ऐलान करके युद्ध से पीछे हट सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो मिडिल ईस्ट के फ्यूचर में क्या होगा, यह कोई नहीं जानता.

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दिल्ली कैपिटल्स ने लखनऊ सुपर जायंट्स को घर में घुसकर पीटा, 22 साल के रिजवी ने बांधा समां

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